रंगमंच ने निखारा बॉलीवुड को!

श्रीशचन्द्र मिश्र
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रंगमंच भले ही भारत में गहरी जड़ें न जमा पाया हो लेकिन उसका एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह कि रंगमंच ने फिल्मों को हमेशा एक से एक बढ़ कर समर्थ कलाकार दिए हैं। यह अलग बात है कि इनमें से गिने चुने कलाकारों ने ही फिल्मी व्यस्तता के बावजूद रंगमंच को अपना योगदान दिया। बाकी के लिए नाट्य कर्मभूमि कभी कभार चेहरा दिखाने तक ही सीमित रही। ओमपुरी उस नेशनल स्कूल आफ ड्राफा में 2015 में 32 साल बाद गए जहां से उन्हें हीन ग्रंथि से मुक्ति मिली थी। 

दिल्ली के इसी एनएसडी ने उनके भीतर के अभिनेता को उभारा था। पंजाबी माध्यम से पढ़ाई पूरी करने की वजह से अंग्रेजी की एक लाइन भी न बोल पाने की असमर्थता से कुंठित हो कर ओमपुरी छह महीने में ही नेशनल स्कूल आफ ड्रामा (एनएसडी) छोड़ने की सोचने लगे। इब्राहीम अल काजी एनएसडी के सबसे पुराने व बेहतरीन शिक्षक थे। उन्होंने ओमपुरी की दुविधा को समझ लिया। 

एमके रैना को ओमपुरी के मन की थाह लेने का जिम्मा सौंपा। पता चला कि ओमपुरी को अंग्रेजी न बोल पाने की हीन भावना है। अलकाजी ने उन्हें समझाया कि अंग्रेजी कोई होवा नहीं, एक भाषा ही है। उन्होंने ओमपुरी को अंग्रेजी बोलने का आसान तरीका सिखाया। अभिनय में तो उन्हें पारंगत किया ही। 

करीब चार दशक पहले गोविंद निहलानी की फिल्म ‘आक्रोश’ से चर्चा में आए ओमपुरी ने आखिरी समय तक अभिनेता के तौर पर विविध भूमिकाएं कर लगातार अचंभित किया। रंगमंच से मजबूत हुई बुनियाद, लेकिन रंगमंच छूट गया। ओमपुरी जब मुंबई गए थे, उन्होंने अपना थिएटर ग्रुप बनाया था। फिल्मी व्यस्तता में वह पीछे रह गया। ओमपुरी की तरह और भी कई कलाकार रंगमंच पर सिद्धहस्त होने के बाद फिल्मों में आए और अभिनय के अनूठे रंग दिखाए। परिवारवाद से ग्रस्त फिल्म उद्योग में उन्होंने अपने लिए पुख्ता जमीन बनाई लेकिन लगभग सभी का रंगमंच से रिश्ता टूट गया। अपवाद के रूप में दो चार का रहा तो शौकिया स्तर पर। प्रतिबद्धता के नाते फारुक शेख, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह आदि की ही सक्रियता रही।

व्यवहारिक नजरिए से देखा जाए तो यह स्वाभाविक है। रंगमंच आत्म संतुष्टि तो दे सकता है लेकिन आज भी यह एक सक्षम करिअर का रूप नहीं ले पाया है। फिल्मों में जो सफल न हो पाए उनके लिए रंगमंच पर लौटना मजबूरी हो जाता है। फिल्मी दुनिया जिन्हें अपना ले उसके लिए दो नावों पर पैर रखना संभव नहीं हो पाता। सिर्फ इसलिए नहीं कि रंगमंच पर काम करने की इच्छा पर जरूरतें और लोकप्रियता हावी हो जाती है। 

फिल्मी व्यवस्था इस कदर अस्त-व्यस्त व अनुशासनहीन है कि उसमें से समय निकाल पाना आसान नहीं होता। लेकिन इससे रंगमंच का फिल्मों से जुड़ाव कम नहीं हुआ है। वापसी भले ही कम हो रहीहै लेकिन रंगमंच से फिल्मों को कलाकार मिलने का सिलसिला जारी है। अभिनय में ताजगी और विविधता भी इन्हीं कलाकारों की वजह से आई है। उन्हीं की क्षमता ने लीक तोड़ कर सार्थक फिल्में बनाने की निर्माताओं को हिम्मत दी है। हिंदी रंगमंच की स्थिति थोड़ी डांवाडोल जरूर है लेकिन बंगाल, केरल और गुजरात में रंगमंच की सक्रियता बनी हुई है और इसमें फिल्मों में प्रतिष्ठित हो चुके कुछ कलाकारों का योगदान सराहनीय है। उन्होंने दोनों विधाओं में तालमेल बनाए रखा।

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