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मेकअप भी दिखाता रहा है फिल्मों में कमाल!

श्रीशचन्द्र मिश्र
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फिल्मी सितारों में अब इतनी समझ तो आ गई है कि फिल्म के चरित्र के मुताबिक वे अपना व्यक्तित्व ढाले। कुछ अपना वजन बढ़ाते हैं जैसे आमिर खान (दंगल) और सलमान खान (सुल्तान)। हीरोइनों को आमतौर पर जीरो फिगर बनाए रखने को कहा जाता है। यह निर्देश आदित्य चोपड़ा की फिल्म की हर हीरोइन को मानना पड़ता है। अपवाद के रूप में ‘दम लगा के हइशा’ के लिए भूमि पेडणेकर को वजन बढ़ाने का फरमान जरूर मिला। 

इस सबके बावजूद फिल्मों में जो कमाल मेकअप दिखाता रहा है उसका कोई जवाब नहीं है। जल्दी ही रिलीज होने वाली फिल्म ‘राबता’ में राजकुमार राव ने मेहमान भूमिका की है। यह अपने आप में कोई खबर नहीं है। खबर यह है कि भूमिका 324 साल के व्यक्ति की है। है न चौंकने वाली बात! राजकुमार राव को विशेष लुक देने में जादू चला मेकअप का। मेकअप के जरिए उन्हें सोलह रूप दिए गए, उसमें से सर्वश्रेष्ठ चुना गया। यह आसान नहीं था। 

कई दिन लगातार घंटों की मेहनत के बाद राजकुमार राव का जो चेहरा सामने आया है वह विस्मृत कर देने वाला है। फिल्मों में मेकअप का जादू क्या-क्या कमाल दिखा रहा है, इसकी यह अकेली मिसाल नहीं है। 26 साल बाद अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर साथ में फिल्म करने जा रहे हैं। लेखक-निर्देशक सौम्य जोशी के गुजराती नाटक ‘102 नॉट आउट’ पर बन रही इस फिल्म 102 साल के अमिताभ 80 साल के ऋषि कपूर की भूमिका में नजर आएगे। 

उम्र का यह फर्क मेकअप के कमाल से कितना जीवंत होगा, यह फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले ही तय कर लिया गया है। मेकअप के साथ दोनों की रिहर्सल हुई और नतीजा शानदार रहा। जहां तक ऋषि कपूर की बात है तो ‘कपूर एंड संस’ में वे एक बूढ़े दादा का रोल कर ही चुके हैं। 

मेकअप फिल्मों का शाश्वत हिस्सा रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों से इस कला में अभिनव प्रयोग हो रहे हैं। पिछले साल दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में शूटिंग के लिए आए अक्षय कुमार को कोई नहीं पहचान पाया। हुलिया जो उनका पूरी तरह बदला हुआ था। मेकअप के कमाल ने अच्छे भले अक्षय को खूंखार कौवे का रूप दे दिया था। 

रजनीकांत की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘2.0.’ में अक्षय पहली बार खलनायक बने हैं। फिल्म में वे उस सनकी और विध्वंसक मानसिकता वाले वैज्ञानिक की भूमिका कर रहे हैं जो जब चाहे खुद को कौवे में तब्दील कर सकता है। अपनी पिछली कुछ फिल्मों से रियल लाइफ हीरो की इमेज बना चुके अक्षय कुमार खलनायकी में कौन से झंडे गाड़ पाते हैं, यह तो फिल्म देखने के बाद ही पता चल पाएगा। लेकिन मेकअप ने उनका जो रूप बदला है, वह चमत्कृत कर देने वाला है। 

हॉलीवुड की फिल्मों से प्रेरणा लेकर कलाकारों को अनूठी पहचान देने का सिलसिला अब हिंदी फिल्मों में भी चल पड़ा है। इसमें मेकअप का सबसे बड़ा योगदान हो गया है। ‘कृश-3’ में शैतान बने विवेक ओबराय इसी वजह से आतंक मचाने में कामयाब हो पाए। मेकअप के सहारे अपनी काया बदल कर ऋषि कपूर ने भी साल दिनों ‘कपूर एंड संस’ में काफी चौंकाया। फिल्म में उन्होंने 90 साल के ठरकी दादा जी की भूमिका की और सब पर भारी पड़ गए। कुछ उनका अपना टेलेंट और कुछ मेकअप ने उन्हें ऐसा रूप दे दिया जो पहले कभी सामने नहीं आया था। 

कहते हैं कि 39 करोड़ रुपए में बनी फिल्म में साठ साल के ऋषि कपूर को 90 साल का दिखाने की कवायद पर ही एक करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो गए। उनका हुलिया बदलने के लिए विदेशी विशेषज्ञों की मदद ली गई थी। मेकअप की आयातित विशेषज्ञता का ही यह कमाल है कि बाल्की की फिल्म ‘पा’ में न सिर्फ अमिताभ बच्चन का कद घट गया बल्कि बारह साल की उम्र में अस्सी साल के बूढ़े का रूप भी उन्होंने ओढ़ लिया। तमिल फिल्म ‘आई’ में विक्रम का कुरूप होना और फिर उस कुरुपता से उबरने की प्रक्रिया मेकअप कला के चमत्कार की ही वजह से संभव हो पाई। 

पहले फिल्मों में मेकअप का पारंपरिक इस्तेमाल करने का चलन ही ज्यादा रहा। उसी से तो बुढ़ा गए हीरों के चेहरे को झुर्रिया मिटती थी। कांतिहीन हो गई हीरोइन को मेकअप ही सेक्स सिंबल बना देता था। रजनीकांत को कोई उनके असल रूप में देखे तो सोच ही नहीं सकता कि यह वही स्टार है जो अपनी आकर्षक उपस्थिति की वजह से मेगा स्टार बना हुआ है। 

मेकअप किसी भी चेहरे का अप्रत्याशित कायाकल्प कर सकता है, यह हुनर पहले भी कई फिल्मों में दिखा है। अब उसमें विशिष्टता और अनूठी कल्पनाशीलता दिख रही है तो इसलिए कि अब इस कला को ज्यादा गंभीरता से लिया जा रहा है। एक वजह और भी है। फिल्में अब पारंपरिक विषयों को लांघ कर अनूठे प्रयोग करने का उत्साह दिखा रही हैं। इससे चरित्र चित्रण को प्रधानता मिल रही है और उसे गढ़ने में मेकअप का सहारा खूब लिया जा रहा है।

एक बात और आज के सितारे भारी भरकम मेकअप ओढ़ने से परहेज नहीं करते। इसी साहस का नतीजा है कि कंगना रानाउत फिल्म ‘तेजू’ में 80 साल की महिला की भूमिका कर रही हैं। फर्क यह भी आया है कि विदेशी विशेषज्ञों का सहारा लेने का चलन ज्यादा बढ़ गया है। नई तकनीक और विशेषज्ञता जो हॉलीवुड के लोगों के पास है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि देश में मेकअप कला में दक्ष लोगों की कोई कमी है। 

भारत में रंगमंच की परंपरा फिल्मों से पुरानी है और आजादी से पहले काफी समृद्ध व लोकप्रिय भी थी। पौराणिक आख्यानों पर गांवों-कस्बों में खेले जाने वाले नाटकों में पात्रों को मेकअप के जरिए ही उभारा जाता था। उन दिनों बाल गंधर्व अक्सर नाटकों में महिला चरित्र निभाते थे और उन्हें देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वे पुरुष हैं।

शुरुआती सालों में हिंदी फिल्मों में मेकअप कला ज्यादा विकसित इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि एक तो तब फिल्मों का दायरा कुछ खास चरित्रों तक ही सीमित था और दूसरे मेकअप को एक अलग तकनीक के रूप में मान्यता नहीं मिली। बरसों तक मेकअप मैन की स्थिति स्पाट ब्वाय से ज्यादा नहीं रही। बाद में स्थिति बदली। कलाकारों ने मेकअप और उसके जरिए अपनी पहचान को विस्तार देने की संभावनाओं को समझा। उसका उन्हें फायदा भी हुआ। आजादी के कुछ साल बाद तक पोत पात कर चेहरा आकर्षक बना देने और विग व दाढ़ी मूंछ के सहारे कलाकार का रूप थोड़ा बहुत बदल देने को ही मेकअप माना गया। 

रंगमंचीय शैली के इस मेकअप को अशोक कुमार सरीखे कुछ कलाकारों ने कभी पसंद नहीं किया और न ही उसे अपनाया। इस कला को जब कुछ लोगों ने गंभीरता से अपनाया तो स्थिति बदली। ‘दिल ही तो है’ में राज कपूर, ‘छलिया’ में प्राण, ‘काबुली वाला’ में बलराज साहनी आदि को मेकअप से अलग पहचान मिली। करिअर में कभी विग न लगाने वाले अशोक कुमार को विग की ही वजह से ‘पूरब और पश्चिम’ व ‘सत्यकाम’ में जो शक्ल मिली उसने उनके अभिनय में और जीवंतता ला दी।

एक समय कलाकार की पहचान अलग करने के लिए उसके शरीर को काला कर दिया जाता था। ‘मेरी सूरत तेरी आंखे’ में अशोक कुमार को कुरूप दिखाने के लिए काला कर दिया गया। ‘बेवकूफ’ में तो किशोर कुमार को शू पॉलिश से चेहरा पोतते दिखाया गया था। ताकि वे अफ्रीका से आए बॉक्सर लग सकें। दोहरी भूमिका में फर्क करने के लिए भी यह टोटका आजमाया गया। ‘इज्जत’ में धर्मेंद्र और ‘गोरा और काला’ में राजेंद्र कुमार इसका निशाना बने। ‘नजराना’ में जालिम जमाने से बचाने के लिए ‘गरीब’ श्रीदेवी को काला कर दिया गया।

कई साल तक यही माना गया कि मेकअप सिर्फ एक सहायक कला है और उसके जरिए न तो अभिनय को नया विस्तार दिया जा सकता है और न ही कुछ अतिरिक्त विशेष प्रभाव छोड़ा जा सकता है। सत्तर के दशक में यह धारणा बदली। इसका श्रेय हॉरर फिल्मों को गया जो रामसे परिवार की ‘फैक्टरी’ से निकलीं। विषय और प्रस्तुतिकरण हॉलीवुड की भुतहा फिल्मों से प्रेरित था लिहाजा किसी भूत या शैतान को दिखाने के लिए वहीं की तकनीक को देसी संसाधन व समझ से इन फिल्मों में अपना लिया गया। दक्षता उसमें उतनी नहीं आ पाई लेकिन एक नए प्रयोग की तो शुरुआत हो गई। 

यह प्रयोग मुख्य रूप से सहायक कलाकारों पर ही आजमाया गया। सितारों ने कभी इसका हिस्सा बनने का साहस या उत्साह नहीं दिखाया। अपने व्यक्तित्व को लेकर उनमें आत्म मुग्धता का भाव पहले भी था, आज भी है। संजीव कुमार ने मेकअप के सहारे अपने अभिनय को और ज्यादा दमदार दिखाने की पहल की। वैसे भी उनके बारे में माना जाता था कि वे अपनी उम्र और व्यक्तित्व से अलग रोल ज्यादा बखूबी कर पाते हैं। शुरुआती दिनों में बीस साल की उम्र में वे एक गुजराती नाटक में 70 साल के बूढ़े बने थे। उनके बालों में सफेदी लगा कर उनसे कई बुजुर्ग चरित्र कराए गए। लेकिन ‘अर्जुन पंडित’, ‘जानी दुश्मन’, ‘चेहरे पे चेहरा’ व ‘नया दिन नई रात’ समेत कई फिल्मों में उन्होंने विशेष रूप अपनाया। यह काम भारतीय मेकअप मैन ने ही किया। उस दौर में सरोश मोदी नई आजमाइश करने में सबसे आगे थे। 

‘जानी दुश्मन’ में गांव के जमींदार को हत्यारे पिशाच की शक्ल देने में उन्होंने खासा कमाल दिखाया। ‘चेहरे पे चेहरा’ का नायक दो व्यक्तित्व वाला है। उसके शांत और हिंसक रूप को संजीव कुमार ने तो तन्मयता से निभाया, उसमें मेकअप का भी बराबर का योगदान रहा। 

हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता का दायरा भले ही सबसे ज्यादा रहा हो लेकिन मेकअप कला को ज्यादा समृद्ध किया दक्षिण की फिल्मों ने। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि हिंदी में पौराणिक आख्यानों पर फिल्म बनाने का चलन चालीस के दशक के बाद खत्म हो गया जबकि दक्षिण में आज भी उस तरह की फिल्मों का सिलसिला खत्म नहीं हुआ है। 

ऐसी फिल्मों में विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए मेकअप सबसे मजबूत आधार होता है। फिल्मों में किसी एक कलाकार का दोहरी या तिहरी भूमिका निभाने का मौका तो कई बार आया है। शिवाजी गणेशन ने कोई चालीस साल पहले एक तमिल फिल्म में नौ रोल किए। इसे हिंदी में ‘नया दिन नई रात’ के नाम से संजीव कुमार को लेकर बनाया गया। सभी नौ रूपों में फर्क तो बहुत दिखा लेकिन कोढ़ी रूप का मेकअप इतना गजब का था कि उसमें संजीव कुमार का चेहरा गुम हो गया।

दक्षिण भारतीय फिल्मों में नए व अनुठे विषय अपनाने का उत्साह हमेशा रहा। उसके लिए तकलीफ उठा कर कलाकारों ने नया रूप भी ओढ़ा। यह साहस सामान्य कलाकारों ने नहीं बल्कि बेहद चर्चित सितारों ने अपनी साख और करिअर को दांव पर रख कर दिखाया। कमल हासन जिन दिनों तमिल फिल्मों में छाए हुए थे, उन्होंने ‘अप्पू राजा’ की। फिल्म में उनकी दोहरी भूमिका थी और उनमें से एक बौने का थी। 

उसके लिए उनके चेहरे का मेकअप से नक्शा बदला गया। बरसों बाद ‘जानेमन’ में अनुपम खेर ने यही रूप निभाया। अब शाहरुख खान आनंद एल राय की फिल्म में यही चुनौतीपूर्ण भूमिका करने जा रहे हैं। कमल हासन ने आगे भी मेकअप का सहारा लेकर कई तरह की पहल की। ‘चाची 420’ में तो उनका महिला रूप सर्वश्रेष्ठ रहा। विक्रम में ‘आई’ में एक और कदम आगे बढ़ाया। ‘बाहुबली’ ने तो दिखा दिया कि मेकअप क्या चमत्कार दिखा सकता है।

तीन दशक पहले महेश भट्ट की फिल्म ‘जुनून’ में मनुष्य के शेर बनने की प्रक्रिया को तकनीकी दक्षता के साथ-साथ मेकअप विशेषज्ञता का भी खासा सहारा मिला। लेकिन उसके बाद महेश भट्ट ने कई मौलिकता नहीं अपनाई। पहली कतार की फिल्मी हस्तियों ने भी उसमें रूचि नहीं ली। वजह सीधी सी है। कोई लोकप्रिय स्टार विशिष्ट मेकअप के लिए राजी नहीं होता। अब यह स्थिति बदल रही है। ‘फैन’ में शाहरुख ने मेकअप से अपना लुक बदला है। ‘गजनी’, ‘पी के’ और ‘दंगल’ में आमिर खान ने भी यह किया। अमिताभ बच्चन ने ‘पा’ के बाद ‘पिंकू’ व ‘वजीर’ में मेकअप की मदद से ही अपनी भूमिका को दमदार बनाया।

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