Loading... Please wait...

कब सधेगा दीपिका का निशाना?

श्रीश -- तुर्की के सैमसन में हुई तीरंदाजी की विश्व कप प्रतियोगिता में दीपिका ने कांटे के संघर्ष में कांस्य पदक जीत कर जता दिया कि उनकी प्रतिभा और अंतिम समय तक जूझने की क्षमता में कोई कमी नहीं है। सवाल उठता है कि एशियाई व ओलंपिक खेलों जैसे बड़े मंच पर जहां खिलाड़ी की श्रेष्ठता और कौशल की असली परीक्षा होती है, वहां दीपिका का निशाना क्यों नहीं सध पाता? विश्व कप में पहले भी चार रजत पदक जीत चुकीं दीपिका एशियाई और ओलंपिक खेलों के शुरुआती मुकाबलों में लगातार नाकाम क्यों होती रही हैं?

असीम संभावनाओं के साथ एक स्टार के रूप में उभरी दीपिका 2012 के लंदन ओलंपिक में हिस्सा लेते वक्त 17 साल की थीं। तब एक विशाल और भव्य आयोजन के शोर शराबे में वे निशाना चूक गई थीं। चार साल बाद रियो ओलंपिक में वे परिपक्व भी हो गई थीं और कड़े मुकाबले में जूझने का अनुभव भी वे पा चुकी थीं। शंघाई में हुए एक टूर्नामेंट में दीपिका ने 72 तीरों के रैंकिंग राउंड में 686 अंक जुटा कर लंदन ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता दक्षिण कोरिया की कि बो बाइ के विश्व रिकार्ड की बराबरी भी की। तीरंदाजी की विश्व कप स्पर्धाओं में दीपिका के नेतृत्व में भारतीय तीरंदाजों को जो उल्लेखनीय सफलताएं मिलीं उनके आधार पर रियो ओलंपिक में पदक मिलने की उम्मीद बढ़ी। 

राकला (पोलैंड) में विश्व कप के तीसरे चरण में दीपिका और मंगल सिंह चंपिया की जोड़ी ने मिश्रित रिकर्व टीम स्पर्धा में रजत पदक जीता। दीपिका ने लक्ष्मी रानी मांझी व रिमी बिरुइली के साथ मिलकर 2015 में कोपेन हेगन में हुई विश्व प्रतियोगिता में रियो के लिए टीम व व्यक्तिगत स्पर्धा में क्वालीफाइ कर लिया था। तैयारी के लिए उन्हें एक साल का समय मिल गया। 

सितंबर 2015 में तीनों टैस्ट इवेंट के लिए रियो गईं। आठ दिन उन्हीं परिस्थितियों में मुकाबला किया जिसमें ओलंपिक होने थे। ओलंपिक शुरू होने से करीब तीन हफ्ते पहले वे रियो पहुंच गई। इससे वहां के मौसम के अनुकूल खुद को ढालने में उन्हें मदद मिली। लेकिन कुल नतीजा सिफर रहा। जकार्ता के एशियाई खेलों में डेंगू की वजह से दीपिका के हाथ डगमगा गए। 

छोटे से गांव की सामान्य परिवार की दीपिका ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा और कड़ी मेहनत के बल पर जो आधार बनाया था उसे पिछले चार साल में और मजबूत जरूर किया है, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नहीं। लंदन ओलंपिक से पहले तुर्की के अताल्या में हुए विश्व कप में तीरंदाजी की व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में कोरिया की ली सुंग जिन को हरा कर दीपिका कुमारी ने स्वर्ण पदक जीता था। तब जूनियर वर्ग की वह विश्व विजेता थीं। 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने दो स्वर्ण पदक जीते। इससे एक साल पहले विश्व कैडेट खिताब वे अपने नाम कर चुकी थी। 

विश्व प्रतियोगिता में कांस्य पदक उनके नाम पहले से ही दर्ज था। इन उपलब्धियों के बल पर उम्मीदों का बोझ लादे चार साल पहले वे लंदन गई। दीपिका एक बड़े आयोजन के तनाव में लड़खड़ा गईं। लंदन ओलंपिक की विफलता के बाद जब दीपिका को खत्म हुआ मान लिया गया था, 2013 में विश्व कप के चार चरणों में व्यक्तिगत व टीम स्पर्धा में दो स्वर्ण, दो रजत पदक व एक कांस्य पदक दिला कर वे फिर सुर्खियों में आ गईं। 2014 में एशियाई खेलों में उनका निशाना चूका जरूर लेकिन 2015 में विश्व कप में वे फिर लय में आ गई।

तीरंदाजी भारत का पारंपरिक खेल भले ही रहा हो लेकिन लिंबा राम व डोला बनर्जी के चमकने के बाद ही वैश्विक स्तर पर इसमें भारत की उपस्थिति दर्ज हो पाई। 2007 के विश्व कप फाइनल में स्वर्ण पदक जीतने वाली डोला बनर्जी को ही यह श्रेय जाता है कि उन्होंने लड़कियों में तीरंदाजी के लिए शौक पैदा किया। दीपिका को प्रेरणा डोला की ही वजह से मिली। 2009 में टाटा तीरंदाजी एकेडमी में पहली बार डोला ने दीपिका को निशाना साधते और अपना स्कोर खुद नोट करते देखा था। डोला से मिलने के छह महीने के भीतर ही दीपिका ने विश्व जूनियर प्रतियोगिता जीत ली। एक साल के भीतर वे डोला के साथ खड़ी होकर सीनियर टीम में जगह पाने का दावा कर रही थी। 

2010 में नई दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने के बाद दीपिका की दुनिया ही बदल गई। पुरस्कार राशि और इनामों की बौछार होने लगी। दीपिका इससे बौखलाई नहीं बल्कि ज्यादा सुविधाएं मिलने से उनमें और बेहतर करने का संकल्प मजबूत हुआ। खर्च करने में वे आज भी किफायती हैं और ठाठ-बाट का आडबंर दिखाने से उन्हें परहेज है। उनके साथ यात्रा करने वाली उनकी बड़ी बहन, संरक्षक और प्रशिक्षक जैसी पूर्णिमा महतो कहती हैं कि दीपिका ने सेल फोन ही काफी बाद में खरीदा।

 पूर्णिमा का मानना है कि दीपिका की सबसे बड़ी खूबी निडरता है। वे सामने वाली खिलाड़ी की ख्याति की चिंता नहीं करतीं। विकट परिस्थितियों में भी हिम्मत बनाए रख कर कैसे सफलता पाई जा सकती है, यह दीपिका ने 2011 में तूरिन (इटली) में हुई विश्व प्रतियोगिता में दिखा दिया था। उसी प्रतियोगिता में लंदन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने का मौका था। लेकिन दीपिका का धनुष उस तक नहीं पहुंचा था। प्रतियोगिता शुरू होने से कुछ घंटे पहले ही दीपिका को धनुष मिला। तब भी उनके नेतृत्व में टीम ने रजत पदक जीत कर लंदन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया था। 

मुश्किलें और तकलीफ उठाने की आदत दीपिका को बचपन से रही है। अपना सपना पूरा करने के लिए   उन्हें कई बाधाओं को लांघना पड़ा। सबसे बड़ी बाधा तो अपने माता-पिता को इस बात के लिए राजी करने की थी कि वे उन्हें खेल में हिस्सा लेने दें। रांची से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर रातु चाती गांव में उनका जन्म हुआ। पिता शिव नारायण आटो रिक्शा चलाते हैं और मां दीपा देवी नर्स हैं। बचपन में पत्थर मारकर दीपिका ‘आम तोड़ती थी’ और क्या मजाल है कि उनका निशाना कभी चूका हो। बाद में बांस के धनुष से वह तीर चलाने लगी। मां दीपा देवी बताती हैं- ‘जब दीपिका दस साल की थी वह लोहारडग्गा से कोई 80 किलोमीटर दूर खरसावा गईं। वहां तीरंदाजी की कोई स्थानीय प्रतियोगिता थी जिसमें मेरे भाई की बेटी हिस्सा ले रही थी। दीपिका उसे देखने गई और तभी उसे तीरंदाजी से मोह हो गया। 

समझाने के बाद भी जब वह नहीं मानी तो उसके पिता और मैं मांगी हुई मोटर साइकिल से उसे खरवासा में हुई अगली प्रतियोगिता में ले गए। लेकिन वह ठीक से निशाना नहीं लगा पाई और एकेडमी में उसे दाखिला नहीं मिला। घर लौट कर वह लगातार रोती रहीं और जिद करती रही कि हम उसे एकेडमी में दाखिल कराने का कोई रास्ता तलाशे।’ पिता शिव नारायण महतो ने बताया- ‘मेरा एक दोस्त तबके मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा के लिए काम करता था। विचार आया कि अगर वे मदद करने को राजी हो जाए तो दीपिका का चयन हो सकता है। मीरा मुंडा ने दीपिका को देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि यह छोटी सी दुबली पतली लड़की भारी धनुष कैसे उठा पाएगी? लेकिन दीपिका को मौका दिया गया और उसे एकेडमी में प्रवेश मिल गया। मुझे बाद में पता चला कि दीपिका ने मीराजी से कहा था कि या तो तीन महीने एकेडमी में रह कर अपना खेल सुधार लेगी नहीं तो एकेडमी छोड़ देगी। 

तीन महीने में उसने बैकांक में हुई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में हिस्सा लिया और अपने खेल से सभी को अंचभित कर दिया।’ तुर्की के विश्व कप टूर्नामेंट (2011) के लिए रवाना होने से पहले पिता ने दीपिका से पूछा- ‘हर खिलाड़ी इतना लोकप्रिय है लेकिन तुम्हारा नाम अखबारों में क्यों नहीं आया।’ दीपिका का जवाब था- ‘इस टूर्नामेंट के बाद मैं हर अखबार में दिखूंगी’ बचपन में बांस के धनुष-तीर से निशाना साधने वाली दीपिका को एकेडमी में आधुनिक उपकरणों को इस्तेमाल करने का मौका मिला। शुरू में मां बाप से दूर रहना आसान नहीं था लेकिन बाद में आदत पड़ गई। माता-पिता ने उसका सपना पूरा करने के लिए कितनी तकलीफ उठाई, यह दीपिका कभी भूल नहीं सकतीं। 

वे कहती हैं- ‘पूरे परिवार के लिए वे दिन काफी परेशानी वाले थे। कई बार तो हमें पता ही नहीं होता था कि शाम का खाना जुट पाएगा या नहीं? लेकिन मेरे माता-पिता मुझे हमेशा प्रोत्साहित करते रहे।’ जमशेदपुर की टाटा तिरंदाजी एकेडमी का 2006 में हिस्सा बनने के बाद दीपिका को पूर्णिमा महतो और धर्मेंद्र तिवारी ने प्रशिक्षण दिया। तब उन्हें पांच सौ रुपए का मासिक भत्ता मिलता था। तीन साल बाद 14 साल की उम्र में विश्व कैडेट प्रतियोगिता में वे भारत की सबसे कम उम्र की चैंपियन बनीं। छोटी सी उम्र में दीपिका समझ गई थी कि अच्छा प्रदर्शन करने के लिए काफी कुछ गंवाना पड़ता है और लोकप्रियता की कीमत चुकानी पड़ती है। अपने अभ्यास में वे आज भी कोई ढील नहीं देती। रोज आठ घंटे अभ्यास करती हैं। 

सामान्य गरीब परिवार से निकल कर तीरंदाजी में भारत की ओलंपिक आशा बनने वाली दीपिका जानती हैं कि आने वाले ओलंपिक और एशियाई खेल उनके लिए सबसे बड़ी कसौटी होंगे। उनकी ख्याति और तमाम उपलब्धियों की असली परीक्षा होगी। यह वे समझती हैं कि विश्व कप की सफलता ओलंपिक में कोई मायने नहीं रखती। उसके लिए अलग तरह की मानसिकता और प्रदर्शन की जरूरत होती है। यह मानसिकता दीपिका में कब विकसित हो पाएगी, इसी पर सभी की निगाह है?

47 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech