Loading... Please wait...

उम्र घटी, मुनाफा बढ़ा 

इस बदलती हुई तस्वीर ने फिल्म निर्माण से जुड़ा आर्थिक जोखिम कुछ कम जरूर कर दिया है। लेकिन फिल्मों की उम्र कम कर दी है और उनके सालों साल यादगार बने रहने की संभावना खत्म कर दी है। निर्माताओं को भी अब इस बात की चिंता नहीं है कि उनकी फिल्म को धरोहर मान जाए। 1931 में भारत में पहली सवाक फिल्म ‘आलमआरा’ बनी थी। तब से अब तक जुबली मनाने व सौ करोड़ रुपए से ज्यादा कमाने का कारनामा सिर्फ दो फिल्में- ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ ही कर पाई। ‘हम आपके हैं कौन’ ने 36 सिनेमाघरों में पचास या ज्यादा हफ्तों तक चल कर गोल्डन जुबली व डायमंड जुबली मनाई। ‘दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ को भी ऐसी ही लंबी सफलता मिली। 

1943 में बनी ‘किस्मत’ कोलकाता के रॉक्सी सिनेमाघर में पौने चार साल लगातार चली लेकिन कुल सात करोड़ रुपए ही कमा पाई। ‘ऑस्कर’ के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय फिल्म ‘मदर इंडिया’ (1957) 52 जगह सिल्वर जुबली या गोल्डन जुबली मना कर भी दस करोड़ ही कमा सकीं। ‘मुगल-ए- आजम’, ‘जय संतोषी मां’, ‘शोले’, ‘राम तेरी गंगा मैली’ और ‘मैंने प्यार किया’ की सिल्वर, गोल्डन, डायमंड (साठ हफ्ते) व प्लेटिनम (75 हफ्ते) जुबली ट्राफियां वितरकों, निर्माताओं, कलाकारों व तकनीशियनों के घर दफ्तर की शोभा भले ही बढ़ाती रही हो, कमाई के मामले में कोई भी फिल्म पिछले दस साल की बाक्स आफिस पर एक दो अरब रुपए उगलने वाली फिल्मों के आसपास भी नहीं फटक पाईं। मामला सिर्फ महंगाई के फर्क का नहीं है। 

‘मदर इंडिया’ पच्चीस लाख रुपए में और ‘मुगल ए आजम’ करीब एक करोड़ रुपए में बनी थी। पिछले पंद्रह साल की अरबपति फिल्में औसतन पचास करोड़ से सवा सौ करोड़ रुपए में बनी। पिछली सदी के अंत तक जुबली मनाना फिल्म की सफलता के लिए अनिवार्य माना जाता था। उसी से बाजार में फिल्म के निर्माता या कलाकारों की साख बनती थी। राजेंद्र कुमार जुबली कुमार इसीलिए कहलाए क्योंकि उनकी लगभग हर फिल्म ने कम से कम सिल्वर जुबली जरूर मनाई। 

रामचंद्र, गोपाल तोरणे की फिल्म कंपनी ‘सरस्वती सिनेटोन’ की भाल जी पेंढारकर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘श्याम सुंदर’ ने मुंबई के तीन सिनेमाघरों में लगातार 27 हफ्ते चल कर भारत की पहली सिल्वर जुबली फिल्म होने का रिकार्ड बनाया था। उसके बाद से बीसवीं सदी के अंत तक जुबली मनाने का खेल फिल्में लगातार खेलती रहीं। 1975 में ‘शोले’ के साथ रिलीज हुई और कमाई के मामले में कई केंद्रों में उसे मात देने वाली आठ लाख रुपए की लागत से बनी ‘जय संतोषी मां’ ने 71 सिनेमाघरों में सिल्वर जुबली मना कर जो रिकार्ड बनाया, उसे कभी तोड़ा नहीं जा सका।

शक्ति सामंत की ‘आराधना’ ने वैसे तो कई सिनेमाघरों में जुबलियां मनाई लेकिन चेन्नई में हिंदी विरोध चरम पर होते हुए भी वहां के एक सिनेमाघर में यह फिल्म लगातार 75 हफ्ते तक चली। नई सहस्राब्दी में फिल्म की सफलता मापने का पैमाना बदला तो कई कारणों से। एक तो मल्टीप्लेक्स आ जाने से सिंगल स्क्रीन सिनेमा घरों की उपयोगिता खत्म कर दी। कई सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों को तोड़ कर मल्टी प्लेक्स बने। बेहतर रख रखाव न हो जाने की वजह से ढेरों पुराने सिनेमाघर बंद हो गए। जो रह गए उनमें से ज्यादातर दर्शकों के लिए उचित माहौल बनाए रखने में नाकाम रहे। पुरानी परंपरा में चार शो होते थे। मल्टीप्लेक्स में किसी फिल्म के दस बारह शो होना आम हो गया। इससे फिल्म देखने वालों को ज्यादा विकल्प मिल गए। टिकट दर ज्यादा होने के बावजूद मल्टीप्लेक्स लोगों को ज्यादा भाए। इसकी एक वजह मल्टीप्लेक्स का बेहतर रख रखाव रहा। ऑन लाइन बुकिंग की सुविधा मिल गई। शहरी मध्यम वर्ग की खर्च करने की क्षमता बढ़ने से मल्टीप्लेक्स की टिकट दर ज्यादा होना बाधा नहीं बन पाया।

पिछले डेढ़ दशक में और भी कई मामलों में स्थितियां बदली हैं। कारपोरेट घरानों के फिल्म निर्माण में रूचि लेने से निर्माताओं को वितरकों और फायनेंसरों का मोहताज नहीं रहने दिया है। पचास-सौ करोड़ रुपए में फिल्म बनना तो अब इसीलिए आम हो गया है। लागत और तेजी से बढ़ रही है। इतना भारी भरकम बजट इसलिए हो गया है क्योंकि निर्माताओं में यह भरोसा जम चुका है कि जितने करोड़ रुपए से वे फिल्म सीचेंगे, उससे कई गुना रुपए उनकी झोली में आ गिरेंगे। यह ठीक है कि सभी का दांव सही नहीं बैठता लेकिन फिल्म बाजार की व्यवस्था ऐसी बन गई है कि मुनाफा न भी मिले, लागत तो खींच तानकर निकल आती ही है। नई व्यवस्था में कोई भी निर्माता फिल्म रिलीज कर उसकी गुणवत्ता के आधार पर इतिहास बनाने का सपना नहीं देखता। व्यापक प्रमोशन के जरिए फिल्म के प्रति उत्सुकता जगा कर शुरुआती दिनों में ही ज्यादातर कमाई कूट लेने की रणनीति अब ज्यादा फल फूल रही है। इसमें सबसे बड़ा सहारा मिला है मल्टीप्लेक्स के विस्तार और उनमें फिल्म के आठ-दस या उससे ज्यादा शो कर सकने की सुविधा का। इसी ने प्रिंटों की संख्या बढ़ा दी है। 

1960 में ‘मुगल ए आजम’ के सौ प्रिंट रिलीज हुए थे। 1975 में ‘शोले’ के सात सौ प्रिंट निकाले गए। अब तो छोटी से छोटी फिल्म के तीन-चार हजार प्रिंट जारी होना आम हो गया है। यह सिलसिला दस साल में तेजी से बढ़ा है। 2004 में 'वीर जारा' 625 प्रिंट के साथ आई थी। 2009 में 'थ्री इडियट्स' के 1750, 2011 में 'रा वन' के 2900 और इस साल 'सुल्तान' के पांच हजार प्रिंट रिलीज हुए। जाहिर है कि जब धड़ाधड़ कमाई के नए साधन मिल गए तो सिल्वर जुबली का मोह कौन पाले? जमाना ढिढ़ोरा पीट कर अपना माल फटाफट बेचने का है। फिल्म धीरे धीरे दिल और दिमाग पर छाकर अपनी खुशबू महसूस कराए, इसकी फुर्सत न निर्माताओं को है न दर्शकों को। लोगों की अपना वीक एंड एंजाय करना है और निर्माताओं को उनके खाली समय और भरपूर पैसे का दोहन करना है। ऐसे में फिल्म स्थाई याद छोड़े, इसकी किसी को परवाह नहीं है।  

फिल्म बाजार की इस तेजी से बदली व्यवस्था ने फिल्म की चर्चा को अल्पकालिक बना दिया है। साल भर की बात तो दूर है, चार महीने पहले की फिल्म की याद भी खुरच जाती है। यही वजह है कि कोई भी फिल्म तात्कालिक हंगामा मचाने के बाद इतिहास में अपनी जगह नहीं बना पा रही है। फिल्म बाजार का बदला हुआ गणित तो खैर इसकी वजह है ही। सबसे बड़ी बात तो यह है कि फिल्म एक उत्पाद बन गई है। गुणवत्ता में रुचि खत्म हो गई है।  

फिल्म शुरू होने से पहले उसके रिलीज होने की तारीख तय होने लगी है। इससे सारी मशक्कत फिल्म को निर्धारित समय में पूरी करने में की जाती है। सलमान खान ने 2018 तक ईद पर अपनी फिल्म लाने का एलान कर दिया है। अजय देवगन की 'सन आफ सरदार' की सीक्वल फिल्म शुरू नहीं हुई है लेकिन उसका पोस्टर जारी कर दिया गया है और रिलीज की तारीख भी। अब जब फिल्म कारखाने में उत्पाद की तरह बनेगी तो जबर्दस्त मार्केटिंग की वजह से दो-तीन हफ्ते उसका ढिंढ़ोरा भले ही पिट जाए, उसकी उम्र लंबी नहीं हो पाती और अपनी स्थाई याद नहीं छोड़ पाती। 
 

130 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech