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विपक्ष क्यों न आडवाणी को चुने?

(image) शीर्षक मजाक लग रहा होगा! पर यदि नरेंद्र मोदी-अमित शाह अप्रत्याशित ‘आउट ऑफ बाक्स’ राजनीति कर रहे हैं, कांग्रेस के एसएम कृष्णा, नारायणदत्त तिवारी, सतपाल महाराज आदि को ले कर जनता में विपक्ष की भगदड़ दर्शा रहे हैं तो कांग्रेस, शरद पवार आदि क्यों नहीं आडवाणी, डा जोशी, य़शवंतसिन्हा आदि का मान-सम्मान कर जनता में यह मैसेज देते हैं कि यदि इनके नरेंद्र मोदी-अमित शाह नहीं हुए तो किसके होंगे! चुनौती राजनीति करने की है। जैसे को तैसा जवाब देने की है। यदि लालकृष्ण आडवाणी के पास जा कर ममता बनर्जी, शरद पवार उनसे राष्ट्रपति उम्मीदवार बनने का आग्रह करें तो क्या यह मोदी-शाह की राजनीति की काट नहीं होगी? यदि य़शवंत सिन्हा जम्मू-कश्मीर को ले कर खुद से एक्टीव है तो उन्हंे विपक्ष क्यों न अपनी जुबान बनाए? यदि शिवसेना के उद्दव ठाकरे बार-बार बोल रहे हैं तो शरद पवार या एनसीपी को उन्हें गिरगिट कहना चाहिए या हिंदू मानस-मराठा मानस के साझे की राजनीति सोचनी चाहिए? जैसा मैने परसों लिखा है कि विपक्ष की पहली जरूरत राजनीति करने की है। दूसरी जरूरत हिंदू मानस में भरोसा बनाने की है तो इस तरह के पेतरों से क्या विपक्ष जिंदा नहीं हो सकता? पिछले तीन सालों में हुआ क्या है? विपक्ष मर रहा है तो भाजपा और संघ परिवार के वे चेहरे आउट है जिनसे भाजपा बनी थी। भाजपा का मार्गदर्शक मंडल याकि बुजुर्ग नेताओं का ही हाल बुरा नहीं है बल्कि हर उस नेता का है जिस पर आज के आलाकमान की कृपा नहीं है। गुजरात की जस की तस पुनरावृति है। केशुभाई पटेल, कासीराम राणा, शंकरसिंह वाघेला या संजय जोशी जैसे जड़ों वाले नेता व सगंठक उखड़ रहे हंै और एक वटवृक्ष के नीचे सब समा गए हैं। सचमुच यदि सोचने बैठे तो भाजपा, संघ परिवार में बेरोजगारों की संख्या कम नहीं है। गोविंदाचार्य या संजय जोशी आज भी उपयोगी हो सकते हैं। क्या इन पर विपक्ष डोरे नहीं डाल सकता? नीतीश कुमार की क्या गोविंदाचार्य से नहीं पट सकती या गुजरात के बाबूभाई उर्फ अहमद पटेल संजय जोशी को कांग्रेस से न्यौता नहीं दिलवा सकतें? सवाल है यदि ऐसा करेंगे तो कांग्रेस या कथित सेकुलर नेताओं का क्या धर्म भ्रष्ट होगा? मुस्लिम बिदकेगा? कतई नहीं। इसलिए कि अभी तो सबके सामने जिंदा रहने का संकट है। जिंदा रहेंगे तब तो धर्म होगा। जिंदा रहने के लिए हाथ-पांव अनिवार्यतः मारने होंगे। राजनीति करनी होगी। बताना होगा कि हम भी हिंदू राजनीति कर सकते हंै! हालिया उदाहरण याद करें। क्या नवजोतसिंह सिद्धू को लेने के फैसले से राहुल गांधी का धर्मभ्रष्ट हुआ? उलटे पंजाब में भाजपा के कोर रहे हिंदू वोट कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हुए। आप पार्टी में यदि आज कुमार विश्वास छटपटा रहे हैं तो हिसाब से राहुल गांधी को यूपी में आगे के लिए कुमार विश्वास को पार्टी में लेने के लिए लपकना चाहिए। सीधे पार्टी महासचिव बना कर दिग्विजयसिंह की जगह बैठा दे तो कांग्रेस का दफ्तर चहकने लगेगा। पर उन्हे अमित शाह लपक लेंगे लेकिन राहुल गांधी या प्रिंयका गांधी सोच भी नहीं पाएंगे कि ऐसा हो भी सकता है।
विपक्ष की पहली जरूरत राजनीति करने की है। दूसरी जरूरत हिंदू मानस में भरोसा बनाने की है तो इस तरह के पेतरों से क्या विपक्ष जिंदा नहीं हो सकता? पिछले तीन सालों में हुआ क्या है? विपक्ष मर रहा है तो भाजपा और संघ परिवार के वे चेहरे आउट है जिनसे भाजपा बनी थी।
अपनी जगह हकीकत है कि 2009 के लोकसभा चुनाव की जीत के बाद राहुल गांधी-प्रियंका गांधी ने लालकृष्ण आडवाणी के प्रति जीत के बावजूद सम्मान दिखाया था। आडवाणी ने अपने संस्कार, अनुभव में सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि के साथ हमेशा सहज रिश्ता बनाए रखा। यह स्थिति विपक्ष के लगभग हर नेता की, पार्टी की आडवाणी, डा जोशी, यशवंतसिन्हा, अरूण शौरी आदि के साथ रही है। क्या उसका फायदा विपक्ष को अपने को जिंदा करने के लिए नहीं उठाना चाहिए? भाजपा के चेहरे हो या एनडीए की छोटी पार्टियां सब अपनी राजनीति के लिए मन ही मन छटपटाहट में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के यहां एनडीए के छोटे घटक दलों की वहीं स्थिति है जो शिवसेना की है। उद्धव ठाकरे यदि बार-बार तेंवर दिखाते हैं तो वजह उन्हंे यह मालूम होना है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की राजनीति उनके लिए प्राणलेवा है। यह स्थिति उपेंद्र कुशवाह की भी है तो कई उन पार्टियों की भी है जिनकी उपस्थिति महज संख्या दिखलाने की बन गई है। एक वक्त यह धारणा थी कि नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, चंद्रशेखर राव, शरद पवार, नीतीश कुमार जैसे एनडीए के पुराने सहयोगी कगार पर खड़ेे हंै एनडीए में आने के लिए। पर वह नहीं हुआ या नहीं हो सकता है तो बेसिक बात यह है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की हाइपर राजनीति में और किसी के लिए दो इंच जगह नहीं है। इसे गलत भी न माने। गांधी, नेहरू, इंदिरा सबने ऐसा किया था। नरेंद्र मोदी और अमित शाह जो कर रहे है वह राजनीति का स्वभाविक कायदा है। कांग्रेस और विपक्ष मुक्त भारत हो इससे बेहतर सत्तावान के लिए भला दूसरी बात क्या हो सकती है?
2009 के लोकसभा चुनाव की जीत के बाद राहुल गांधी-प्रियंका गांधी ने लालकृष्ण आडवाणी के प्रति जीत के बावजूद सम्मान दिखाया था। आडवाणी ने अपने संस्कार, अनुभव में सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि के साथ हमेशा सहज रिश्ता बनाए रखा। यह स्थिति विपक्ष के लगभग हर नेता की, पार्टी की आडवाणी, डा जोशी, यशवंतसिन्हा, अरूण शौरी आदि के साथ रही है।
राजनीति और निज सत्ता के खेल में साम, दाम, दंड, भेद सभी का उपयोग शाश्वत है। अनहोना, अकल्पनीय अंदाज ही लोगों की मनोदशा को झिझोडता है। इसी के चलते हिंदू मानस आज बावला हुआ पड़ा है। उसे सहज, सामान्य बनाना विपक्ष की नबंर एक जरूरत है। इसके लिए ऑउट ऑफ बाक्स राजनीति जरूरी है तो चौबीस घंटे राजनीति की धुन रखना भी जरूरी है। उस नाते शरद पवार ने ठिक कहा कि राहुल गांधी को अपने को अधिक दिखलाना होगा। यह बात आज की तारीख में सभी विपक्षी नेताओं पर लागू है। आगे यह भी जरूरी है कि ये बहुसंख्यक वोटों में दिखलाई दे। यों तथ्य है कि आज भी विपक्ष का हिंदू आधार है। मैं जो लिख रहा हूं उससे यह अर्थ नहीं निकाले कि सारा हिंदू मोदीमय हो गया है। खतरा यह है कि जो हिंदू मोदीमय नहीं है वह 2019 में या 2024 तक विपक्ष के खत्म होने के साथ विकल्पहीनता की स्थिति में बेगाना बनेगा। उसका ठिकाना नहीं रहेगा। वैसी स्थिति देश-समाज और वक्त की चुनौतियों में बहुत खतरनाक होगी। इसलिए कि मोदी-शाह ने जो मिशन सोचा हुआ है उसमें हिंदू अंततः दो हिस्सों में बुरी तरह बटेगा और भक्त व विरोधियों के दो खेमों की दिशाहीन अवस्था भारत राष्ट्र-राज्य के लिए अकल्पनीय संकट पैदा करेगी। तभी विपक्ष का जिंदा रहना जरूरी है तो हिंदू मानस में राजनैतिक खदबदाहट की, बफर की जरूरत भी है। क्या लगता है कि विपक्ष यह सब सोचने की स्थिति में है? मेरा मानना है वह नहीं बूझ रहा संभावी सिनेरियो को।
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