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विपक्ष गठजोड़ भूलें, फिलहाल राजनीति करें!

(image) आज दिल्ली में मई दिवस और मधु लिमये के बहाने विपक्षी नेता अपने चेहरों का सामूहिक फोटो शूट कराएंगे। मतलब गठजोड़ बनाने की तरफ विपक्ष बढ़ता दिखलाई देगा। यह विपक्ष की आत्मघाती एप्रोच है। आखिर यही तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह चाहते हैं कि 2019 से पहले विपक्ष ऐसा महागठबंधन बनाए जिससे वे हिंदुओं में कह सके देखों ये सेकुलरवादी उन्हें हराने के लिए इकठ्ठा हुए हंै! अपनी थीसिस है कि पूरा विपक्ष इकट्ठा हुआ तो हिंदू ज्यादा गोलबंद होगा। तब वह इतना गोलबंद होगा कि बंगाल, ओडिसा, केरल का हिंदू भी जज्बाई बन नरेंद्र मोदी की 45-50 या 55 प्रतिशत की वोट आंधी बनवा देगा। भले एलायंस गणित से एकजुट विपक्ष 30-35 प्रतिशत वोट पा ले पर तब भी ताकता रह जाएगा। सो अपना मानना है कि विपक्ष की पहली जरूरत है कि वह हिंदू मानस, उसके पर्याय बने नरेंद्र मोदी-अमित शाह, योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कोई औपचारिक एलायंस तब तक न बनाए जब तक वह हिंदूओं में भरोसे बनाने की पहले राजनीति न करे। अन्यथा सोचें कि यूपी में सपा-बसपा- कांग्रेस ने एलायंस बना कर अगला लोकसभा चुनाव लड़ा तो हिंदू वहा कैसे रिएक्ट होगा? वह सोचेगा, अच्छा ये मुसलमानों का राज लाना चाहते है! और यह मनोभाव मई 2019 में हिंदूओं का 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नरेंद्र मोदी को दिलवा देंगा। और ऐसा सब तरफ होगा। सो विपक्ष का एलायंस बनाना गणित के नुस्खे के नाते ठीक है लेकिन उसके जवाब में नरेंद्र मोदी-अमित शाह हिंदुओं में अपनी और बड़ी गणित बना लंेगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि नरेंद्र मोदी-अमित शाह हिंदू को पल-पल पकाने की राजनीति कर रहे हंै! जबकि ठीक विपरीत विपक्ष मई दिवस का लाल सलाम कर रहा है या मधु लिमये का सेकुलर झंडा उठा रहा है।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह चाहते हैं कि 2019 से पहले विपक्ष ऐसा महागठबंधन बनाए जिससे वे हिंदुओं में कह सके देखों ये सेकुलरवादी उन्हें हराने के लिए इकठ्ठा हुए हंै!
एक मायने में आज की यह हकीकत राजनीति में पक्ष-विपक्ष की मौजूदा तासीर के फर्क की पहचान है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और इनकी भक्त फौज सोशल मीडिया में हिंदू, हिंदू बात कर रही है तो नीतीकुमार, यचूरी, सोनिया गांधी, शरद पवार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, मायावती, अखिलेश यादव, मुलायमसिंह यादव आदि तमाम चेहरे अपने उन जुमलों, उस वर्ग, उस राजनीति से चिपके हुए हैं जिसके ग्राहक या तो मुसलमान हैं या जात, वर्ग के छोटे-छोटे खेमे हैं। तभी राजनीति आज इतनी असमान बन गई है कि मोदी-शाह-योगी पल-पल लाइव है तो विपक्ष मई दिवस, मधु लिमये के बहाने दिल्ली के कांन्स्टीट्यूट क्लब जैसे ठिकानों से यदा-कदा प्रकट होता है! दोनों तरफ के मकसद का फर्क देखिए। अमित शाह भारत को कांग्रेस मुक्त, विपक्ष मुक्त बनाने का मिशन लिए हुए हैं। नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने इसके लिए तमाम औजार अपना रखे हैं। सत्ताबल-धनबल मीडियाबल-सबसे विपक्ष को उलझा दिया है। इसके दबाव में अलग विपक्ष ऐसे भंवर में है कि वह यदि भारत को मोदी मुक्त बनाने की बात भी करंे तो हिंदूओं के बिदकने का खतरा होगा! अपना मानना है कि भंवर बहुत गहरा है और विपक्ष इसकी गहराई की थाह नहीं ले पा रहा है। वह परंपरागत, कंवेशनल अंदाज में राजनीति कर रहा है, सोच रहा है। सचमुच सोनिया गांधी, शरद पवार, नीतिश कुमार, ममता बनर्जी, सीताराम यचूरी आदि किसी को अंदाज ही नहीं है कि जमीन पर राजनीति क्या हो गई है! ये राजनीति नहीं कर रहे है। इनकी राजनीति में अधिक से अधिक तत्व अपनी निज राजनीति को चमकाने की फालतू की उधेड़बुन है फालतू इसलिए क्योंकि मोदी-शाह इन सबको भंवर में डुबो देने का रोडमैप बनाए हुए है। ये बहुसंख्यक मतदाताओं याकी हिंदू राजनीति करके उसे अपनी स्थाई जमा पूंजी बना लेंगे। इस संभावना से विपक्ष कुछ बेखबर है तो इस लाचारी के चलते तमाशबीन भी है कि ये जो कर रहे है वह सब करना उनके बस में नहीं है!
अमित शाह भारत को कांग्रेस मुक्त, विपक्ष मुक्त बनाने का मिशन लिए हुए हैं। नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने इसके लिए तमाम औजार अपना रखे हैं। सत्ताबल-धनबल मीडियाबल-सबसे विपक्ष को उलझा दिया है।
तब एलायंस बनाने से क्या होगा? फिर बता दू कि एलायंस का मतलब गणित निश्चित ही है। मायावती- अखिलेश- कांग्रेस का एलायंस एक जोड़ एक याकि दो होगा। मतलब अपनी जगह यह जरूरत है कि यूपी में ये तीनों पार्टियां 2019 में तभी बचेगी जब तीनो के वोट साझा हो। बावजूद इसके वह जीत की गारंटी इसलिए नहीं होगी क्योंकि मोदी-शाह- योगी गणित के साथ हिंदू भावना की केमेस्ट्री में 1 और 1 ग्यारह वाली राजनीति कर रहे हैं। हिंदू यदि मुसलमान के खौफ में, श्मशान-कब्रिस्तान के जुमलों में मूर्ख बन, भावना में बह, चिंता में आ कर विधानसभा चुनाव में यदि सुनामी ला सकता है तो वह मई 2019 में देश के चुनाव में मुस्लिमपरस्त मानी जा रही पार्टियों के एलायंस को देख कर तो और अधिक भड़क सकता है। तब हिंदूओं की 50-55 प्रतिशत वोटिग जैसा कमाल भाजपा कर देगी। तभी गणित के अलावा आज उस राजनीति की अधिक जरूरत है जिसने बहुसंख्यक वोटों को एक दिशा में धकेला हुआ है। मुंबई के महानगरपालिका चुनाव नतीजो के दिन मैंने लिखा था और आज फिर उस बात को दोहरा रहा हूं कि यदि वहां लड़ाई दो हिंदू पार्टियों में बन गई है और कांग्रेस नंबर तीन पर गई है तो अर्थ है कि यूपी के देवरिया का देहाती हिंदू हो या मुंबई का पढ़ा-लिखा कॉस्मोपोलिटियन और आईटी कर्मी हिंदू नौजवान सब एक भगवा रंग में रंग गए हंै। सो विपक्ष या तो भगवा का एक शेड अपनाए या इस भगवा के दोष प्रमाणित करे तब कांग्रेस याकि विपक्ष के पुराने दिन लौट सकते हंै। शरद पवार मराठा नेता है। मराठाओं ने जात आरक्षण का बिगुल बजाया। बावजूद इसके नगरपालिका चुनावों में शरद पवार की पार्टी पीटी और एनसीपी-कांग्रेस की साझा गणित भी उखड़ी दिख रही है तो दो ही बाते हंै। या तो शरद पवार रिटायर हो या वे ऐसी राजनीति करे जिससे मोदी-शाह-उद्वव ठाकरे के हिंदूओं का मोहभंग हो और उनसे उम्मीद करने लगे।
एलायंस बना कर गणित को पक्का करने और वक्त के इंतजार की थ्योरी भी अपनी जगह ठीक है मगर राजनीति का बेसिक तत्व है कि सत्ता तभी पाते है जब एक्टीव रहे।
सवाल है क्या इस लाईन पर शरद पवार, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, मुलायमसिंह, मायावती सोंच रहे होंगे? लगता नहीं है। ये सब राजनीति को सामान्य पुराने अंदाज में इस तरह ले रहे है मानों वक्त अपने आप नरेंद्र मोदी-अमित शाह का ग्राफ उतरवा देगा। आखिर कोई कितना ही शातिर नेता हो, वह भले स्वर्ग धरती पर उतार दे अंततः उसे जनता की निगाहो में उतरना है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जब धूल-धुसरित हुए तो मोदी- शाह क्या है! यह तर्क अपनी जगह ठीक है। ऐसे ही एलायंस बना कर गणित को पक्का करने और वक्त के इंतजार की थ्योरी भी अपनी जगह ठीक है मगर राजनीति का बेसिक तत्व है कि सत्ता तभी पाते है जब एक्टीव रहे। सत्ता की धुन, उसके लिए साम,दाम, दंड, भेद से अपने आपको झौंके रखे। लौकतंत्र में इसका बीज मंत्र बहुसंख्यक का वोट है। उस पर फोकस करके राजनीति जब तक नहीं होगी तब तक न माया मिलेगी और न राम! यही वह चुनौती है जिसमें विपक्ष न केवल किंकर्त्वयमूढ़ है बल्कि नासमझी, चेहरों की कमी जैसी दस तरह की कमियों का भी मारा है।
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