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मुसलमान कैसे समझें?

(image) और समझाने की कोशिश सर्वत्र है। दुनिया समझा रही है। डोनाल्ड ट्रंप समझा रहे हैं तो नरेंद्र मोदी भी समझा रहे हंै। इसी रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम नौजवानों को समझाया। उनसे कहा कि टेरेरिज्म बनाम टूरिज्म से एक को चुनने का विकल्प है। हिंसा और रक्तपात से भला नहीं हुआ करता। पर क्या इसे खुदा के बंदों ने सुना होगा? आज ही खबर थी कि पाकिस्तान के सरगोधा में सूफी मजार के 20 श्रद्वालुओं को टार्चर करके मारा गया। श्रद्वालु भी मुसलमान और मारने वाले भी मुसलमान। पर न आंखों देखा खून सोचने को मजबूर कर रहा है और न समझाने की कोशिश गले उतर रही है। हिसाब से देखा जाए तो दुनिया में आज जो हो रहा है उसके कोर में इस्लाम है। अमेरिका, यूरोप, डोनाल्ड ट्रंप से वैश्विक पैमाने पर राजनीति पूरी तरह इस्लाम केंद्रित हो गई है तो भारत में भी इस्लाम और उसके बंदे वह कारण है जिससे हल्ला है तो कोई ठहरा, ठिठका, सहमा हुआ तो कोई बम-बम है। हम सबके जहन की, दुनिया और भारत के दिल-दिमाग की यदि आज नंबर एक चिंता कोई है तो वह इस्लाम और मुसलमान है। चिंता के दो पहलू हैं। एक, मुसलमान के भीतर की चिंता और दूसरे बाहरी लोगों की, गैर-मुसलमानों की चिंता। दोनों तरफ जो चिंता है उसमें कहीं कोई वह बिंदु ही नहीं है जिससे यह सोचा जाए कि एक-दूसरे की बात सोचने-समझने का यही से प्रारंभ संभव है। हां, यह बहुत अजीब बात है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में हुकूमत भले मुसलमान की है लेकिन मुस्लिम प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या एलिट जमात की भी वहा वह औकात नहीं जो इस्लाम को समझा सके कि आंतक से, खूनखराबे से बनेगा क्या! यही स्थाई असुलझी ग्रंथी है। इसमें भारत का मामला ऐतेहासिक कारणों से कुछ अलग है। आज के सवा सौ करोड़ लोगों के भारत में जो भी खदबदाहट है उसका कोर हिंदू बनाम मुसलमान के रिश्तों की एक इतिहासजन्य विरासत है। इतिहास ने हिंदु बनाम मुसलमान, जम्मू-कश्मीर और रामजन्मभूमि, गौवध आदि के जितने जो घाव दिए हुए है उससे बार-बार ढाक के तीन पात वाली स्थिति आ खडी होगी। कोई कितनी ही तटस्थता से, ईमानदारी से गुथियों को सुलझाने की कोशिश करें अंततः बात वहीं आ कर टिकेगी कि क्या करें और क्या होगा? अपना मानना है कि 70 सालों से सेकुलर भारत ने, नेहरू के ऑईडिया ऑफ इंडिया ने, भारत के सेकुलर हिंदू बौद्धिकों ने मुसलमान को समझाने की ईमानदारी से भरपूर, गजब कोशिश की। लेकिन इस्लाम ने नेहरू को फेल किया। भारत के सेकुलर बौद्धिकों को धोखा दिया। उन्हे न घर का रहने दिया और न घाट का! कितनी बड़ी और गंभीर बात है यह! पंडित नेहरू ने मुस्लिम भावना की इज्जत की व शरिया और तीन तलाक को चलने दिया तो शायद यह सोचते हुए कि वक्त के साथ मुसलमान और इस्लाम अपने आप आधुनिक होगे। हिंदुओं के पर्सनल लॉ को जोर-जबरदस्ती नेहरू ने बदलवाया। हिंदू धर्म और समाज को आधुनिक बनाने की इच्छाशक्ति दिखाई मगर इस्लाम को ले कर यह सोचा कि मुसलमान बहुसंख्यक आबादी के साथ रहते हुए, उन्हें देखते हुए अपने आप वक्त अनुसार बदलेंगे। मगर भारत के मुसलमानों ने नेहरू, राजीव गांधी सहित उन तमाम सेकुलर पार्टियों को निराश किया, उन्हंे फेल करार दिया जिनके खिलाफ भाजपा यह आरोप लगाते हुए राजनीति करती थी कि ये तुष्टीकरण कर रहे हंै। हां, भारत के मुसलमान की सबसे बड़ी नाकामयाबी यह है कि उसने उन लोगों को फेल किया, उस सेकुलर राजनीति को बरबाद किया जो उनकी चिंता में बनी और ढली थी। तभी आज वह मुकाम है जब वक्त केंद्र की मोदी सरकार का है और सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक के मसले पर लगातार सुनवाई कर फैसला देने का निश्चय बनाया है। आप माने या न माने, अपना मानना है कि 11 मई से सुप्रीम कोर्ट जब इस मामले में सुनवाई शुरू करेगा तो उन बीस करोड़ लोगों की उस पर टकटकी लगी होगी और उसमें वह सोच विचार होगा जो 70 साल के इतिहास में पहले सिर्फ एक बार हुआ था। बाबरी मसजिद के ध्वंस के वक्त देश के मुसलमान ने जो सोचा था उसमें सांकेतिक अर्थ ज्यादा थे जबकि अब निज जीवन व्यवहार, परिवार-समाज व्यवस्था को ले कर वह मन ही मन सोचता रहेगा कि यह क्या हो रहा है? निश्चित ही भारत का मुसलमान अंदर ही अंदर इस चिंता में आज इसलिए घुला हुआ होगा कि आखिर उसका जीना प्रभावित है। सोचें जरा इनकी आज की मनोदशा पर! नरेंद्र मोदी, भाजपा, आरएसएस, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ के चेहरों के साथ हिंदुओं की मनोदशा में जो बदलाव आया है उससे मुसलमान पर क्या गुजर रही है? जमात सियासत में बेमतलब हो गई है। बूचड़खानों पर कार्रवाई हो या मीट मांस का धंधा तो खानपान से ले कर तीन तलाक, राम जन्मभूमि के तमाम मसलों ने मुस्लिम समुदाय में अनिवार्यतः यह सवाल खड़ा किया हुआ होगा कि करंे तो क्या करंे? जाएं तो कहां जाएं? तभी यह मोड़ है मुसलमान को समझदार बनाने का। यों कई हिंदू सोंच सकते हंै कि जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है। इनका दिमाग दुरूस्त हो रहा है। वे जब समझने को तैयार नहीं है तो हम क्यों समझे? वे नहीं बदल सकते तो हम उनकी चिंता में क्यों रहे? हमें क्या लेना-देना? उलटे अच्छा है इन्होने हम हिंदूओं में गोलबंदी बनवा दी है। यह एप्रोच सही नहीं है। घातक है। हमें अनिवार्यतः चिंता करनी होगी। इसलिए कि लौकतंत्र ने हम बहुसंख्यक हिंदुओं का राष्ट्र-राज्य बनवाया है तो इसे चलाना, पुख्ता बनाना हमारा ही दायित्व है। हमें ही सोचना होगा कि आबादी के 20 प्रतिशत हिस्से को उसके हाल पर छोड कर, उसे अछूत होने देने से क्या बनेगा? तब फिर सवाल आता है कि हमारे या किसी के भी बस में मुसलमाम को समझाना क्या संभव है? न पहले कोई समझा पाया, न दुनिया समझा पा रही है तो भाजपाई राज में तो यह कतई संभव नहीं है। तभी जहां से बात शुरू हुई वही से आगे बढते हैं कि मुसलमान कैसे समझें?
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