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शाहिद भाई बात सही पर और बूझे

(image) अपन पाठक को माई-बाप मानते हैं। मेरा संतोष पाठक का पढ़ना है। कोई कुछ भी बोले, कमेंट करें मैं रिएक्ट नहीं होता। 11 नवंबर से आज दिन तक की घटनाओं में दो विषय मेरी लेखनी में ज्यादा छाए रहे। एक नोटबंदी का और दूसरा इस्लाम का। इन पर रिएक्शन भी सर्वाधिक आए। दुर्भाग्य की ज्यादातर डिलिट करके कूड़ेदानी में डालने लायक थे। यदि मैं ट्रेस में डाले कमेंट को जस का तस छापू तो निकलेगा कि भारत इस समय गालियों, मूर्खताओं की जुमलेबाजी में सांस ले रहा है! अपने को खटका होने लगा है कि अमेरिका, यूरोप की यह कोई चाल तो नहीं जो फेसबुक, टि्वटर जैसे औजार से भारत को बौद्धिकता में श्रीहीन बना दे रहा है। इसलिए कि अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय देश इस मीडिया का बौद्धिक रिफरेंस, रिस्पोंस में उपयोग करते हैं जबकि भारत में इनका उपयोग गालियों के लिए बना है। नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल ने और कमाल किया जो फोलोवर को सोशल मीडिया के लंगूरों में कनवर्ट करके गालियों का ऐसा देशज शब्द भंडार बनवा दिया है जिसमें सवा सौ करोड़ लोगों का बौद्धक बल सिर्फ और सिर्फ गालियों को गढ़ने का है। सोशल मीडिया का यदि तीन-चार साल का भारत रिकार्ड कंपाइल कराएं तो गालियों का हिमालय बना निकलेगा। उस नाते अर्मत्य सेन को अब अपनी पुस्तक का शीर्षक अरग्यूमेंटिव इंडिया याकि तर्कबाज भारत की जगह गालीबाज, जुमलेबाज इंडिया करना चाहिए। तर्क, दलील नहीं फिकरे, भक्ति, गुणगाण, वाह, सत्यानाश के जुमलों में देश की बद्धि बंध गई है। वक्त ने आज भारत को बुद्धि मुक्त, तर्कमुक्त विमर्श में जैसे कनवर्ट किया है उस पर जितना सोचंे कम होगा। सोचने का वक्त भी तब मिले जब आप गाली या प्रशंसा मुक्त हो और तर्क में से पक्ष या विपक्ष सोचते हुए अपना तर्क सोचे और दो वाक्य तर्कसंगतता से लिखे या कहे। बहरहाल, इस्लाम पर 3 से 7 अप्रैल की सीरिज में एक गौरतलब प्रतिक्रिया आई। उसे पढ़ मैं सोचने को मजूबर हुआ। 7 अप्रैल को मुस्लिम मानस को आग्रह करते हुए मेरा कॉलम था- सऊदी खुराक,बहकावा छोड़े! इस पर किंही शाहिद ने कोई 412 शब्दों की प्रतिक्रिय भेजी। अच्छा लगा। एक तो हिंदी में इतने शब्द लिखना मामूली बात नहीं। जैसा मैंने ऊपर कहा कि भारत में विमर्श अब जुमलों से है। याकि मोदी का दलाल, केजरीवाल का दलाल, संघी, प्रेस्टीच्यूत, राष्ट्रद्रोही, आदि, आदि। सो शाहिद का यह लिखा सुखद आश्चर्य है - क्या सीरिया, इराक की आज की स्थिति वहाबी-सलफी विचारधारा के कारण है ? सद्दाम हुसैन के पराभाव का कारण यदि सल्फीवाद है तो इस समझ पर मुझे रोना आता है । क्या कारण है कि गद्दाफी , असद, सद्दाम की तानाशाही एक के बाद एक ढहती चली गई। इन सबके रहते हुए कौन से लोकतांत्रिक मूल्य इन देशों में स्थापित हो पाए। तुर्की मे सत्ता पलट की नाकाम कोशिश को क्या नाम दिया जाए ? क्या तुर्की का समाज भी सलफीवाद से प्रभावित है? मिस्र में चुनी हुई सरकार के साथ क्या सलूक किया गया? क्या वहां लोकतंत्र की हत्या नहीं की गई? जब एक व्यवस्था असफल होती है तो दूसरा उसका स्थान लेती है उस नई व्यवस्था से आप चाहे जितना असहमत हों। भारत में यदि भाजपा सरकार स्वीकार्य है तो मिस्र की मुर्सी सरकार किन कारणों से नाजायज हुई? क्या भारतीय बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग जो भाजपा का तो समर्थक है परंतु मुर्सी का विरोधी नहीं रहा है ? जनाब भाजपा की कामयाबी में तथाकथित सेकुलर दलों की बौद्धिक, वैचारिक ,सामाजिक , आर्थिक असफलताओं का भी विश्लेषण करें। और याद रखें सल्फीवाद भी लोगों द्वारा अगर अस्वीकार किया जाएगा तो वो खतम हो जाएगा। सऊदी सरकार भी उसे भारत में स्थापित नहीं करा पाएगी। अब जरा आपके सूफीवाद को भी थोड़ा समझा जाए। सूफीवाद के अधिकांश गढ़ क्या आजकल हिन्द व पाक में मठालय का रूप नहीं पा गए है?। सरकार बदली ,मठालयों की वफादारी भी तुरंत बदल जाती है । अजमेर दरगाह के दरबारी का ताजा उदाहरण सामने है। भाजपा की वर्तमान सरकार ने भी पुरस्कृत करने में जरा भी देरी नहीं की।…सिद्धांतरूप में चाहे आप कितनी भी तारीफ करें पर ग्राऊंड रियल्टी कुछ और ही है। इस छद्म सूफीवाद ने समाज में कुरीतियों, अंधविश्वास, और ढकोसले को ही बढ़ाया है। सलफीवाद तभी अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है। रहा सवाल आप बुद्धिजीवियों का तो आप चाहते है कि सभी समाज,धर्म ,समुदाय आप के हिसाब से सोचें। पर जब इंसाफ की बात आती है तो आप भी अगर,मगर की भूलभुलैया में लोगों को भटकाने से बाज नहीं आते। तब आपकी कलम भी कुटिल बौंद्धिक चरमपंथी की तरह होती है। यह लिखा अपने को जंचा। पता नहीं शाहिद कौन है। पर जो कहा है वह दलीलपूर्ण है। बिल्कुल सही बात है कि इराक, मिस्र में नासर, सद्दाम हुसैन वामपंथी विचारधारा में रंगे हुए थे। ये सऊदी अरब से एलर्जी रखते थे तो ईरान में हुकुमत उस पहलवी वंश की थी जो अमेरिकी और पूंजीवादीपरस्त थी। ये पीटे या फेल हुए तो इस्लाम के वाहबी असर के कारण नहीं बल्कि अपनी तानाशाही से। अरब देशों में पचास-साठ-सत्तर के दशक में आधुनिकता, वामपंथ असर वाले कई प्रयोग थे इनकी नाकामयाबी ने ही खुमैनी और वाहबी प्रभाव बनवाया। यह भी सही है कि मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड को ऐसे कुचला-दबाया गया कि अंत में जनक्रांति हुई और मुर्सी चुने गए। उनका चुनाव लोकतंत्र से था मगर वे पुराने सेटअप को बरदास्त नहीं हुए! मतलब मुस्लिम आबादी की सियासी तासीर वक्त के थपेड़ों में बदलते-बदलते आज वाहबी असर में, धर्म की कट्टरता में मुक्ति खोज रही है तो उसे समझा जाना चाहिए। पर शाहिद भाई, आपके ही तर्क से अपना तर्क फिर यह है कि 60-70 साल के वक्त का कुल निचोड़ क्या है? क्या यह नहीं कि धर्म की धुट्टी कुछ ऐसी है कि वह लोकतांत्रिक स्वरूप बन ही नहीं पाता। सही बात है कि इस्लाम के बंदे अपने धर्म के अनुसार सोचें। हम क्यों फोर्स करे या चाहे? पर उन्हे दुनिया में, किसी पड़ोस में तो रहना है! आज के वक्त में तो जीना है। आप शरिया के वक्त में ही रहे। जिद्द करे कि पड़ोस को बदल देंगे, दारूल इस्लाम बना देंगे। खलीफा स्टेट बना देंगे तो कैसे सह-अस्तित्व बनेगा। और पड़ोसी क्यों नहीं रिएक्ट होगा? वहाबी की जिद्द सबको एकसा, अपना सा बनाने की है। इसी कारण भारत का मुसलमान भी यह जिद्द किए बैठा है कि हमें अरबों की आंख भींचकर नकल करनी है। देश-काल, वक्त और अनुभव में सूफी या और कोई फिरका बना है तो वह करप्ट है, यह मान कर उसे खारिज कर मूल वहाबी लाना क्या तुक वाली बात है। मूल में गड़बड़ थी, नई चाहना थी तभी तो सूफी संत हुए। संदेह नहीं कि सूफीवाद ने कुरीतियों, अंधविश्वास, और ढकोसले को बढ़ाया है। पर ऐसे ढकोसले, ऐसे फिरको को वक्त अपने आप मारता जाता है। उन्हे मारने के लिए वहाबी आतंकी दरगाहों पर हमले करें तो क्यां उससे धर्म का कुछ बनेगा? तर्क –दर-तर्क और कुर्तक में समझने वाली बात इतनी भर है कि इस्लाम में भला ऐसा क्यों है कि न नासर, सद्दाम, पहलवी और सऊदी शेख देश को लोकतंत्र दे पाए और न धर्मावलंबियों को आजादी दिलाई और न दूसरे धर्मों के साथ सह-अस्तित्व की मिसाल बनवाई। अपना मानना है कि वहाबी-सल्फीवाद में तो यह बिल्कुल ही संभव नहीं है। गौर करें, मुस्लिम ब्रदरहुद के पूरे वैश्विक कैनवास को। इसमें यदि कायदे से लोकतंत्र का आधा-अधूरा प्रयोग हुआ है तो वह हिंदू विरासत वाले भारतीय उपमहाद्वीप से ले कर इंडोनेशिया के बीच ही है। तुर्की में जो हुआ वह एक महानायक अतातुर्क की जिद्द, हिम्मत का अपवाद है जो वापिस तानाशाही की और बढ गया है। बाकि इस्लाम के जन्म इलाके से ले कर पूरे अरब में निरंतर, तानाशाही थी और है। आखिर में फिर पते का आग्रह है कि खुदा के बंदों धर्म को फतवा, जिहाद, तानाशाही, शरिया, हजार साल पुरानी जिद्द से मुक्त बनाओ। उसमें खिलने दो सौ फूल और उसके साथ खुद भी महको! जो हो, शाहिद का धन्यवाद। पढ़ा, सोचा, दलील दी कितनी अच्छी बात।
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