श्रेष्ठ फिल्म और वह वक्त

और यह बात हॉलीवुड की फिल्मों पर अनिवार्यतः लागू है! जो देश अच्छा होगा वहां सब अच्छा होगा। जैसा मैंने परसों लिखा कि मैं अमेरिका का कायल उसकी श्रेष्ठताओं से हूं। यह श्रेष्ठता, स्वंतत्रता की उसकी तासीर की बदौलत है। इसलिए कि मौलिक उपलब्धि, कृति, रचना आदि तभी संभव है जब स्वतंत्रता हो। इसे दस तरह से दस क्षेत्रों के हवाले बताया जा सकता है। मगर फिलहाल बात क्योंकि फिल्म पर है, द पोस्ट पर है सो अपना इतना भर कहना है कि कहानी सुनाने, दिखाने में ब़ॉलीवुड का जवाब नहीं है। 

अपने को कहानी के तमाम रूप पसंद रहे है। कथा साहित्य, उपन्यास हो या फिल्म तीस साल की उम्र से पहले ही मैंने इतनी कहानियां पढ़ी है और कुरोसोवा, सत्यजीत राय, मृणाल सेन से ले कर हालीवुड़ की इतनी फिल्में देखी कि बाद की व्यस्तताओं में खंपने और सेटेलाइट टीवी के दौर में ले दे कर कहानी का शगल बचा तो वह हालीवुड की फिल्मों में परिवर्तित है। 

निसंदेह ह़ॉलीवुड का कहानी कहने का अंदाज गजब है। वहां के निर्देशकों की फिल्म गढ़ने की कला याकि क्राफ्ट की बारीकियों पर जितना सोचेगे उनमें खोते जाएगें। कहानी के मामले में श्रेष्ठता की अपनी कसौटी यह है कि पढ़ने, सुनने और देखने वाला उसमें खो जाएं। अपने आपको भूल जाएं। ह़ॉलीवुड की फिल्मों में यह भेद करना मुश्किल होता है कि वाह निर्देशक की हो या अदाकारों की! हर चीज परफेक्शन याकि  पूर्णता लिए होती है। जाहिर है फिल्म का कमाल का होना कुल मिला कर पूरी टीम का ही कमाल हुआ। 

द पोस्ट के निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने एक के बाद एक कई सुपर हिट फिल्में बनाई है। लिंकन, स्कीनडलर लिस्ट, सेविंग प्राइवेट रयान जैसी फिल्मों के बाद ‘द पोस्ट’ फिल्म का यह अर्थ किसी ने ठिक निकाला कि स्पीलबर्ग अब अमेरिकी इतिहास और उसकी तासीर की कहानी को जीवंतता से पेश करने के मास्टर है। मैं कई मामलों में स्पीलबर्ग से अधिक जेम्स केमरन का कायल हूं। पर दोनों की साझा खूबी  वह क्राफ्टींग, गढ़ई है जिसमें कहानी सुनने-देखने वाले के लिए कहानी, कहानी नहीं रह जाती बल्कि साकार, जीवंत रूप में वह उसे जीते हुए उसमें खोया होता है।  कहानी कैसी भी हो इतिहास की हो, अवतार की हो, जंग की हो उसे तमाम तरह के हुनरों से इस तरह पेश किया जाता है मानों उसी के बीच हम है।

जाहिर है इस सबमें स्क्रीप्ट लेखन वाले का योगदान होता है तो कॉस्टींग वाले का, सेट, तकनीक, कैमरामैन सभी का योगदान होता है और निर्देशन व अदाकारी तो खैर निर्णायक है ही। 

‘द पोस्ट’ मीडिया की, अखबार की कहानी है और इसमें लौकतंत्र-मीडिया के सत्व-तत्व को बतलाने वाला कोर वाक्य है – हमें उनके (राष्ट्रपति-सत्ता) पॉवर पर चैक रखना है, यदि हम उन्हे जवाबदेह नहीं बनाएगें तो कौन बनाएगा?  

यह वाक्य वाशिंगटन पोस्ट के संपादक बैन ब्रेडली की जुबानी है। इस एक वाक्य पर दो टूक जोखिम को उठाने वाली थी अखबार की प्रकाशक-मालकिन केथरीन ‘के’ ग्राहम! इन दो पात्रों के इर्दहिर्द फिल्म में अमेरिका के 1971 के उस वक्त को जिंदा किया गया जब पूरा देश विएतनाम की लड़ाई में बुरी तरह फंसा था। नेताओं ने, राष्ट्रपतियों ने युद्व उन्माद में देश को झौंक रखा था। उस दौर में पेंटागन याकि रक्षा मंत्रालय में कार्यरत हार्वड के पीएचडीधारी एक पूर्व सैनिक डेनियल एलसबर्ग ने सरकार और राष्ट्रपतियों के झूठ बोलने, पोल खोलने का दस्तावेज न्यूयार्क टाईम्स को लीक किया। अखबार ने दस्तावेज के अंश 13, 14 और 15 जून 1971 को प्रकाशित किए। हंगामा हुआ। अमेरिकीयों को समझ आया कि राष्ट्रपति और प्रशासन कितना झूठ बोलते रहे है। तब राष्ट्रपति निक्सन ने सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा के हवाले इन दस्तावेजों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाया। जब न्यूयार्क टाइम्स पर रोक लगी तो ये पैंटांगन पेपर्स वाशिंगटन पोस्ट के पास पहुंचे। और वह वक्त सपांदक और मालकिन के लिए फैसले का था कि राष्ट्रपति ने यदि न्यूयार्क टाइम्स को अदालत से रूकवा दिया है तो वाशिंगटन पोस्ट छापे या न छापे!

उधेडबुन, अभिव्यक्ति की आजादी, देश की सुरक्षा-सेना की गोपनियता के तमाम सवालों को लिए वे दो सप्ताह अमेरिकी लौकतंत्र में मीडिया के रोल को बतलाने वाला अंहम वक्त है। उस वक्त को बतौर संपादक हांक और बतौर प्रकाशक-मालकिन रोल को मेरील स्ट्रीप ने जैसे जीवंत किया है वह हर मायने में परफेक्ट, अद्भुत है। इसे देख विचार बनता है कि किस रोल के लिए कैसे कलाकारों को चुनना है इसमें मास्टरी या कॉस्टीग अमेरिकी फिल्मों की जहां बडी खूबी है तो फिर अदाकारी से उस वक्त को जिंदा करना इस हकीकत को लिए भी होता है इसके लिए जरूरी सेट जुटाना कितना मुश्किल काम होता होगा। मगर क्या गजब कि वह सब पूर्णता से फिल्म में दिखता है। 

द पोस्ट उस वक्त के रोमांच, उसकी शिद्दत को बताने में कामयाब इसलिए भी है क्योंकि फिल्म देख अपने आप विचार बनता है कि वह भी क्या वक्त था!  कैसे लोग थे और उनकी प्रतिबद्वता क्या जुनून, क्या साहस लिए हुए थी? 

आज की पीढ़ी को याद नहीं है कि तब अक्षर छापने के लिए कैसी तकनीक थी। खांचों में एल्यूमिनियम-लौहा गल कर अक्षर बनता था, एक-एक अक्षर जोड वाक्य कंपोज हुआ करता था। उससे पूरी स्टोरी, पूरा पेज बनता था। फिर भारी-भरकम रोटरी मशीनों से अखबार छप कर निकल थे और संपादक-प्रकाशक लोग सरकारों से लौहा लेते थे। अमेरिका में न्यूयार्क टाईम्स और वाशिंगटन पोस्ट दोनों राष्ट्रपतियों से, सरकारों से लगातार इस कर्तव्यभाव लौहा लेते रहे कि हमें उनके (राष्ट्रपति-सत्ता) पॉवर पर चैक रखना है, यदि हम उन्हे जवाबदेह नहीं बनाएगें तो कौन बनाएगा!  

निसंदेह स्टीवन स्पीलबर्ग ने इस हकीकत को बखूबी द पोस्ट से दर्शाया है। और तभी अपने लिए यह फिल्म इतना कुछ  लिखने का आधार बनी। 

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