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‘द पोस्ट’: धड़कता लोकतंत्र, असली लोकतंत्र!

धड़कन आप तभी महसूस कर सकते है जब कौम निर्भीक, जिंदा लोगों की जिंदादिली लिए हुए हो। अपना मानना है जिंदा कौम होने, स्वतंत्रता की देवी होने की मशाल का पर्याय है अमेरिका का ‘द न्यूयार्क टाईम्स’ और ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ अखबार। मैं 1988 में पहली बार न्यूयार्क गया तो मैंने अमेरिकी विजिटर प्रोग्राम में इच्छा जतलाई कि न्यूयार्क में मुझे एक, वॉल स्ट्रीट का शेयर बाजार और दूसरे द न्यूयार्क टाईम्स का दफ्तर जरूर देखना है!  मैंने उस पहली यात्रा में वाशिंगटन का सुप्रीट कोर्ट, केपिटॉल, हिल, व्हाईट हाउस, न्यूयार्क टाईम्स और वॉल स्ट्रीट के स्टॉक एक्सचेंज की इमारतों की विशालता- भव्यता को देख उस वक्त बहुत कुछ सोचा लेकिन पत्रकारिता में होने के कारण द न्यूयार्क टाईम्स को ले कर कौतुक दस तरह के थे। 

सचमुच न्यूयार्क टाईम्स और उससे पहले लंदन की फ्लीट स्ट्रीट में अखबारों की इमारतों को देख कर मेरा  बना भाव हमेशा बना रहा है कि इनका लोकतंत्र तो इन अखबारों से जिंदादिल है। लोकतांत्रिक जिंदादिली का वह सिलसिला लगातार है। चालीस साल पहले जो मतलब था वह आज भी है। जस का तस जलवा है। हालांकि लंदन की फ्लीट स्ट्रीट से अधिकांश अखबार शिफ्ट हो गए है तो न्यूयार्क में भी डिजिटल मीडिया ने कागज-स्याही को सूखा दिया है। बावजूद इसके निक्सन या रोनाल्ड रीगन का वक्त हो या डोनाल्ड ट्रंप का, मीडिया की तासीर, संस्कार वहीं है जो बीसवीं सदी में थे।  

‘द पोस्ट’ कागज, स्याही और संपादकों की पुरानी यादों को ताजा बनाने वाली फिल्म है। न्यूयार्क में ‘द न्यूयार्क टाईम्स’ और उससे चिंहित टाइम्स स्कवॉयर बीसवीं सदी के मध्य-उत्तराद्व में जो जलवा लिए हुए था उसे ‘द पोस्ट’ फिल्म जीवंतता से जिंदा बनाती है!  इस बहस का मतलब नहीं है कि जलवा ‘द न्यूयार्क टाईम्स’ का ज्यादा रहा जबकि स्टीव स्पीलबर्ग ने  द पोस्ट फिल्म बना कर ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ को अव्वल बनाया। जान ले ‘द न्यूयार्क टाईम्स’  और ‘द वाशिंगटन पोस्ट दोनों ही गजब अखबार है।  दोनों अखबार वाशिंगटन- न्यूयार्क के नेताओं, अरबपतियों याकि सत्तारूढ आभिजात्य वर्ग पर फोकस किए राष्ट्रीय बहस, सियासी हवा बनाने-बिगाड़ने के पुरोधा हैं। मतलब केंद्र की सत्ता, व्हाइट हाउस, संसद, रीति-नीति पर असर रखने वाले अखबार, संपादक और उसके पत्रकार। ये अमेरिका के प्रतीक मीडिया हाऊस हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि इन्हे ही अमेरिकी समाज में आजादी की प्रतिनिधि मशाल मानी जाए। दो साल पहले अखबार की अभूतपूर्व दास्तां बताने वाली ‘स्पॉटलाइट’ फिल्म आई थी वह बोस्टन शहर के लोकल अखबार को लिए हुए थी। उस लोकल अखबार की टीम ने जो किया वह चर्च की वैश्विक व्यवस्था को हिला देने वाला था। 

सो अखबार लोकल हो या राष्ट्रीय, अमेरिका में सब एक ही तासीर में, लोकतंत्र की बतौर मशाल संस्था में कर्तव्य निर्वहन करते हैं। ‘द न्यूयार्क टाईम्स’ और ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ के संपादक, पत्रकार जहां  राष्ट्रपति व उनकी सत्ता में एक्सेस रखते हुए, राष्ट्रपतियों से अंतरंगता रखते रहे हों लेकिन अपने धर्म-कर्म में राष्ट्रपति को जवाबदेह बनाने, उनसे भिड़े रहने के कर्तव्य को छोड़ते नहीं हैं। 

कैसे और किस सीमा तक? इसका सच्चा ब्यौरा है द पोस्ट। बात उन दिनों की है जब अमेरिका विएतनाम में कम्युनिस्ट सत्ता नहीं बनने देने के मिशन में लड़ाई में कूदा हुआ था। डेमोक्रेटिक हो या रिपबल्किन सभी राष्ट्रपतियों ने कम्युनिस्ट खतरें से अमेरिकी सेना को जंग में झौंके रखा। अमेरिकी सैनिकों की मौत और लड़ाई के घावों ने आम जनता में घाव गहरे बना दिए थे लेकिन राष्ट्रपतियों ने जनता को बरगलाएं रखा कि जंग में हम जीत रहे है। इसी मामले में प्रशासन में एक गोपनीय दस्तावेज बनाया गया कि जमीनी हकीकत क्या है? क्या अमेरिका युद्व जीत सकता है? 

इस गोपनीय रिपोर्ट का निचोड़ था कि सारे राष्ट्रपति अमेरिकी जनता को उल्लू बनाते रहे है और बना रहे है। हकीकत की बजाय झूठी तस्वीर दिखा बहकाते रहे है कि दुश्मन तो बस हारने वाला! 

यह दस्तावेज एक क्षुब्ध नागरिक के हाथ लगा और उसने न्यूयार्क टाईम्स के रिपोर्टर से संपर्क बना उसे दस्तावेज लीक किया। अमेरिका के रक्षा मंत्रालय पैंटागन के गोपनीय अध्ययन, रिकार्ड का लीक होना और राष्ट्रपति के झूठ की हकीकत के पर्दाफाश ने प्रशासन को कैसा हिलाया होगा इसकी कल्पना की जा सकती है। न्यूर्याक टाइम्स में छपे भंडाफोड़ से राष्ट्रपति निक्सन ऐसे तिलमिलाएं कि अखबार के खिलाफ एटार्नी-जनरल ने मुकद्मा किया और सेना के मनोबल, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर खबरों के आगे प्रकाशन पर रोक लगवा दी। पैंटागन ड़ॉक्युमेंट का प्रकाशन रूका। 

द न्यूयार्क टाईम्स के मुकाबले में तब द वाशिंगटन पोस्ट दूसरा अखबार था। दो अखबारों की प्रतिस्पर्धा में एक पर पाबंदी हुई तो दूसरे के पास जब कागज पहुंचे तो द वाशिंगटन पोस्ट की अखबार मालकिन कैथरिन के सामने सवाल हुआ कि वे मौके को चूके या राष्ट्रपति और उस व्हाइट हाऊस का लिहाज करें जिनसे अंतरंग संबंध हंै। मालकिन कैथरिन पर अखबार चलाने का दायित्व अचानक पति की मृत्यु के कारण आ पड़ा था। जैसे दिल्ली में सोशल सर्किट में सत्ता के लिहाज में मालिक-मालकिन सत्तावानों की कृपा, उनमें घूमने, पॉवर जतलाने के शगल में होते है वैसे कैथरीन भी पॉवर के सोशल सर्किट का हिस्सा थी। फिर उन्हे कंपनी को चलाने, अखबार को मजबूती दिलाने के लिए शेयर बाजार से तब पैसा भी लेना था। 

स्टीव स्पीलबर्ग ने मालकिन कैथरीन और अखबार संपादक बैन दोनों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर फोकस करके बहुत खूबसूरती से जतलाया कि अनुभवहीन मालकिन हो या पेशेवर संपादक दोनो अपने मनौविश्व में दस तरह की बाते लिए भले रहे हों लेकिन उनकी पहली कोर चिंता हमेशा यह बनी रही कि उन्हे जो दायित्व है उसमें ढील नहीं आए। भले बरबाद हो जाए अखबार। शेयर बाजार, बैंक अखबार के लिए पैसा जुटाने की कवायद से भले हाथ खींच ले, राष्ट्रपति से भले रिश्ते खराब हो जाएं, सुप्रीम कोर्ट में भले मुकद्दमा लड़ना पड़े और मालकिन-संपादक को जेल जाना पड़े तब भी यह नहीं होगा कि डर जाए और खबर न छपे! 

हां, मालकिन संपादक के लिए खड़ी और जेल जाने तक को तैयार तो संपादक का यह सोचना कि मैं अपने अधिकार में खबर नहीं दबाऊंगा, मैं तो छापूगां लेकिन फिर भी ऐन वक्त मालिकन को इसलिए अंतिम फैसला करने के लिए कहना कि आखिर कर्ता-धर्ता तो वह! एक-दूसरे के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं तो परस्पर एक –दूसरे पर विश्वास रखते हुए महाबली राष्ट्रपति –प्रशासन से भिड़ने का माद्दा ही तो लोकतंत्र का सच्चा व्यवहार है।

सो अदालत की पाबंदी के बावजूद पैटांगन दस्तावेज की अगली किस्म वाशिंगटन पोस्ट ने छापी। तब प्रेस की आजादी का सवाल उठा और सुप्रीम कोर्ट में प्रेस का आजादी बनाम सरकार, देश की सुरक्षा के केस की सुनवाई हुई। अंत में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बैंच का फैसला- पहले प्रेस आजादी है फिर बाकी बातें!

यह सब अमेरिकी इतिहास की हकीकत है। पेंटागन दस्तावेज और उसके बाद वाटरगेट कांड में वांशिगटन पोस्ट और उसकी मालकिन, उसके संपादकों ने प्रेस आजादी के जो कीर्तिमान बनाए उसमें राष्ट्रपति निक्सन को पद त्यागना पड़ा तो अमेरिकी प्रशासनों की वह जिद्द भी खत्म हुई कि विएतनाम में लड़ते रहेंगे।  

सो क्या पूरी दास्ता दिल-दिमाग को धड़काती सच्चे लोकतंत्र की दास्तां नहीं बनती? 

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