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द पोस्टः देख रोना आया भारत पर!

फिल्म देखना भारी पड़ा। आंख-कान देख, सुन रहे थे लेकिन दिमाग भारत के मीडिया, भारत के सुप्रीम कोर्ट और नरेंद्र मोदी-अमित शाह, शोभना भारतीय, समीर जैन, वीनित जैन, सुभाष चंद्रा, अरूण पुरी आदि चेहरों में घूमता हुआ कौम पर विचार करते हुए सोच रहा था कि कैसे वे लोग और कैसे हम लोग! कितना सड़ा है अपना प्रजातंत्र! और कैसे लिजलिजे हम लोग, हमारा प्रजातंत्र और उसकी संस्थाएं! फिर लगा हम हिंदुओं को श्राप है रेंगते हुए जीना! सवा सौ करोड़ लोगों के इस देश में क्या दर्जन भर लोग भी होंगे जो यह कहने की हिम्मत रखते हो– हमें उनके प़ॉवर पर चैक रखना है यदि हम उन्हे जवाबदेह नहीं बनाएंगे तो कौन बनाएगा?

सोचंे इस वाक्य का अर्थ।  यह वाक्य न केवल लोकतंत्र, मीडिया का सत्व-तत्व है बल्कि जिंदा कौमों के विकास का ब्रह्म सूत्र इसलिए है क्योंकि यदि इंसान स्वतंत्रचेता नहीं हुआ तो वह बिना पंख का है। बिना पंख वाले लोग रेंगने वाले होते हंै, बिना बुद्धी, बिना रीढ़ और बिना सार्थकता का कछुआ जीवन लिए होते हैं। वैसे ही जैसे हम हिंदू हैं। 

हां, एक फिल्म ‘द पोस्ट’ को देखते हुए हिंदुओं की तासीर का रोना इसलिए आया है क्योंकि चार सालों में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, अरूण जेतली के ढाई लोगों ने  इस देश में जो कुछ किया है वह सभ्यताओं के गुण मिलान में हम हिंदुओं को मूर्ख, डरपोक, लिजलिजी कौम के उस खांचे में बैठाता है जिसमें दूसरी कोई कौम फिट हो ही नहीं सकती। क्या दुनिया के किसी प्रजातंत्र में ऐसा मीडिया है जैसा भारत में है? क्या दुनिया की किसी कौम में ऐसा नैरेटिव, बहस, विचार-विवेक है जैसा इन दिनों भारत में है? क्या दुनिया के सच्चे लोकतांत्रिक देशों में ऐसा सुप्रीम कोर्ट है जैसा भारत में है?  क्या दुनिया के किसी सच्चे लोकतांत्रिक देश में ऐसी विधायिका, ऐसे जनप्रतिनिधी है जैसे भारत में है? क्या दुनिया के सच्चे प्रजातांत्रिक देशों में ऐसी कार्यपालिका, ऐसी नौकरशाही और ऐसे नियंता है जैसे भारत में है? 

अब सच्चे प्रजातांत्रिक देशों की मेरी समझ के देश अमेरिका है, योरोपीय देश है या  जापान व आस्ट्रेलिया है न कि पाकिस्तान, चीन या रूस! और मैं सच्चे बनाम फर्जी प्रजातंत्र का फर्क इस कसौटी में भी  मानता हूं कि पिछले दो सौ सालों में इंसान यदि मंगल ग्रह तक पहुंचा है तो वजह सच्चे-प्रजातात्रिंक देशों के स्वतंत्रचेता लोगों के पंखों की उड़ान है न कि फर्जी प्रजातंत्र की रेंगती वे नस्ले हैं जो किसी न किसी बंधन की गुलाम है। मेरी सोच में बतौर कौम हम हिंदुओं का गंतव्य इन सच्चे प्रजातांत्रिक देशों की ही तासीर को पाना है ताकि हम भी ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता-संस्कृति के अपने प्राचीन दानों को ले कर खुले पंख मंगल की और उड़े!

मगर जिस कौम के डीएनए गुलामी के अनुभव से रेंगने के हैं उनमें भला हिम्मत कैसे आ सकती है जो यह सोच भी सकें, जो यह हिम्मत भी लिए हुए हो कि हमें उनके प़ॉवर पर चैक रखना है यदि हम उन्हें जवाबदेह नहीं बनाएंगे तो कौन बनाएगा?

किसके पॉवर को?  जवाब ‘द पोस्ट’ फिल्म का कथानक है। दुनिया का सबसे ताकतवर देश यदि अमेरिका है तो उसमें सर्वाधिक ताकतवर राष्ट्रपति को माना जाता है! ऐसे महाबली राष्ट्रपति के सींग पकड़ उसे काबू करने का स्वतंत्रचेता माद्दा किसमें है? उसके मीडिया में!  और इसमें फिर आगे मीडिया बनाम राष्ट्रपति बनाम संसद में किसके क्या अधिकार की दो टूक, बेबाकी से, सौ टका ईमानदारी से व्याख्या करने वाली संस्था का नाम है सुप्रीम कोर्ट।

हिसाब से हम सबने लोकतंत्र की जानकारी में जाना हुआ है कि सत्ता, अदालत, मीडिया और संसद चारों के बीच चैक-बैलेंस का नाम ही लौकतंत्र है। पर यह बात अलग-अलग संस्थाओं का लाठी तंत्र नहीं बनवाएं और उसकी बजाय इससे सच्ची प्रजातांत्रिक, स्वतंत्रचेता घुट्टी प्राप्त कर नागरिक बलशाही बन उडने के पंख बनाते जाए, ऐसा तभी और उसी कौम में संभव है जो जिंदा है जिंदादिल है, न कि डरपोक और रेंगने वाली। 

सोचें, एक फिल्म ने मुझे कितना घूमा दिया। यह मुझे पता था कि फिल्म देखूंगा तो सोचूंगा और लिखूंगा भी जबकि वक्त है नहीं। मोदी के राज ने सोचने, लिखने और कमर तोड़ देने वाले ऐसे संकटों में मुझे उलझा रखा है कि फिल्म के लिए वक्त कहां?  मगर अपने शंकर शरण ने कहा, इस फिल्म पर आपका लिखा पढ़ा नहीं जबकि यह फिल्म स्पॉटलाइट से उम्दा है। फिर शुभब्रत भट्टाचार्य ने भी फिल्म देखने का आग्रह किया। मैंने क्योंकि फिल्म, उसके कथानक, कलाकारों के बारे में पढ़ा हुआ था इसलिए बाद में नेटफ्लिक्स से देखने की सोची हुई थी। यों भी अहसास था कि फिल्म देखी तो भारत की दशा, मोदी राज में मीडिया की गुलाम और हम कायरों की दास्तां के सीन दिमाग में बनेंगे। क्यों दिमाग पर बोझ बढ़ाए? 

पर आखिर में फिल्म देख ही ली। डायरेक्टर स्टीव स्पीलबर्ग ने बोध कराया कि उन्होंने अमेरिका के संदर्भ में भी वहां के लोगों के लिए ऐसे वक्त में यह क्या गजब, अदभुत फिल्म बनाई जो उस जिंदा कौम के लिए भी एकदम प्रासंगिक है। फिल्म ने वहां यह भाव बनाया होगा की उनके पास तो वह मीडिया है जिसने राष्ट्रपति निक्सन की नकेल कसी थी तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी जवाबदेह बना छोड़ेगा। 

गजब फिल्म है द पोस्ट! इसे ऑस्कर पुरस्कारों में ढेरों पुरस्कार मिलने चाहिए। मीडिया केंद्रीत स्पॉटलाइट य़दि उस साल की श्रेष्ठ फिल्म थी तो ‘द पोस्ट’ मौजूदा काल खंड, वक्त की श्रेष्ठतम फिल्म हर कसौटी में है। अपना आग्रह है यदि आप लोकतंत्र, जिंदा कौमों के सच्चे विकास के आंकाक्षी है तो जरूर ‘द पोस्ट’ देखें।  देखते हुए दिमाग में सोचे कि भारत की सत्ता प्रकृति, मीडिया और सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं का क्या हाल है और हम अमेरिकी संस्थाओं, चेहरों, विचारों और आचरण के मुकाबले कहा है? कैसा फर्क है कि एक जिंदा कौम और रेंगती कौम में? 

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