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आज कगार, क्या हिंदू राष्ट्र की?

(image) इंडियन एक्सप्रेस में फली एस नरीमन को पढ़ दिमाग झनझना उठा। इसलिए कि बात नकली चिंता लिए हुए है। इससे फिर लड़ने की एक और नकली बौद्धिक लड़ाई बनेगी। अंत में भले बवंडर साबित हो लेकिन इसमें कुछ सौ मुस्लिम नौजवान भटके, मुस्लिम समाज अपनी खोल में और खदबदाए तो नुकसान सभी का होना है। तभी गंभीर विचार की जरूरत है। नरीमन की बात हिंदू राष्ट्र की है। उन्होंने लिखा है कि हम एक हिंदू राष्ट्र बनने के कगार पर हंै। हम ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर नहीं, बल्कि सावरकर के हिंदू नस्ल, हिंदू संस्कृति वाले हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ रहे हैं! अपन नरीमन का सम्मान करते हंै। वे संवैधानिकता के आग्रही, निज आजादी पक्षधर उन उदार मना, पक्षपातरहित बौद्धिकों के प्रतिनिधि हंै, जिनकी कुल मिला कर भारत में बहुत कम संख्या रही है। उनके लिखे के साथ यदि प्रताप भानु मेहता जैसे खांटी उदारवादियों से लेकर न्यूयार्क टाइम्स की टिप्पणी और सेकुलर पूर्वाग्रही जमुलेबाजों की योगी आदित्यनाथ के सत्तारोहण के बाद की सोच पर गौर करें तो कोर निष्कर्ष यह है कि मुख्यमंत्री पद पर योगी की शपथ 70 साला भारत राष्ट्र-राज्य का निर्णायक मोड़ है। यह मोड़ हिंदू राष्ट्र की कगार है। तानाशाही का खतरा है। बहुसंख्यकों के जनादेश से, लोकतंत्र के माध्यम से सेकुलर गणतंत्र को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करने का सपना अब रास्ता पा गया है। भाजपा हिंदू राष्ट्र बनाने का वक्त आ गया मान रही है। आम लहजे में कहें तो देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश की सत्ता कुर्सी पर बैठे भगवा वस्त्रधारी योगी आदित्यनाथ बौद्धिकों की चेतन-अवचेतन मनोदशा में हिंदू राष्ट्र के प्रतीक हैं। योगी सरकार हिंदू राष्ट्र की पर्याय है! ऐसा सोचना गलत है। मगर ऐसा सोचा जा रहा है तो एक वजह शायद भगवा रंग के प्रति भारत राष्ट्र-राज्य के प्रभु वर्ग याकि एलिट का मनौविज्ञान है। क्या यह नहीं लगता कि 15 अगस्त 1947 की आधी रात पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आजाद भारत के सफर की जो शुरुआत कराई थी उसकी संवैधानिकता में भगवा रंग, साधू-संत को ऐसा वर्जित समझा गया कि संवैधानिकता से ही सब कुछ की थीसिस वाले ज्ञानी फली एस नरीमन, जहां योगी आदित्यनाथ से हिंदू राष्ट्र का कगार आया मान रहे हैं तो वहीं उदारता और मुक्त चिंतन में रचे-बसे न्यूयार्क टाइम्स या प्रताप भानु भी उतने ही विचलित हैं, जैसे पक्षपातपूर्ण जुमलेबाजी करने वाली दरबारी बौद्धिकता है! संदेह नहीं कि भारत का उदारमना समूह भगवा रंग-ढंग में, साधू-संत चेहरे से असहज होता है। यह अपने धर्म की खूबी है तो गुत्थी भी है। अपने यहां भगवा से सियासी एलर्जी सनातनी है। मध्यकाल से इसमें अनुभवजन्य लोचे हैं। तब (या उससे पहले खास कर आदि शंकारचार्य को याद करते हुए) भगवा साधू-संतों ने धर्म बचवाए रखने में अपना रोल बखूबी गजब निभाया। लेकिन विदेशी हमलों के साथ कौम और राष्ट्र को नेतृत्व देने में साधू-संत ऐसे असफल रहे कि 19वीं-20वीं सदी के बौद्धिक मंथन में इन्हें राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र सत्ता, राजनीति से दूर रखने में भलाई मानी गई। तभी आजादी की लड़ाई के वक्त में स्वामियों, धर्मगुरुओं के समाज सुधार, अध्यात्म, चिंतन-मनन में अतुलनीय योगदान के बावजूद ये नेतृत्व की जरूरत में अपने को जमा नहीं पाए। कमान उन गांधी की बनी जो हिंदुओं का विश्वास जीतने के लिए महात्मा बने लेकिन सफेद खादी कपड़े पहन कर। यह विचारने वाली बात है कि गांधी ने हिंदुओं की राजनीतिक लीडरशीप महात्मा बन कर पाई मगर खादी के सफेद वस्त्रों से न कि भगवा वस्त्र धारण कर! सो, भगवा को राजकाज में, हिंदू सियासी मनोदशा में उचित, सामर्थ्यवान नहीं मानना अपना एक तत्व है। मगर बौद्धिक उदारमना सोच में इससे अधिक गहरी बात आज की यह चिंता है कि बहुसंख्यक हिंदु आज जैसे ‘भटके’ हैं उससे अघोषित तानाशाही का वह तानाबाना गुंथ रहा है, जिसमें कुछ भी हुआ जा रहा है। बहुसंख्यक हिंदुओं का उन्माद और मोदी-योगी की एकछत्रता भारत को सावरकर के सपनों के हिंदू राष्ट्र की कगार पर ले आई है। बहुत गजब पर फालतू है यह चिंता! बावजूद इसके फली एस नरीमन और न्यूयार्क टाइम्स यदि एक सी आंशका में हैं, एक से नतीजे पर पहुंच रहे हैं तो मुझ जैसे हिंदूपरस्त कलमघसीट के लिए भी सोच-विचार की जरूरत गंभीर है। अपना मानना है कि जिसको भी सवा सौ करोड़ लोगों के इस देश में, उसके भविष्य की चिंता है उन्हें गंभीरता से आज के हालातों और उस मनोदशा पर विचार करना चाहिए, जिसमें यह माने जाने लगा है कि कगार आज हिंदू राष्ट्र की है। संदेह नहीं कि जो हुआ है, जो हो रहा है वह अनहोना है। अपना मानना है इसका एक परिपेक्ष्य, फ्रेमवर्क वैश्विक परिवेश है। मगर उस पर बाद में सोचा जाए। फिलहाल फोकस रखें कि भारत में जो अनहोना हो रहा है उसमें बौद्धिकों की चिंता की क्या जड़ वजह है? जैसा मैंने पहले लिखा कि 70 साल में जो नहीं हुआ और अब यदि हुआ है तो उससे बौद्विकों का झनझना जाना स्वभाविक है। भारत का एलिट मतलब बौद्धिक, वकील, अफसर, जज, मीडिया सब 70 सालों से जिस आइडिया, व्यवस्था और उसकी जुगाली में जिए हैं उन सबके लिए पहले नरेंद्र मोदी और अब योगी आदित्यनाथ का अनुभव अपने आपमें असहज बना देने वाला है। ऐसे में, समझ में एक्स्ट्रीम निष्कर्ष भी बन सकता है। पर इनके लिए क्या यह विचारने वाली बात नहीं होनी चाहिए कि पहले भी भगवा वस्त्र पहने उमा भारती मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। तब तो वैसी असहजता नहीं दिखी थी जैसी अभी दिख रही है? क्यों भगवाधारी योगी आदित्यनाथ पर इतना रिएक्ट हुआ जा रहा है? इस पर विचार करें तो फिर लगेगा कि आज क्योंकि योगी के पीछे नरेंद्र मोदी हैं, भारत के प्रधानमंत्री हैं तो एक और एक के ग्यारह का हिंदू राष्ट्र बनता दिख रहा है! न्यूयार्क टाइम्स ने मुद्दा योगी आदित्यनाथ को बनाया मगर टारगेट नरेंद्र मोदी पर था। तभी उसने अपने संपादकीय की हेडिंग में मोदी पर तंज कसा। लिखा कि वे एक ऐसा शातिर खेल खेल रहे हैं, जिसमें नाम विकास का है और काम हार्डलाइन हिंदू आधार को खुश करने का है। उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सर्द सियासी हिसाब लगा कर योगी को मुख्यमंत्री बनाया और भाजपा में यह भरोसा पैदा कर दिया कि धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र को हिंदू राष्ट्र में बदलने के सपने में अब कोई बाधा नहीं है। सो, रोडमैप नरेंद्र मोदी-अमित शाह का है। उन्होंने बतौर राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की जगह भाजपा को स्थापित कर दिया है और अब ऐसा है तो और कुछ सोचने की जरूरत नहीं है। सोचने वाली बात सिर्फ यह है कि हम हिंदू राष्ट्र बनने के कगार पर हैं। हां, इसी अंदाज में नरीमन ने, न्यूयार्क टाइम्स ने अपनी-अपनी बात रखी! इसके आगे फिर बात यहा तक आ गई कि यह कगार संवैधानिकता के इतर है! संवैधानिकता खतरे में है! इसी निष्कर्ष में फिर इमरजेंसी का वक्त नरीमन को याद आया! भला क्यों? (इस पर कल)
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