हिंदू बुद्धि और भय का पाला!

बहुत विचित्र बात है लेकिन गंभीर! हिंदू आज भयावह भयभीत है! आजाद भारत के 70 साल के इतिहास में हिंदू कभी इतना भयभीत नहीं रहा जितना आज है! इसमें वे हिंदू ज्यादा भयभीत हैं, जो अपने को राष्ट्रवादी मानते हैं। इनका डर है कि यदि नरेंद्र मोदी वापिस प्रधानमंत्री नहीं बने तो मुसलमान छा जाएंगे और भारत को पाकिस्तान खा जाएगा! इस भय, चिंता पर ही मोदी-शाह की प्रचार टीम, भक्तों की भीड़ सोशल मीडिया पर हिंदुओं को मूर्ख बनाने का अभियान चलाए हुए है। भय का माहौल 1975 की इमरजेंसी में भी था लेकिन हिंदू मानस मूर्ख नहीं बना था। यों इंदिरा गांधी के प्रचार तंत्र ने हल्ला बनवाया था कि इंदिरा गांधी हैं तो देश है। वे प्रधानमंत्री नहीं रहीं तो देश नहीं बचेगा! मैं देश बचाना चाहती हूं और वे (विरोधी) मुझे हटाना चाहते हैं। ऐसा ही नरेंद्र मोदी का अगले सौ दिनों में हल्ला होगा कि मैं वापिस प्रधानमंत्री बनूंगा तो देश बचेगा। मतलब सवा सौ करोड़ लोगों का भारत राष्ट्र-राज्य नरेंद्र मोदी की कानी ऊंगली पर गोवर्धन पर्वत की तरह खड़ा हुआ है। सो, चुनाव में मोदी हारे तो सवा सौ करोड़ लोगों का देश भरभरा कर गिर पड़ेगा और मुसलमान छा जाएंगे।

क्या यह मूर्खतापूर्ण बात नहीं है? इसका तब अर्थ है कि सौ करोड़ हिंदू कीड़े-मकोड़े हैं। बिना अस्तित्व, बिना ताकत के हैं। सौ करोड़ हिंदुओं में अकेले नरेंद्र मोदी छप्पन इंची छाती लिए हुए हैं और बाकी हिंदू बिना छाती के मांस के लोथड़े हैं, जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते हैं। अन्य शब्दों में हम सब गाय चराते बाल गोपाल हैं और अकेले नरेंद्र मोदी हैं जो 24 घंटे मेहनत करके, अपने श्रीमुख में दुनिया की झांकी लिए हुए, अपने सुदर्शन चक्र से भारत की रक्षा करते हुए हैं। 

कितना नॉनसेंस, मूर्खतापूर्ण ख्याल है यह! सोचें आज 21वीं सदी में ऐसे सोचना! इस सदी में भी हम हिंदू अपने को एक व्यक्ति पर निर्भर मान, उसके रहने न रहने पर अपना भविष्य गिरवी रख रहे हैं। इतिहास के अनगंपाल और हाथी याकि एक व्यक्ति पर निर्भर रह कर बरबाद होने के अनुभव को भूले बैठे हैं 21वीं सदी की हकीकत में ऐसा सोचना सर्वाधिक शर्मनाक  है जो हम एक कानी ऊंगली पर अपने गोवर्धन पर्वत को टिका हुआ मानें। इंदिरा गांधी ने भी ऐसा मैसेज 1977 में बनवाया था। पर जनता ने उसे नहीं माना। खिलाफ वोट दे कर उन्हें सत्ताच्यूत किया। वह भी उन इंदिरा गांधी को जनता ने खारिज किया था, जिन्होंने सचमुच पाकिस्तान की धुनाई की थी। बांग्लादेश बनवाया था। गरीबी हटाओ के नारे में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। सोचें, नरेंद्र मोदी जहां बैंक खाते खुलवा कर गरीब की सेवा की बात करते हैं वहीं इंदिरा गांधी ने तो बैंकों का ही गरीब के लिए राष्ट्रीयकृत करने की बिजली कड़काई थी। मगर गरीब हो, मध्य वर्ग हो, हिंदू हो सबने लोकतंत्र, राजनीतिक संस्कृति की खातिर इंदिरा गांधी को हराया। 

बहरहाल, मुद्दा है हिंदू की मौजूदा दशा क्या उसके भय में आकंठ डूबे हुए होने का प्रमाण नहीं है? हिंदू आज बाह्य और आंतरिक तौर पर भय, खौफ व चिंताओं में जी रहा है। भारत का मीडिया भय का प्रमाण है तो समाज के अलग-अलग वर्गों की बदहाली से बनी चिंताओं की जितनी चर्चा की जाए वह कम होगी। जो नरेंद्र मोदी के भक्त और समर्थक हैं वे इस भय में हैं कि नरेंद्र मोदी हारे तो मुसलमानों का राज आ जाएगा। भारत बिना छप्पन इंची छाती के होगा। पाकिस्तान जीना हराम कर देगा। उधर जो नरेंद्र मोदी के समर्थक नहीं हैं वे इस भय में हैं कि कैसे जान बचा कर सांस लेते हुए जैसे तैसे जीवन गुजारें। मतलब चिंता और भय इधर भी है और उधर भी है। नरेंद्र मोदी न आएं तो भय और नरेंद्र मोदी आएं तो भी भय!  

तो क्या भय में ही 2019 का फैसला होगा? 

जवाब फिर हिंदुओं की बुद्धि और विवेक पर निर्भर है। तभी अपना मानना है कि नए वर्ष, 2019 के प्रारंभ के साथ हिंदुओं का पहला संकल्प बनना चाहिए, बनवाना चाहिए कि हम नहीं बनेंगे मूर्ख। 

उस नाते 2019 का वर्ष फैसला देगा कि हिंदू कितने मूर्ख बन सकते हैं। हिंदू को किस हद तक मूर्ख बनाना और उसका मूर्ख बनना संभव है? 2019 में वह होगा जो पहले कभी नहीं हुआ। आजाद भारत के इतिहास में और शायद हिंदू इतिहास में भी पहले कभी ऐसा महाअभियान नहीं चला जैसा अगले चार महीनों में चलने वाला है। यह महाअभियान हिंदुओं को मूर्ख बनाने के प्रयोजन से होगा। साढ़े चार साल के अनुभव और हकीकत की सच्चाइयों से परे करके नरेंद्र मोदी, अमित शाह हिंदुओं में भ्रम बनाएंगें, उन्हे बरगलाएंगें कि अपने अनुभव भूलो, हकीकत पर नहीं गौर करो। बदहाली, बेरोजगारी, बरबादी को दरकिनार कर ध्यान करें उन फोटोज पर कि दुनिया के नेताओं के बीच नरेंद्र मोदी खड़े हैं। वे अब भारत के नहीं विश्व के नेता हैं। उन्होंने नोटबंदी करके जीवन जीने को डिजिटल बनाया। जीएसटी से व्यापारियों, उद्यमियों का जीना आसान हुआ। घरेलू महिलाओं का धुआं गायब हो गया! किसानों की कमाई बीमाकृत हो गई। बैंकों का मुद्रा लोन नौजवानों को पांवों पर खड़ा कर गया! और इन सबसे बड़ी झांकी, झांकियों की बाप यह झांकी कि जो है वह हिंदुओं का हिंदू राष्ट्र है और मुसलमानों से सुरक्षा के लिए हमें नरेंद्र मोदी के रूप में बजरंग बली को पकड़े रहना है! 

हां, पल-पल, हर क्षण नरेंद्र मोदी का चेहरा यह कहता, यह गूंजाता मिलेगा कि मुझे देख रहे हैं न आप, बस इसी चेहरे को देखते रहिए। यहीं है राम! इसी से है रामराज्य! इसी से राम मंदिर! यहीं हैं श्री कृष्ण, जिनकी सत्ता याकि सुदर्शन चक्र गारंटी है मुसलमानों के सिर न उठाने की।

कैसी मूर्खतापूर्ण व बुद्धि और विवेक को ताक पर रखवा देने वाली बातें और प्रचार। इसे 2019 में दस तरह से, दस रूपों में प्रचारित किया जाएगा। दसियों अंदाज, दसियों रूप में हजारों, हजार करोड़ रुपए के मोदी-शाह के ऐसे प्रचार की तुलना आप दुनिया के किसी भी पूर्ववर्ती प्रचार से नहीं कर सकेंगें। जो होगा वह अकल्पनीय होगा। किस मकसद से? ताकि हम हिंदू पांच साल के अपने अनुभव भूलें और दिमाग के आगे पर्दा वह बने, जिसमें मोदी की रंग-रंगीली तस्वीरें होंगीं, डायलॉग होंगे और आह्वान होगा कि तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें सुरक्षा दूंगा। मैं तुम्हें विश्व गुरू, विश्व शक्ति बनाऊंगा! 

तभी 2019 में फैसला है कि हम समझदारी दिखाएंगें या मूर्खता? 2019 का यक्ष प्रश्न है कि हम हिंदू झूठ और सत्य में भेद कर सकते हैं या नहीं? सत्य पांच साल की हकीकत है, पांच साल का अनुभव है और झूठ 2013 की इस बात से शुरू हुआ वह सिलसिला है कि यदि मैं प्रधानमंत्री बना तो यह होगा वह होगा! मतलब हम सब अच्छा-अच्छा फील करेंगें! निश्चित ही अच्छा या बुरा फील करना व्यक्ति विशेष की भावना पर निर्भर करता है। मगर बतौर समाज, बतौर कौम और बतौर राष्ट्र-राज्य की सामूहिक चेतना सही और गलत, सत्य और झूठ में यदि तटस्थापूर्ण निर्णय नहीं दे पाती है तो इस राष्ट्र-राज्य का, हम हिंदुओं के अस्तित्व के दस तरह से सवाल और खतरे बनेंगें। भय और चिंता के बीच हम यदि चार-पांच महीने के प्रचार में अपने गुजरे अनुभव को भूला दें और झांसे में आ जाएं तो 2019 को कैसे याद किया जाएगा? 

सो, अपना सब सुधीजनों, समझदारों, प्रबुद्धों से अनुनय है कि वे बीड़ा उठाएं, संकल्प लें और घर-घर 2019 का संकल्प कराएं कि सवा सौ करोड़ लोगों को बुद्धि-विवेक की लोकसभा चुनाव वाली परीक्षा में फेल नहीं होने देना है। यह प्रमाणित नहीं होने देना है कि हम समझदार नहीं हैं, बल्कि मूर्ख हंै।

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