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2019 है आखिरी साल....

उन हिंदुओं के लिए, जिन्हें अपने राष्ट्र-राज्य से प्रेम है। जो कंपकंपाते हैं भारत के दोबारा विभाजन के सिनेरियो पर! जिन्हें नहीं चाहिए रावण! जिन्हें सोने की लंका नहीं, बल्कि संतोषी, शिष्ट, मर्यादित रामराज्य की चाहना है। जो सिर पीटते हैं ऐसी बातें सुन कर कि हनुमान दलित थे। साधु-संत दलित होते हैं और गधों की, हार्डवर्क की महिमा है न कि ज्ञान-विज्ञान और हार्वर्ड की! या यह कि मनमोहन सिंह पाकिस्तानी एजेंट हैं और राहुल गांधी पप्पू! हां, सचमुच उन सभी हिंदुओं के लिए 2019 वह साल है, जिसमें इस बात की परीक्षा है कि वे अक्लमंद, विवेकी और बुद्धिमान हैं या नहीं? उनकी अक्ल, उनकी बुद्धि, उनके अनुभव पर मायावी परदा डाल, उन्हें ठगने का 2019 में जो अकल्पनीय प्रोपेगेंडा होना है उससे वे अछूता रहते हैं या नहीं? तय मानें कि हर हिंदू के दिल और दिमाग को इस शोर में बांधने की कोशिश 2019 में होगी कि नरेंद्र मोदी रहेंगें तो देश बचेगा! मोदी हैं तो हिंदू धर्म है। प्रचार की सुनामी में ही हिंदू की यह परीक्षा है कि वह अक्लमंद है या मूर्ख!  

नरेंद्र मोदी और अमित शाह का संकल्प दो टूक है। उन्हें 2019 को अपना वर्ष बनाना है! वे सौ करोड़ हिंदुओं के बीच गूंजा देंगें यह बात कि या तो मैं अन्यथा कोई नहीं। मैं ही सवा सौ करोड़ लोगों का अकेला मालिक! मैं ही देशभक्ति की गंगोत्री! मैं ही राजा हरिशचंद्र का इकलौता ईमानदार वारिस! मैं ही देश का विचार। मैं ही देश का विकास। मैं ही मुसलमानों को दुबकाए रखने वाला पहलवान! मैं ही ब्राह्मण, मैं ही राजपूत, मैं ही वैश्य और मैं ही पिछड़ा-दलित याकि समग्र हिंदू के भगवान विष्णु का अवतार! मैं ही ज्ञानी! मैं ही ध्यानी! मैं ही फकीर! मैं ही हार्वर्ड अर्थशास्त्री! देखो फोटो को, मै ही वह विश्व नेता, जिसके चरणों को धोकर चरणामृत पीते हुए डोनाल्ड ट्रंप, मर्केल, पुतिन, शी और एबे! मै ही समाज का, धर्म का रक्षक और महिलाओं व बड़े –बूढ़ों का संरक्षक तो नौजवानों का आदर्श! 

सो, हिंदू बाहुबली की असली फिल्म मार्च 2019 में रिलीज होनी है। हमें उस पर फैसला करना है कि उसे देखने जाएं या उसका बहिष्कार करें! 

और जान लें सामने दूसरी कोई फिल्म नही है। मार्च-अप्रैल में अकेले नरेंद्र मोदी की फिल्म रिलीज होगी। उसके लिए एक-एक दर्शक, एक-एक वोटर को येन केन प्रकारेण, साम-दाम-दंड-भेद से हांक कर सिनेमा हॉल में, मतदान केंद्रों में इस दलील पर वोट डालने के लिए पहुंचाया जाएगा कि हमें नहीं चुनोगे तो किसे चुनोगे?

मैं सनातनी हिंदू हूं। राष्ट्रवादी हिंदू हूं और मेरा विवेक, बुद्धि जैसे जो सोचती है वैसे बाकी हिंदू न सोच रहे हों यह मैं नहीं मानता। आखिर हिंदू हकीकत में जीता है न कि मूर्खताओं में! हकीकत को जान कर वह रास्ता निकालता है। तभी तो हम सहस्त्राब्दियों से बचे हुए हैं। हम राजाओं, महाराजाओं, प्रधानमंत्रियों से भले धोखा खाए हों लेकिन स्वविवेक से हमने अपने रास्ते बनाए, अपने को बचाया। तभी भारत राष्ट्र-राज्य, सवा सौ करोड़ लोग, उनकी आत्मा, उनका विवेक एक व्यक्ति का गिरवी नहीं हो सकता। उन्हें सौ फूल चाहिए। सौ फूल वाली आबोहवा चाहिए। उन्हें एक मूर्ति नहीं, एक मंदिर, एक भगवान नहीं अपनी निज मान्यता, आस्था के कई देवी-देवता चाहिए। हिंदुओं को पता है एकाधिकार में निहित खतरे। उसकी तासीर एक पैगंबर, एक किताब, एक चेहरे में बंधने की नहीं है। उन्हें नहीं चाहिए राजराजेश्वर, एक रावण, एक हिटलर, एक स्टालिन और इमरजेंसी वाली एक तानाशाह इंदिरा गांधी! 

मतलब हिंदुओं को जीना और जिंदा रहना आता है। वे सहस्त्राब्दियों, असंख्य विदेशी हमलावरों के बावजूद, इस्लाम के डस लेने वाले आधिपत्य के बावजूद बचे रहे हैं तो इसलिए कि उसका धर्म नैसर्गिकता, सहजता, शिष्टता का वह कवच लिए हुए है, जिसमें नरेंद्र मोदी जैसों का भी इसलिए मतलब नहीं है क्योंकि कोई नृप हो हमें का हानि!

जबकि 2019 में नरेंद्र मोदी कहेंगें कि मैं नृप बना रहा तभी हिंदू बचे रहेंगें। हिंदू तभी सुरक्षित! सोचें सहस्त्राब्दियों के असंख्य थपेड़ों के बीच जिंदा रहे हिंदुओं के आगे यह कैसी अहंकार भरी, मूर्ख बनाने वाली बात कि मोदी को चुनेंगे तभी हिंदू बचेंगें! 

क्या हिंदू मूर्ख है, जो इस बात को मानेगा? फिर पांच वर्षों का अनुभव आंखों देखी, भुक्तभोगी है। क्या मोदी के पांच सालों में हिंदू एकजुट हुए या उलटे बुरी तरह बंटे? क्या मोदी-अमित शाह ने हिंदुओं को जबरदस्ती पृथ्वीराज बनाम जयचंद, देशभक्त बनाम देशद्रोहियों में नहीं बांट दिया? क्या हिंदू के आंखे नहीं जो वह न समझे कि दलित आज कितने नाराज हैं? क्या किसी ने सपने में कल्पना की थी कि जातियों में बंट कर हिंदुओं में परस्पर ऐसा द्वेष भी बनेगा कि हिंदू ही हिंदू को मारने लगे! दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में कांस्टेबल सुरेश वत्स की पत्थरों से मौत या तीन दिसंबर को बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या क्या किसी विधर्मी से थी या हिंदू को भीड़ तंत्र में बदल देने वाली राजकाजी करतूतों से थी?

अब यदि यह अनुभव है तो हिंदू को 2019 में बताना होगा कि उसे राम और रावण में फर्क करना आता है? वह कर सकता है सच और झूठ में फर्क। 

निःसंदेह झूठ बोल-बोल मायावी फिल्म दिखलाने का प्रोपेगेंडा भारी होगा। उस नाते 2019 के चुनाव में वह सब देखने को मिलना है, जो भारत के लोगों ने पहले कभी नहीं देखा। यह न सोचें कि महज एक चुनाव ही तो है। जैसे अभी विधानसभा के चुनाव हुए वैसे लोकसभा के चुनाव भी हो जाएंगें। वैसे नहीं होंगे। नरेंद्र मोदी और अमित शाह लोकसभा चुनाव में वह कंरेगें, जिससे आने वाली पीढ़ियां थर्राएंगी। दुनिया देखेगी कि सत्ता प्राप्ति के लिए कोई नेता लोकतंत्र में कैसे प्रोपेगेंडा की सुनामी के लिए भूकंप बनवाता है। कैसे कुबेर का खजाना खुद नालियों में बहता है और सत्य को भी बहाता है।  

तभी 2019 के पहले दिन का पहला आह्वान यह बनता है कि हिंदुओं जागो! पहला संकल्प यह बने कि हिंदुओं को जगाओ। अगले 120 दिन कोई चैन से न सोए। जो भारत राष्ट्र-राज्य की चाहना वाले आदर्शवादी हैं, जिन्हें बतौर कौम हिंदू की चिंता है, जिन्हें आदर्शों और मूल्यों की विरासत में हिंदू के सत्व-तत्व का भान है उन सब हिंदुओं के लिए अगले 120 दिन मर खपने वाले हैं। 

यहां हिंदू का अर्थ समग्र हिंदू समाज। मोहन भागवत हों या अन्ना हजारे, स्वामी अग्निवेश हों या गोविंदाचार्य, यशवंत सिन्हा हों या डॉ. सुब्रहमण्यम स्वामी, अरूण शौरी हों या फली नरीमन, राहुल गांधी हों या नितिन गडकरी, अखिलेश यादव हों या शिवराज सिंह चौहान, मायावती हों या भीम सेना का चंद्रशेखर, ओमप्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल हों या अजित सिंह-जयंत चौधरी, शरद पवार हों या उद्धव ठाकरे, डॉ. मनमोहन सिंह हों या डॉ. मुरली मनोहर जोशी, सोनिया गांधी हों या लालकृष्ण आडवाणी सभी से हमें (सभी विचारधाराओं वाले हिंदुओं) अनुनय-विनय करना चाहिए कि अब तो आंखों के आगे की पट्टी हटाएं! मन का डर मिटाएं। छोटे-छोटे स्वार्थों को भूला कर अपनी भी वह स्क्रिप्ट, वह फिल्म बनाएं जो सत्तावान बाहुबली की मेगा फिल्म के आगे दर्शकों को समझदार बना सके। निश्चित ही इसमें पहला और प्रमुख दायित्व संघ-भाजपा की उस लीडरशीप का है, जिसने मोदी-शाह-जेटली की ढाई लोगों की उस पालकी को पांच साल से ढोया हुआ है, जिसके बोझ ने पूरे देश को चरमरा डाला है। क्या राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी या शिवराज सिंह, वसुंधरा, रमन सिंह आदि तमाम नेताओं और मंत्रियों में यह बुद्धि-विवेक नहीं है, जो यह सोचें कि सोचा क्या था और हुआ क्या! क्या इनका पांच साल का अनुभव इनके दिल और दिमाग में यह मंथन नहीं करवाता कि पांच वर्षों में हिंदू बौद्धिकता, ऊर्जा, उद्यमशीलता, हिंदू निडरता और एकजुटता बढ़ी या घटी? देश, आर्थिकी, समाज और धर्म खोखलाए या सुदृढ़ हुए? 

यह सवाल सभी हिंदुवादियों के लिए है। इसके जवाब में बुद्धि, विवेक से जो भी समझ आए उसी अनुसार लोग अपने को यदि भयमुक्त बना लें और संकल्प ले तो 2019 अपने आप हिंदुओं का मुक्ति वर्ष बनेगा। (जारी)

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