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2018, नेटफ्लिक्स और राक्षस!

अपनी राय में 2018 नेटफ्लिक्स का वर्ष! आप सोच सकते हैं यह क्या बला? फिर मेरे जैसे हिंदी भाषी, लिखने-पढ़ने वाले व देश-विदेश की खबरों में चौबीसों घंटे खपे रहने वाले के लिए नेटफ्लिक्स का ऐसा महत्व कैसे? मगर महत्व है और बहुत है। इससे पूरी दुनिया को जो एक्सेस, पर्दा, स्क्रीन मिला है उससे दुनिया में बहुत कुछ बदला है और बदलेगा। 2018 में मेरा किताब-अखबार पढ़ना, टीवी, फिल्म देखना लगभग छूटा है। मैं पूरी तरह ऑनलाइन हो गया हूं। एक जिम्मेवार कारण नेटफ्लिक्स है। इसकी बदौलत मनोरंजन के नाम पर मैं पूरे साल 20वीं-21वीं सदी के आइडिया, विचार, राजनीति और इससे बने राक्षसों की निर्ममता की हकीकत को कहानियों से बूझता रहा हूं। फिर यह थीसिस बनी कि 20वीं सदी के सौ साल जहां मानव विकास की देवजन्य छलांग थी वहीं इंसान के नरसंहार, उसे त्रास की भट्ठी में जलाने वाले राक्षसों की भी थी। सोचें, साम्यवाद की भट्ठी में कितने करोड लोग मरे और स्टालिन, माओ, ट्रॉटस्की सहित एशिया, अफ्रीका ने कैसे-कैसे तानाशाह झेले! नेताओं द्वारा लोगों को जनता, राष्ट्र, सुनहरे भविष्य के बहाने उल्लू बनाना और जीना हराम करना 20वीं सदी का वह इतिहास है, जिसे हम हिंदू चाहें तो देवता बनाम राक्षसों के द्वंद्व से समझ सकते हैं। 

मैं विचारधारा, सभ्यताओं के संघर्ष, विश्व राजनीति की समसामयिकी को जानने-समझने का पुराना धुनी हूं। सत्तर-अस्सी के दशक में तब इस सब पर बहुत पढ़ना होता था। पर शीतयुद्ध खत्म हुआ, भूमंडलीकरण आया, वैचारिकता सूखी तो स्वतंत्रता- निज आजादी के देवताओं बनाम दमन, क्रूरताओं, सनक के राक्षसों का भी द्वंद्व सिमटा। वक्त ने फिर प्रमाणित किया कि इंसान की प्रगति का राज, ज्ञान-विज्ञान की कुंजी लोगों की निज स्वतंत्रता, दिमाग की भौतिक लालसा व आजाद उड़ान है। लोगों का व्यवहार नेता, व्यवस्था से नहीं बल्कि वक्त से बदलता है और उनका विकास खुद उनके हाथों होता है। जो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अपने को भगवान विष्णु मान कर देश-दुनिया को बदलने की गलतफहमी में रहता है वह अंततः इतिहास में राक्षस कहलाता है। लेनिन, स्टालिन, कैसर, चाउसेस्कू हो या हिटलर, मुसोलिनी, ईदी अमीन या सुकार्णों, नासिर, मारकोस, हैले सिलासी या ईरान का शहंशाह रजा पहलवी, सद्दाम सब का हस्र अंत में राक्षस की छाप में हुआ। अपने को देवता मान, जिन्होंने मूर्तियां लगवाईं वे अंततः इतिहास की राक्षसी मूर्तियां बने। जनता ने उन मूर्तियों को रस्सियों में बांध उन्हें गिरा कर उन पर थूका। उन्हें चूर-चूर किया। 

इन बातों से 20वीं सदी का इतिहास भरा हुआ है। अपने लिए वह इतिहास 2018 में इसलिए जिंदा हुआ क्योंकि नेटफ्लिक्स ने इस इतिहास को किस्से-कहानी से इस तरह स्क्रीन पर उपलब्ध कराया कि मुझे 2018 ने भगवान बने आचार्य रजनीश पर सोचने को मजबूर किया तो 19वीं-20वीं सदी के विचारकों, क्रांतियों, उनके नायकों-खलनायकों के सीरियल देख यह दिमागी कुलबुलाहट भी बनाई कि विचार क्यों कर बनवाता है लीडर! जब लीडरशीप से बनता कम और बिगड़ता ज्यादा है तो नेतृत्व क्षमता की महिमा क्यों? विचार, अनुसंधान अनिवार्यत: स्वतंत्र दिमाग में प्रस्फुटित होता है। मुक्त दिमाग की आबोहवा में कार्ल मार्क्स, नित्से, फ्रायड विचार प्रस्फुटित कर पाए। इसे अंतिम सत्य मान लेनिन, हिटलर, स्टालिन, ट्रॉटस्की आदि ने उसके हवाले अपनी लीडरशीप उभार लोगों को विचार की प्रयोगशाला में बांधा। पर उनका इसके लिए लोगों को बंधुआ बनाना बुनियादी तौर पर राक्षस व्यवहार था। लीडरशीप का राक्षसी रूप था।  

मैं भटक रहा हूं। बहुत भटक गया हूं। मगर नेटफ्लिक्स पर अमेरिका की राजनीति को नंगई से पेश करने वाला ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ सीरियल हो या ड्रग्स के धंधे के माफिया नेताओं का ‘नारको’ सीरियल हो या कम्युनिस्ट धर्मगुरू लेव ट्रॉटस्की का सीरियल हो, इन्हें देख 2018 में कई बार यह विचार कुलबुलाया कि जो नेता होता है, जो लीडर बना होता है वह बुनियादी तौर पर राक्षसी वृतियां लिए होता है! स्वाभाविक है कि नेटफ्लिक्स पर ये सीरियल, डॉक्यूमेंटरी देखते हुए भारत की मौजूदा दशा-दिशा और नरेंद्र मोदी की लीडरशीप पर भी साथ-साथ विचार चलता रहा।   

कल ही मैंने नेटफ्लिक्स पर लेव ट्रॉटस्की की सीरियल को पूरा देख खत्म किया। उसमें 1918 में ट्रॉटस्की द्वारा अपने सपनों के कम्युनिस्ट राज की स्थापना के लिए लोगों के मानवाधिकार खत्म करने, क्रांति विरोधियों को गोली मारने के आदेश वाले घटनाक्रम को देखा तो सौ साल बाद 2018 के आज के वक्त का यह सवाल जिंदा हुआ कि कैसे तो शासक अपने को अवतार मान बैठता है और कैसे जनता भक्ति में अंधी बन जाती है? जनता के विश्वास पर नेता-शासक द्वारा जनता को मूर्ख, भक्त बना उसको अपनी प्रयोगशाला का प्रयोग बना डालना लीडरशीप का वह कुल सत्व-तत्व है, जिससे लेनिन, ट्रॉटस्की भरे-पूरे थे तो आज के डोनाल्ड ट्रंप, पुतिन और नरेंद्र मोदी का भी कोर-कोर ढला हुआ है। बिरले ही नेता होते हैं जो जनता को भगवान मान कर उसकी आजादी, उसकी फितरत, उसके अधिकारों में उसके लिए सत्ता और व्यवस्था को नागरिक की खुली आबोहवा के लिए उसे जवाबदेह बनाते हैं।   

बात क्या थी और कहां पहुंच गई। जो हो, अब नेटफ्लिक्स का अर्थ बताया जाए। यदि आपके घर में इंटरनेट वाई-फाई है और डिजिटल टीवी व कंप्यूटर है तो नेटफ्लिक्स कनेक्शन ले कर दुनिया भर के सीरियल, फिल्मों को ऑनलाइन मनमर्जी जब चाहे तब देख सकते हैं। इस कंपनी ने तमाम तरह के विषयों पर जहां मौलिक सीरियल बनवाए हैं तो दुनिया भर के, तमाम भाषाओं का वीडियो संग्रहण भी बनाया है! इस अमेरिकी कंपनी को 1997 में मार्क रैंडोल्फ और रीड हसटिंग्स ने बनाया था। यों अब कंपीटिशन में कई जैसे अमेजन वीडियो भी इसके आगे है लेकिन नेटफ्लिक्स का जवाब नहीं है। यह आज वैश्विक आला कंपनियों में एक है। ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देशों में इसके चलते बीबीसी जैसे टीवी चैनल पीट रहे हैं तो टीवी चैनलों के दर्शकों की संख्या, उनकी रेवेन्यू का भी भट्ठा बैठ रहा है। उस नाते नेटफ्लिक्स बिना सेंसरशिप वाली वह स्क्रीन है, जो कहानी कहने की कला में करोड़ों (भविष्य में अरबों लोगों का, जैसे गूगल सर्च बना है) लोगों के मनोरंजन, दिमागी खुराक और टाइमपास का वैश्विक जरिया बन चुका है। अपना मानना है कि कहानी की कला आदि काल से चली आ रही है लेकिन मौजूदा वक्त में इस कला का शिखर ह़ॉलीवुड है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां लोगों की आजादी, स्वतंत्रचेता मनोवृति को उड़ने के दस तरह के पंख प्राप्त हैं। 

सो, फिर यह जानें, सोचें, समझें और 2019 का संकल्प लें कि हम सवा सौ करोड़ लोगों को घुट-घुट कर नहीं जीना है। जीना है स्वतंत्रता से, जिंदादिली से ताकि हम भी पा सकें अपने शिखर! 

बहरहाल, नववर्ष 2019 की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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