फारवर्ड का दबदबा व दांव मोदी का!

पहली बात ब्राह्मण-बनिये याकि फारवर्ड वोट अब राजनीति में हैं ताकतवर। तभी रामविलास पासवान हों या उदित राज या कांग्रेस सबने आरक्षण का अंध समर्थन किया। दूसरे, मोदी-शाह ने जात बैलेंस साधा। भाजपा के कोर वोटों को नोटा में जाने, विरोध में जाने से रोका। यह कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। तीसरी बात नरेंद्र मोदी को यदि मई 2019 में जीत दिख रही होती तो क्या मोदी सरकार ब्राह्मण-बनियों, फारवर्ड को खुश करने के लिए आरक्षण का फैसला लेती? कतई नहीं। चौथा पहलू कि पढ़े-लिखे बनिए-ब्राह्मण इस आरक्षण को फ्राड मानेंगे या हमदर्दी में हुआ सच्चा फैसला? मसला यह भी है कि इससे एससी-एसटी एक्ट आदि बातों पर जमीनी स्तर पर बनी परस्पर जातीय खुन्नस पटेगी या बढ़ेगी? फिर सवाल यह कि इसके बाद भाजपा-मोदी के ओरिजिनल कोर फारवर्ड वोट मुखरता से फिर हर, हर मोदी वाला माहौल बनाएंगें या पांच साल के बदहाल अनुभवों में मोदी को हराने की गांठ बांधे रखेंगें? 

जान लें कि गोरखपुर, कैराना, अजमेर, अलवर के लोकसभा उपचुनाव से ले कर मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ विधानसभा के नतीजों ने कई तरह से साबित किया कि भाजपा का कोर बनिया, ब्राह्मण, फारवर्ड वोट खिसका है। यूपी में योगी के गंवार ठाकुर राज ने ब्राह्मणों को बुरी तरह नाराज किया है तो एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मोदी सरकार द्वारा पलटने ने फारवर्ड जातियों में खुन्नस पैदा की। न एससी-एसटी खुश हुए और न फारवर्ड। बनिये पहले से ही नोटबंदी, जीएसटी और कामधंधों में बरबादी से मोदी राज से बिदके थे। इन फारवर्ड का बिदकना मोदी की हवा बिगाड़ने वाला था। आखिर आज भी गांव-देहात में बनिये की दुकान और शहरों में ब्राह्मण-फारवर्ड के मध्य वर्ग की चखचख सियासी माहौल बनाती या बिगाड़ती है। विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद मैं लगातार लिखता रहा हूं कि जयपुर, इंदौर, रायपुर, दुर्ग जैसे शहरों में भाजपा का बैंड बजा तो बड़ी वजह ब्राह्मण-बनियों का भाजपा से मुंह मोड़ना है। इस बात को मोदी-शाह ने पकड़ा और ताबड़तोड़ गरीब फारवर्डों को दस प्रतिशत आरक्षण का झुनझुना थमा दिया। 

इसे झुनझुना ही कहेंगे। इसके मोदी राज की इमेज में पॉजिटिव व निगेटिव दोनों असर होंगे। यदि यह कवायद साल भर पहले होती और संसद के दोनों सदनों, विधानसभाओं से इसे पास करवा कर सुप्रीम कोर्ट को मना कर गरीबी पर फारवर्ड को आरक्षण का पूरा ठप्पा लगा कर जनता के बीच जाया जाता तो हिंदी भाषी इलाकों के फारवर्ड नौजवानों में खासी हवा बनती। सरकार की वाहवाही वाला फैसला होता। हिसाब से यह काम संघ के प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर बयान के बाद किया जा सकता था लेकिन फैसला चुनाव से ठीक ऐन पहले हुआ है। फिर इसकी बैकग्राउंड में एससी, एसटी एक्ट के पीछे की राजनीति है। तभी अपना मानना है कि इससे भाजपा को जितने वोट मिलेंगे उससे ज्यादा उसे गांव-देहात में पिछड़ों, दलित वोटों का नुकसान होगा। इससे उलटे जातियों में गोलबंदी बढ़ेगी। 

वैसे अभी राम मंदिर का मसला पकना है। उससे मोदी-शाह उत्तर प्रदेश में हिंदू बनाम मुस्लिम धुव्रीकरण कितना बनाते हैं इसका फरवरी के आखिर में अनुमान लगेगा। मगर हाल-फिलहाल की स्थिति में मोदी सरकार के फारवर्ड आरक्षण के पैंतरे से उत्तर भारत में जातीय गोलबंदी को बल मिलेगा। इसके चलते अंततः यह भाजपा के लिए घातक भी हो सकता है। 

वजह कई हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे प्रदेशों को लें तो एससी-एसटी एक्ट और मंडल राजनीति में बंधी जातियों में दलित व पिछड़ों में यह नया आरक्षण खतरे की घंटी बनवाने वाला होगा। मतलब जिन जातियों को आरक्षण मिल रहा है वे इस बात से चौंकेंगे कि इस सरकार ने फारवर्ड के आरक्षण का पिटारा खोल दिया। मनोवैज्ञानिक तौर पर वे जातियां, वे जातिवादी नेता यह सोच कर भाजपा से बिदकेंगें कि फारवर्ड भी अब आरक्षण की दौड़ में संविधान संशोधन से आ रहे हैं। इससे आरक्षण की व्यवस्था पर आगे बहस तेज होगी और जातियों की गुथमगुथा में सब कुछ गरीब याकि आर्थिक कसौटी पर जाएगा। इससे ओबीसी, दलित, अति दलित के वोटों में भाजपा की मंशा को ले कर शक फैलेगा। मतलब यदि यूपी में पांच प्रतिशत फारवर्ड वोट भाजपा को मिल गए, कोर वोट नोटा में पड़ने या वोट डालने की बेरूखी वाले नहीं रहे तो उससे अधिक ओबीसी के वोट फारवर्ड के आरक्षण की खुन्नस में भाजपा से बिदके हुए होंगे। 

वैसे यह इस पर भी निर्भर है कि राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मायावती, तेजस्वी आदि आगे फारवर्ड आरक्षण बनाम ओबीसी, दलित वोटों में कैसी चुनाव राजनीति रचते हैं। भाजपा की नीयत, चुनाव के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किसी भी सीमा तक जाने जैसी बातों पर विपक्ष ने यदि फोकस बनाया और सर्वजन की रणनीति में काम किया तो भाजपा को नुकसान वैसा ही होगा जैसे वीपी सिंह को मंडल लागू करने के बाद हुआ था। 

हां, आजाद भारत का इतिहास गवाह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अखिल भारतीय मूड के चलते वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे। तब जनता दल को 142 सीटें मिली थीं। मगर प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी सत्ता को पुख्ता, स्थायी बनाने के लिए मंडल आयोग पर अमल करा ओबीसी आरक्षण का पैंतरा चला। उससे उन्होंने न केवल सत्ता गंवाई, बल्कि 1991 के आम चुनाव में वीपी सिंह और जनता दल का सफाया भी हो गया। न उनका ओबीसी वोट बैंक बना और न पुराना फारवर्ड वोट आधार बचा। जनता दल मुश्किल से 63 सीटें जीत पाई। तब कांग्रेस की वापसी हुई और पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने। मंडलवादी नेताओं ने सामाजिक न्याय के लिए वीपी सिंह की खूब वाह की थी लेकिन वे न उनके सगे हुए और न ओबीसी वोट में मसीहा माने गए।  

उस नाते लोकसभा चुनाव के स्तर पर, अखिल भारतीय स्तर पर आरक्षण के बूते वोटों की राजनीति उलटी मार वाली साबित हुई है। तब नरेंद्र मोदी के लिए फारवर्ड आरक्षण या एससी-एसटी एक्ट में दलितों को खुश करने की पैंतरेबाजी क्या मई 2019 में कमल पर ठप्पे के लिए फायदेमंद होगी? 

फिलहाल पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है। अधिक संभावना वीपी सिंह जैसे ही नरेंद्र मोदी के हस्र की है। मगर यह भी जानें कि अभी आरक्षण जैसे दस काम होने हैं। मैं अपनी उस एक्स्ट्रीम बात को फिर दोहरा रहा हूं कि गांठ बांधें यह बात कि नरेंद्र मोदी मई 2019 में शपथ लेंगे ही। इसके लिए वे ऐन वक्त तक पटाखे फोड़ेंगें। फारवर्ड आरक्षण का फैसला हुआ तो राम मंदिर को ले कर भी तमाशा बनना है। अर्ध कुंभ से हिंदुओं में भगवा भाव बनवाना है तो किसानों को प्रति एकड़ कुछ हजार रुपए देने जैसी घोषणा संभव है तो नौजवानों को भत्ता याकि यूनिवर्सल आय के खाके जैसा ऐलान भी मुमकिन है। मतलब जनता को रिजर्व बैंक का खजाना लुटा कर वोट पटाने का हर संभव काम होना है। 

मतलब चुनाव जीतने के लिए ऐसे-ऐसे काम होने हैं कि बेचारा विपक्ष या तो रिएक्शन में हक्का-बक्का रहेगा या स्वागत करते हुए वैसी ही प्रतिक्रिया देगा जैसे अभी फारवर्ड आरक्षण के समर्थन को मजबूर हुआ। तभी आरक्षण के नफे-नुकसान को पृथकता में कूता नहीं जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इकलौती दिक्कत यह है कि उन पर जनता का विश्वास क्योंकि बुरी तरह टूटा हुआ है सो, सरकार के फैसले आम मानस के सहजता से गले नहीं उतरने हैं। फैसलों का उलटा असर यह सोचते हुए संभव है कि चुनाव जीतने के लिए, सत्ता बचाने के लिए यह सब है। सरकार की साख, नरेंद्र मोदी की घोषणाओं के जुमला अनुभव के चलते आखिर तक हर घोषणा पर शंका होगी कि यह दांव केवल वोट के लिए है। यदि ऐसा नहीं होता तो चार साल पहले फारवर्ड आरक्षण क्यों नहीं होता? मोहन भागवत ने भी तो ऐसे ही आरक्षण पर नीतिगत पुनर्विचार के लिए कहा था। तब क्यों नहीं किया, अब क्यों?

667 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।