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सीबीआई में एक ‘ऋषि’ का बैठना!

अपने को यह जान आश्चर्य हुआ कि ऋषि कुमार शुक्ला सीबीआई डायरेक्टर नियुक्त हुए हैं। इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री दफ्तर, कार्मिक विभाग की मूल पैनल लिस्ट में ऋषि कुमार का नाम नहीं था। न ही कांग्रेस याकि नेता विपक्ष खड़गे की लिस्ट में था। नरेंद्र मोदी, उनके पीएमओ ने पहले से लेकर आखिर तक वाईसी मोदी, फिर रजनीकांत मिश्रा और अंत में एपी माहेश्वरी को चाहा जबकि कांग्रेस-खड़गे याकि विपक्ष के अपने पैंतरे में जावेद अहमद का नाम था। सो, जाहिर है कि ऋषि कुमार शुक्ला के भाग्य का छींका चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की कसौटियों से खुला होगा। मतलब विवादरहित, ईमानदार, पारदर्शी और अव्वल एसीआर ने ऋषि कुमार को सीबीआई में बैठाया। इसलिए जो सीबीआई जैसी संस्था की पुनर्प्रतिष्ठा चाहते हैं उन्हें चीफ जस्टिस का शुक्रिया अदा करना चाहिए। और अपना निजी समझ में मानना है कि इस ऋषि (ब्राह्मण) के रहते सीबीआई में भ्रष्टाचार, मनमानी, राजनीतिक आकाओं को खुश रखने वाले वे काम नहीं होंगे, जिनसे एपी सिंह, रंजीत सिन्हा या आलोक वर्मा आदि के कार्यकाल में सीबीआई ने बदनाम पहचान पाई। 

हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर की मूल पसंद 1984 बैच के वाईसी मोदी और 1984 बैच के ही रजनीकांत मिश्रा थे। जानकारों के अनुसार प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस, नेता-विपक्ष की 24 जनवरी की चयन समिति की बैठक की विचारणीय पैनल में ऋषि कुमार का नाम ही नहीं था। मीडिया में वाईसी मोदी का नाम चला हुआ था। इसी में हल्ला था कि वहीं होगा जो पीएमओ चाहता है। पीएमओ ने नियुक्ति की कसौटी में नंबर एक पर जांच एजेंसियों में अनुभव को बना रखा था। मगर पहली बैठक में चीफ जस्टिस ने कसौटियों में वरिष्ठता, एसीआर को प्राथमिकता वाली कसौटी बनाया। मतलब विजिलेंस, विवाद वालों की छंटनी। तभी वाईसी मोदी से प्रधानमंत्री दफ्तर ने तौबा की। कहते हैं तब यूपी काडर के 1984 बैच के रजनीकांत मिश्रा (बीएसएफ डीजी) पसंद बने। कहते हैं प्रधानमंत्री दफ्तर के नृपेंद्र मिश्र ने बात करके टोह लिया था। 

जान लें कि ऋषि कुमार शुक्ला न सीबीआई में रहे हैं और न किसी अन्य इंवेस्टिगेशन एजेंसी में। वे आईबी में जरूर रहे हैं। उनका ज्यादा समय मध्यप्र देश में ही गुजरा है। वे किसी तरह के विवाद, विवादास्पद जांचों या सियासी झमेलों में नहीं रहे हैं। 

शायद सीबीआई के हालिया विवाद की बैकग्राउंड से यहीं बात उनके पक्ष में गई। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के निर्णायक रूख से जो अंतिम पैनल बनी उसमें कुल मिला कर यूपी काडर-1984 बैच के जावेद अहमद का पलड़ा भारी था। इन्हें यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने शंट किया था। सो, प्रधानमंत्री दफ्तर के लिए यह नाम किसी तरह अनुकूल नहीं था। खड़गे इसी के लिए अड़े तो प्रधानमंत्री दफ्तर मे एपी माहेश्वरी की सोची। उसी में अपना मानना है कि चीफ जस्टिस ने ऋषि कुमार शुक्ला का पलड़ा बनाया तो प्रधानमंत्री का वोट भी उनके लिए हो गया। उनके पक्ष में जावेद अहमद के मुकाबले यह बात तो थी कि पैनल में वे वरिष्ठता (1983 बैच) और एसीआर से अव्वल थे। अपना मानना है कि कांग्रेस ने भी जावेद अहमद के मामले में दिखावे, नूरा कुश्ती के अंदाज में स्टैंड लिया। वैसे यह भी दूर की कौड़ी है कि अजित डोवाल, सिंधिया परिवार आदि के कारणों ने चुपचाप रोल अदा किया हो। 

किसी जांच में न होने की हकीकत पर खड़गे की आपत्ति का जहां सवाल है, उसका अपनी जगह महत्व है। लेकिन अपना मानना है कि सीबीआई का डायरेक्टर कोई खुद जांच नहीं करता। मातहत अफसर करते है। सीबीआई में आज नंबर एक जरूरत ईमानदारी, पारदर्शिता, साफ-सुथरेपन और जांच टीम में भरोसा बनाने का है। उसमें ऋषि कुमार शुक्ला ज्यादा फिट बैठते हंै। 

जाहिर है ऋषि कुमार शुक्ला के विवादों से दूर रहने, अच्छी-साफ-सुथरी-ईमानदार इमेज उनकी पूंजी बनी। तभी अपना मानना है कि ऋषि कुमार की कमान में सीबीआई शायद वापस सामान्य, सहज ढर्रे में लौट आए। वह विवादों से मुक्ति पाए। प्रधानमंत्री मोदी और उनका प्रधानमंत्री दफ्तर भी अब शायद ही वैसे सीबीआई को चला पाएगा जैसे आलोक वर्मा, राकेश अस्थाना से चलाने के दांवपेंच चले थे। मध्य प्रदेश के जानकारों के अनुसार ऋषि कुमार भले और सहज होने के बावजूद स्टैंड भी दो टूक लेते हैं।  

पर मैं गलत भी हो सकता हूं। इसलिए क्योंकि अभी तक का उनके काम का परिवेश मध्य प्रदेश का शांत-सहज प्रशासन है, जहां हाकिम सीधे-सरल होते हैं जबकि दिल्ली का प्रधानमंत्री दफ्तर व राजनीतिक आका उलटे-सीधे राजनीतिक बदलेबाजी के एजेंडे लिए होते हैं। ऐसे में ऋषि कुमार शुक्ला कितनी तरह के दबावों में रहेंगें इसकी कल्पना की जा सकती है। 

वैसे किसी जानकार का कहना था कि शुक्लाजी ज्योतिष में पारंगत हैं। यदि ऐसा है तो क्या इसी के कारण तो यह संयोग नहीं कि मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने अक्टूबर में लंबी छुट्टी ली और भोपाल से दूर जा कर मुंबई में बाईपास सर्जरी कराई! पिछले ही महीने उन्होंने काम संभाला था। उसके बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात की तो अपनी चाह में ही डीजीपी के पद की जगह पुलिस हाऊसिंग निगम के अध्यक्ष का पद ले लिया। और कमाल देखिए कि चुपचाप वहां बैठे शुक्लाजी सीबीआई डायरेक्टर के पद पर आज काबिज हो जाएंगे।   

यह सब इसलिए विचारणीय है क्योंकि सीबीआई नाम की संस्था हाल के सालों में जितनी बदनाम हुई है और इससे भारत की पुलिस सेवा व आईपीएस जमात को कलंक के जितने तमगे मिले हैं वह बहुत त्रासद है। मैं लिखता रहा हूं कि सीबीआई का कुल रिकार्ड प्रधानमंत्री के निजी पुलिस थाने वाला है। हर प्रधानमंत्री अपने विरोधी को दबाने, डराने के लिए सीबीआई थाने का इस्तेमाल करता है। हाल के दशकों में डायरेक्टरों ने प्रधानमंत्री के निजी थानेदार का ज्यादा ही रोल निभाया है।  

जो हो, बिना चर्चा, बिना पीएमओ की लिस्ट, बिना पैरवी और बिना हल्ले के ऋषि कुमार शुक्ला का देश की नंबर एक बदनाम, विवादास्पद एजेंसी का प्रमुख बनना बताता है कि अच्छी एसीआर, भलेपन और भाग्य का मतलब गहरा होता है। उस नाते उम्मीद की जानी चाहिए कि दिल्ली की, नेताओं की लॉबिंग व दलालों से दूर रहे ऋषि कुमार शुक्ला पूर्ववर्तियों से हर तरह से अपवाद बनें। काम से मतलब रखें और एजेंसी में साफ-सफाई कराएं। उनके लिए नंबर एक चुनौती है कि कैसे भी हो, संस्था की प्रतिष्ठा बहाल हो। पता नहीं शुक्लाजी को उनकी ज्योतिष इस मामले में क्या संकेत देती है? क्या ऐसा वे कर पाएंगें या नहीं? 

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