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योगी-मोदी एक ही नारा, जय श्री राम, जयश्री राम

अमित शाह ने जो सोचा था वह अब फलीभूत है। उनका योगी को मुख्यमंत्री बनवाना फायदेमंद रहा। योगी आदित्यनाथ  आज वोटो की भगवा खेती के नंबर एक ब्रांड हैं। जयपुर की आदर्श नगर सीट पर योगी आदित्यनाथ की जनसभा में कार्यकर्ताओं में जोश, उन्माद की धुन में या तो हुंकारा जयश्री राम का था या ‘हिंदू नेता कैसा हो, योगी-मोदी जैसा हो’ का था!  मतलब योगी पहले और मोदी बाद में। सो ताजा विधानसभा चुनावों में योगी का जितना उपयोग हुआ है वह अप्रैल 2019 के लोकसभा चुनाव की बानगी है। मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं। वापिस लिख रहा हूं कि मोदी-शाह का निश्चय हर सूरत में वापिस शपथ लेना है। इसका बीज मंत्र हिंदू-मुस्लिम होगा। इस मंत्र पर यूपी-बिहार में मायावती-अखिलेश के एलायंस के बावजूद उनसे ज्यादा वोट लेने की जुगत मोदी-शाह की होगी। इसमें मुख्य मददगार होंगे योगी आदित्यनाथ। जरा गौर करें कि राजस्थान में भाजपा का चुनाव प्रचार कितनी विपरित स्थितियों में शुरू हुआ था और आखिर में कैसा हल्ला हुआ? इस सबमें, प्रदेश की एंटी इनकंबेसी में अमित शाह-नरेंद्र मोदी ने अपने आपको दूर रखा तो चुनाव को ऐन वक्त कैसे हिंदू बनाम मुस्लिम की धुरी, जयश्री राम, भारत माता की जय के हुंकारों में बदला। चुनाव के आखिरी दिनों में कैसा प्रबंधन बनवाया। 

कांग्रेस ने चुनाव को अपने पक्ष के माहौल के आत्मविश्वास और 2014 से पहले के ढर्रे पर लड़ा। कई मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए तो भाजपा ने उनमें अधिकांश जगह योगी आदित्यनाथ की सभाएं कराई। चुपचाप हिंदू बनाम मुस्लिम में भगवा जमीन तैयार की। उन शहरी इलाकों पर फोकस रखा जो संघ-भाजपा के पुराने गढ़ रहे हंै और जहां नरेंद्र मोदी की इमेज का अभी भी मौन जलवा है। योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी एक और एक ग्यारह होते हैं, इसे समझते हुए अमित शाह ने प्रचार को जितना मोड़ना चाहा, मोड़ने की कोशिश की। 

राजस्थान में योगी आदित्यनाथ या तेलंगाना में योगी की औवेसी को ललकार और फिर पूरे देश में लगातार आठ-दस दिन टीवी चैनलों पर हिंदू बनाम मुस्लिम नैरेटिव कुल मिला कर उन मतदाताओं के लिए है जो पांच साल की आर्थिक दिक्कतों से भाजपा सरकारों से मोहभंग की स्थिति में है लेकिन दिल के कोने में हिंदू होने व नरेंद्र मोदी से हिंदूओं की रक्षा की सोच लिए हुए हैं।

सवाल है यह हिंदू हुंकारा, योगी आदित्यनाथ का हिंदू ब्रांड क्या नरेंद्र मोदी-वसुंधरा राजे की आर्थिक बरबादी, बेरोजगारी, परेशानियों वाली करनियों को दबवा सकता है?  सचमुच यह सोचने वाली बात है कि मोदी-शाह जनमानस में मोहभंग लिए है और उनका कल्याण यदि अब योगी आदित्यनाथ, हिंदु हुंकारे से है तो पांच साल का जनता का अनुभव क्या विस्मृत हो सकता है?  

मैं जैसे नोटबंदी के बाद से लगातार लिखता रहा हूं कि लोगों का जीना हराम है। चौतरफा बरबादी और भटकाव है और मोदी राज की रीति-नीति मूर्खताओं का एवरेस्ट है तो उस माफिक जनता का मनोभाव है या नहीं?  मैं मानता हूं कि जनता में मोहभंग का मनोभाव ही भाजपा की प्रदेश सरकारों के लिए कब्रिस्तान है। उसी से बदलाव की हवा है। अपना अनुमान है कि रमनसिंह या शिवराजसिंह अपनी पोजिटिव पकड़ से भले बदलाव को कुछ रोकें लेकिन मौटे तौर पर 11 दिशंबर को मनोभाव भाजपा का फैसला करवाएगा। खुद जनता मौन रहते हुए चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस की गलतियों, कमियों, मूर्खताओं के बावजूद जनता कांग्रेस को जीताएगी। जनता है जो सब जानती है और उसने नोटबंदी के बाद बदहाली के दस तरह के जो अनुभव किए है वे जनादेश में बोलेंगे। लोगो का अनुभव, उस अनुसार उसकी बनी सोच को मतदान से महिने पहले के प्रचार, योगी-मोदी के भारत माता, जयश्रीराम के हुंकारे, हिंदू –मुस्लिम, अमित शाह के ऐन वक्त के माइक्रो प्रंबंधन से भुलवाया नहीं जा सकता है। 

अपना सोचना सही है या नहीं, यह 11 दिसंबर के जनादेश से मालूम होगा। कई लोग, अच्छे जानकार चुनाव नतीजों में इन दिनों ईवीएम मशीन को भी ले आते हैं। मैं ईवीएम से धांधली की बात नहीं मानता हूं। यदि वह है तो फिर सवा सौ करोड़ लोगों की नियति, लोकतंत्र पर कुछ विचार ही नहीं करना चाहिए।

सो कुल मिला कर छतीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के चुनाव जयश्री राम बनाम पांच साल में पके जन मनोभावों के बीच 11 दिशंबर को फैसला कराने वाले हैं।

इसी में सवाल है कि योगी आदित्यनाथ पर  मोदी-शाह क्या अधिक निर्भर नहीं हो गए हैं? हिंदू नेता कैसा हो योगी-मोदी जैसा हो, में योगी का पहले नाम प्रमाण है कि उनकी भगवा वेशभूषा आगे अप्रैल 2019 में नरेंद्र मोदी का नंबर एक सहारा होगी। नरेंद्र मोदी और अमित शाह का संकट है कि जिस हिंदू –मुस्लिम झगड़े, मंदिर मुद्दे पर लोकसभा का चुनाव लड़ना है उस एजेंड़े में इनका पांच साल का रिकार्ड जीरो है। दोनों यह दांवा नहीं कर सकते कि उन्होने मंदिर के लिए, गोरक्षा के लिए फंला काम किया। तभी इनके हिंदू हितकारी होने का सर्टिफिकेट भगवा वस्त्रधारी योगी के प्रचार से बनता है। देश के सबसे बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री इन्होने भगवा वस्त्रधारी मंहत को बनाया तो इस उपलब्धि का साक्षात प्रचार ही योगी की जनसभाओं से मोदी-शाह का हल्ला बनवाएगा। 

तभी सोचने वाली बात है कि इन विधानसभा चुनावों के बाद मोदी-शाह 2014 के अपने हिंदू मतदाताओं को फिर पटाने के लिए योगी आदित्यनाथ का कितना सघन उपयोग करेगे? तेलंगाना में योगी का अभी जो उपयोग हुआ है उसने यह खटका बनाया है कि उन्ही के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर हिंदू बनाम मुस्लिम राजनीति पकेगी। इन चुनावों में भाजपा हारे या जीते, मोदी-शाह के लिए योगी आदित्यनाथ की शरण में रहना, उन पर निर्भर रहना अब अनिवार्यता है। हां, समझे इस नारे को कि हिंदुओं का नेता कैसा हो, योगी-मोदी जैसा हो।

सोचे, कितना दिलचस्प है भगवा राजनीति का यह मोड़ जिसमें योगी से बेड़ा पार लगवाने के लिए नरेंद्र मोदी आश्रित हो रहे हंै। पहला हिंदू नेता योगी और उसके बाद फिर हैं नरेंद्र मोदी! 

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