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अन्ना की पलटी, ठाकरे के ख्याल!

अन्ना हजारे ने फिर पलटी मारी। कल राज ठाकरे ने रालेगांव सिद्दवी जा कर अन्ना हजारे से अकेले में बात की। उनसे आमरण अनशन खत्म करने का आग्रह करते हुए कहा कि वे भाजपा सरकार को दफनाने के लिए उनके साथ प्रदेश में साझा दौरा करें। जन-जागरण वाला माहौल बनाएं। उधर उद्धव ठाकरे, शिवसेना ने भी अन्ना हजारे को ललकारते हुए कहां कि वे ‘नकारा सरकार’ को समझाना छोड़े। अनशन खत्म करके जेपी बने। शायद इसी का अर्थ बूझ मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने सोमवार को कहां कि अन्ना हजारे इन लोगों के कहने में न आए। वे ध्यान रखें कि इन लोगों ने पहले उनके बारे में क्या कहा था। सरकार ने उनकी 90 प्रतिशत मांगे मान ली है। मगर कल मुख्यमंत्री के कहे का अन्ना हजारे पर असर नहीं हुआ। 

उलटे तल्खी से उनका कहना था कि भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उनका इस्तेमाल किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार न केवल देश के लोगों को गुमराह कर रही है बल्कि देश को तानाशाही की तरफ भी ले जा रही है। महाराष्ट्र की भाजपा सरकार पिछले चार सालों से लगातार झूठ बोल रही है। ये कब तक झूठ बोलते रहेंगे? इन्होने देश की जनता से धोखा किया है। प्रदेश सरकार का यह कहना कि 90 प्रतिशत मांगे पूरी कर दी है, सरासर झूठ है। वे कहते रहते है कि केंद्र और प्रदेश के मंत्री आ कर उनके साथ मुद्दों पर बात करेगें लेकिन मैंने अब इन्हे ना कह दिया है। ताकि लोग कंफ्यूज न हो। जो लोग 2011 और 2014 के उनके आंदोलन से लाभान्वित हुए थे उन्होने पीठ मोड़ी हुई है और उनकी मांगों पर पिछले पांच वर्षों में कुछ भी अमल नहीं हुआ। जाहिर है सोमवार को अन्ना हजारे तल्ख थे। 

पता नहीं अन्ना हजारे की ये बातें मुंबई और महाराष्ट्र के अखबारों में कैसे छपी? मगर कुछ असर ऐसा हुआ कि आज देवेंद्र फड़नवीस रालेगांव पहुंचे। उन्होने अन्ना हजारे से बात की और उनकी मांगे मानने की घोषणा करते हुए अनशन खत्म कराया।  

क्या है इस सबका अर्थ? पहला तो यह कि लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा अन्ना हजारे को पूरी तरह शांत, निष्क्रिय चाहती है। दूसरा यह कि महाराष्ट्र में ठाकरे बंधु हो या एनसीपी व विपक्ष उनकी चुनाव के वक्त सक्रियता चाहता है। अपना मानना है कि अन्ना हजारे ने आज किसी रणनीति में ही अनशन खत्म किया है। सोमवार को अन्ना हजारे का बयान, ठाकरे बंधुओं का समर्थन और राज ठाकरे-अन्ना हजारे की एकांत में बातचीत का अर्थ है कि अन्ना हजारे चुनाव से पहले रोल की तलाश में है। सवाल है क्या यह रोल महाराष्ट्र के स्तर का होगा या अखिल भारतीय स्तर का? और क्या यह संभव है कि नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ लड़ने का चुनावी हल्ला बनाए तो उनके आगे अन्ना हजारे उठ खड़े हो? वे पूरे देश में दौरा करें और नरेंद्र मोदी के धोखा देने का हल्ला करते हुए लोगों को बताएं कि मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बात करते है लेकिन लोकायुक्त तक नियुक्त नहीं किया।  

सोमवार को राज ठाकरे के अलावा एनजीओ एक्टिविस्ट राजेंद्रसिंह व अन्य समाजसेवी भी अन्ना हजारे से मिले। उन्होने किसानों की समस्याओं पर बात की तो लोकपाल-लोकायुक्त एक्ट-2013 की कमियों पर भी विचार किया। अन्ना हाजरे के आंदोलन का समर्थन करते हुए राजेंद्रसिंह ने बताया कि उनके साथ कुछ और एनजीओ जल्दी जुड़ेगे। इसलिए क्योंकि सभी अब मोदी सरकार की क्रूरताओं और संवेदनहीनता को जान गए है।   

संदेह नहीं कि पिछले पांच सालों में सर्वाधिक बैचेन, परेशान यदि कोई रहा है तो खुद अन्ना हजारे रहे हैं और उनके साथ वह सिविल सोसायटी, वे एनजीओ रहे हंै जिन्हे दस तरह से मोदी सरकार ने हैरान-परेशान किया है। याद करें प्रो. अग्रवाल को जो स्वच्छ गंगा के लिए आमरण अनशन पर बैठे थे और सरकार ने रत्ती भी चिंता नहीं की और एक दिन खबर बनी कि उन्होने दम तोड़ दिया। नागरिक समाज, एनजीओ वाली इस जमात ने 2014 से पहले, कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में जबरदस्त भूमिका निभाई थी। वह जमात मोदी राज में जहां बेबस, बिना आवाज रही है तो अन्ना हजारे खुद बार-बार अनशन पर बैठ, धमकी दे कर, फिर सरकार का कहा मान कर अपनी साख गंवाते रहे  हंै। अन्ना हजारे के व्यक्तित्व को पहले अरविंद केजरीवाल से पलीता लगा और फिर मोदी सरकार के आने के बाद अनशन पर बैठने, तोड़ने, फिर बैठने के सिलसिले से पलीता लगा।   

हकीकत है कि कांग्रेस के वक्त अन्ना हजारे का जो महत्व, उनका जो रूतबा था उसे पांच सालों में मोदी-फडनवीस सरकार ने बुरी तरह पैंदे पर पहुंचाया है। वे महाराष्ट्र में भी बेगाने हो गए हैं। लोकपाल के लिए बार-बार अनशन और पीछे हटना जनमानस में यह धारणा बनवा बैठा है कि अन्ना हजारे अब वह नहीं है जो पहले थे। बावजूद इसके यह तथ्य अभी भी पूरे देश के जहन में है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की जिद्द में अन्ना हजारे ने वह सब किया जो उनसे संभव था। 

इस दफा वे 30 जनवरी से आमरण अनशन पर थे। उन्होने घोषणा की थी कि यदि उनकी मांगे नहीं मानी गई तो वे पदम भूषण सम्मान लौटा देंगे। बहरहाल आज मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस से बात करके उन्होने फिर अचानक जिस तरह अनशन तोड़ा है वह निश्चित ही मोदी-शाह-फ़ड़नवीस के संकट प्रंबंधन की बदौलत है। तब क्या माना जाएं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई का हल्ला करते हुए प्रधानमंत्री मोदी चुनाव घोषणा से पहले लोकपाल नियुक्त करेंगे?

संभावना दोनों तरह की है। या तो सरकार अब लोकायुक्त-लोकपाल का फैसला लेगी या अन्ना हजारे मोदी-फ़ड़नवीस याकि भाजपा के खिलाफ चुनाव से पहले कमर कसने की तैयारी में है। सोमवार को राज ठाकरे, एक्टिविस्ट राजेंद्रसिंह से बातचीत के बाद अन्ना हजारे ने भाजपा और नरेंद्र मोदी पर देश को ‘धोखा’ देने की जो बात कही है और आज अनशन उन्होने जैसे खत्म किया है उससे यह भी संभव है कि अन्ना हजारे और उनके साथी एनजीओ जमात के साथ किसी उधेड़बुन में है। मतलब चुनावी शोरगुल में तीसरे, अराजनैतिक, सिविल सोसायटी, एनजीओ जमात वाले पक्ष के हल्ले की भी संभावना है।  

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