राहुल करें अंबानी, अदानी पर वादा!

शुक्रवार को राहुल गांधी ने बड़ी बात कही मगर अधूरी। उन्होंने राफेल सौदे में अंबानी, रिलायंस के धंधे के पहलू पर कहा कि 2019 में उनकी पार्टी की सरकार बनने पर इस मामले की आपराधिक जांच होगी और जिम्मेदार लोगों को सजा मिलेगी। क्या गजब बात जो क्रिमिनल जांच का वादा! मगर क्या यह वादा अधूरा नहीं लगता? जब राहुल गांधी जनसभाओं में कहते हैं कि यह सरकार दो-चार अरबपतियों के लिए है। उसमें अनिल अंबानी एक हैं तो राहुल गांधी व कांग्रेस क्यों न 2019 के लोकसभा चुनाव में मुद्दा बनाते हैं कि अंबानी, अदानी, मोदी, चोकसी जैसे चार- आठ गुजरातियों ने पिछले पांच सालों में आकाश, जमीन और पाताल के प्राकृतिक संसाधनों पर जो एकाधिकार बनाया है और जनता का जैसा जो दोहन हुआ है उसका रिकार्ड बनेगा और क्रोनी पूंजीवाद को खत्म करने के लिए मोदी के चेहते अरबपतियों की संपत्ति, उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करके उसके विनिवेश, बिक्री से किसान- बेरोजगार नौजवानों को सामाजिक सुरक्षा भत्ता देंगें! हां, अंबानी, अदानी जैसे वे पांच-छह खरबपति, जिन्होंने पांच सालों में बेहिसाब धंधा किया। देश के बाकी उद्योग, अरबपति कड़के और दिवालिया हुए लेकिन मोदी करीबी ये खरबपति सुरसा की तरह फलते–फूलते रहे तो क्यों न चुनाव में जनता के बीच मुद्दा बने और जनमत संग्रह हो कि लोग क्रोनी पूंजीवाद चाहते हैं या स्वस्थ पूंजीवाद! 

सोचें, पांच सालों में क्या कभी मुकेश अंबानी का धंधा मंदा पड़ता सुना? टेलीकॉम की स्थापित कंपनियां लड़खड़ाए रहीं लेकिन मुकेश अंबानी ने जियो चालू करके आकाश, हवा की तंरगों मतलब स्पेक्ट्रम, डिजिटल, डाटा की दुनिया में दादागीरी बना डाली। बाकि सब को खा जाने का मोनोपॉली ढांचा बना लिया। पाताल की प्राकृतिक गैस की चोरी के विवाद को चुपचाप घटक कर कमाई को जैसे चमकाया, रिलायंस कुबेर वाली नकदी के साथ जैसे बम-बम होती गई उसके कोई मामूली अर्थ हैं। तेल के दामों में उतार-चढ़ाव के बीच की होशियारी में सरकारी तेल कंपनियों से नाते –रिश्ते में धंधे को चमकाने से ले कर टीवी चैनलों, मीडिया में मोनोपॉली बनाने की जिस भूख को मुकेश अंबानी ने मोदी राज में साधा है उस पर हिसाब से 2019 की सरकार को जांच आयोग से पड़ताल करवाना चाहिए। तब पता पड़ेगा कि पांच सालों में क्या–क्या खेल हुए? जान लिया जाए इस बात को कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के यहां जैसे अनिल अंबानी हैं वैसे ही मुकेश अंबानी का रूतबा है और वैसा ही अदानी का है। इस कयास में दिमाग जाया न करें कि पहले अदानी हैं या अंबानी या पहले मुकेश अंबानी हैं या अनिल अंबानी।

राहुल गांधी निश्चित ही कारपोरेट दुनिया की हकीकत को जानते हैं। कांग्रेस का इन्हें बनाने और क्रोनी पूंजीवाद को पंख लगाने वाला रोल रहा है। लेकिन गांधी परिवार से राहुल गांधी पहले और अकेले नेता हैं, जिन्होंने चुनावों में, अपनी राजनीतिक सोच में क्रोनी पूंजीवाद के खिलाफ गुस्से को जनता के बीच बनाया है। वे बार-बार लगातार कहते हैं कि मोदी सरकार का मतलब कुछ खरबपति। सूट बूट की सरकार और अंबानी-अदानी की सरकार वाली राहुल गांधी की थीम 2019 के लोकसभा चुनाव के नैरेटिव को एकदम से बदल देगी यदि वे कांग्रेस की सरकार बनने के साथ अंबानी-अदानी जैसे अरबपतियों की पिछले पांच वर्षों में प्राप्त छूट, सौदों, रियायतों की जांच कराने और उन सौदो के रद्द करने का जनता से वादा करें। 

हकीकत है कि आम जनता पर बोझ बढ़वाते हुए मोदी सरकार ने बिजली पैदा और सप्लाई करने वाली कंपनियों पर बेइंतहा मेहरबानी की। गुजरात में ही पावर सप्लाई कंपनियों की प्रति यूनिट रेट बढ़ाने के लिए मोदी सरकार और प्रदेश सरकार ने जैसे जो रास्ते निकाले उसकी चर्चा बहुत हुई है। कई प्रदेशों की खानों, कोयला ब्लॉक में प्रदेश सरकार के कब्जे के बाद उसमें फिर गुजराती कंपनियों का अनुबंध कर मोनोपॉली, दादागिरी बनाना या हाईवे के प्रोजेक्ट ले कर उन्हें बांट कर धंधा करने के किस्से मामूली नहीं हैं। पिछले पांच वर्षों में अदानी की ग्रुप कंपनियों के धंधे में जो उछाला आया है वह ऐसे पैमाने का है कि यदि मई 2019 में नरेंद्र मोदी वापिस चुन लिए गए तो सचमुच सवा सौ करोड़ लोगों की औद्योगिक नियति सिर्फ और सिर्फ अदानी, अंबानियों की मोनोपॉली में स्थायी तौर पर जकड़ी होगी।

कोई माने या न माने अपना मानना है कि पांच सालों में नरेंद्र मोदी- अमित शाह ने सर्वाधिक फोकस इस बात पर किया है कि कैसे 25-50 साल के राज की नींव बनाते हुए देश की औद्योगिक संपदा, प्राकृतिक संपदा का चुनिंदा तीन-चार लोगों के हाथ में केंद्रीकरण हो। 

क्या यह राहुल गांधी, ममता बनर्जी, तेजस्वी, शरद यादव, अखिलेश यादव, मायावती या शरद पवार से छुपा हुआ हो सकता है? क्या देश के बाकी औद्योगिक घराने, कारपोरेट महाबली नहीं जान रहे हैं कि कैसे दो-चार लोगों की पांच सालों में दादागीरी रही? 

तभी हैरानी वाली बात थी जो राहुल गांधी ने पहले सूटबूट की सरकार से प्रधानमंत्री मोदी को घेरा और फिर अंबानी की चिंता न करते हुए राफेल सौदे को चौकीदार चौर है का मुद्दा बनाया। गांधी परिवार से ले कर प्रणब मुखर्जी सभी का अंबानियों के चांदी के जूते से जो नाता रहा है उसमें सौ टका अकल्पनीय बात थी जो राहुल गांधी ने जन –जन के बीच अंबानी और अदानी की चर्चा बनवाई। इसका उन्हें जबरदस्त फायदा भी हुआ। राहुल गांधी की बतौर हिम्मती, बहादुर नेता की इमेज बनी तो धारणा बनी कि नरेंद्र मोदी के पीछे अंबानी –अदानी है जबकि राहुल गांधी किसान, जनता के बीच हैं। 

राहुल गांधी किसान, बेरोजगार, गरीब के लिए तो नरेंद्र मोदी अंबानी, अदानी के लिए वाली चर्चा अगले दो महीनों में अंतिम परिणति को प्राप्त होगी। मोदी सरकार रिजर्व बैंक से दो-तीन लाख करोड़ रुपए लेने वाली है। रिजर्व बैंक को कंगला बनाया जाना है। उस पैसे से फिर किसान के खाते में प्रति एकड़ 2-4 हजार रुपए की सब्सिडी या यूनिवर्सल भत्ते से नौजवानों को कुछ रुपए बांटने जैसे नुस्खे नरेंद्र मोदी आजमाएंगें। ऐसा चुनाव के लिए सब कुछ लुटा देने वाली एप्रोच में होगा। 

सोचें उस स्थिति में विपक्ष के पास क्या जवाब होगा? अपनी दलील है कि राहुल गांधी और विपक्ष को तब इस मूल हकीकत पर अड़ना चाहिए कि अंबानियों और अदानियों ने जो कमाया है, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर, बिजली की दरों आदि से जो कुबेर का खजाना बनाया है, इनका जो नकदी का खजाना है तो वह जनता के, किसान, गरीब के काम आना चाहिए। इसके लिए कांग्रेस और विपक्ष वादा करते है कि सरकार बनी तो क्रोनी पूंजीवाद का बेशर्म रिकार्ड बनाई कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर उनकी नीलामी लगवाएंगें और उसके पैसे से किसान, गरीब, बेरोजगार को मदद की व्यवस्था बनेगी। हम रिजर्व बैंक को खाली करने के विरोधी हैं हम नरेंद्र मोदी की चहेती कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करेंगें और इनका विनिवेश कर सच्चे पूंजीवाद की ईकाईयां बनाएंगें। विपक्ष मानता है कि रिजर्व बैंक का पैसा देश की वित्तीय, इमरजेंसी सुरक्षा का रिजर्व है, उसके उपयोग के हम विरोधी हैं मगर अंबानी और अदानी ने क्रोनी पूंजीवादी हथकंडों से जो बनाया है उसे जनता के हित में लेकर, उसकी नीलामी से जनता के लिए नकदी जुटाना, स्वस्थ पूंजीवाद बनाना राष्ट्रधर्म है। 

हिसाब से यह अराजक, आर्थिकी के लॉजिक में सत्यानाशी बात लगती है। लेकिन देश की वित्तीय सुरक्षा के इमरजेंसी रिजर्व पर डाका डाल कर सरकार रिजर्व बैंक को यदि खाली करने का काम करती है तो उसके आगे अदानी-अंबानी के धनधान्य का जनहित में टेकओवर करना क्या जनता में वाहवाही की आंधी बनवाने वाला नहीं होगा? 

सो, शुक्रवार को राहुल गांधी ने राफेल मामले में आपराधिक जांच करवा कर जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने की बात कह ऐसी संभावना के दरवाजे खोले हैं, जिससे अगला चुनाव क्रोनी पूंजीवाद बनाम जन हित की जरूरत में ढला हो सकता है। अदानी-अंबानियों का मुद्दा बना नहीं कि मोदी-शाह डिफेंसिव बनेंगें। वे फिर कितना भी पैसा लुटाएं, बंटवाएं इस बात का जवाब नहीं होगा कि रिजर्व बैंक को खाली करके लुटाना सही है या अदानी-अंबानियों का राष्ट्रीयकरण करके उनसे जनता का पेट भरना ज्यादा सही है? 

यह सवाल, ऐसी बात देश की असाधारण स्थिति, जीवन-मरण की असाधारण लड़ाई में असाधारण तरीका है। राहुल गांधी यदि सचमुच सूटबूट की सरकार, चंद अरबपतियों के लिए प्रधानमंत्री के होने की अपनी बात पर कायम हैं तो जैसे राफेल सौदे की क्रिमिनल जांच का वादा किया है वैसे वे चुनाव जीतने पर चार-छह चहेते अरबपतियों के धंधों को राष्ट्रहित, जनहित, किसान-गरीब हित में टेकओवर का वादा करते हैं तो मंदिर, मस्जिद, हिंदू–मुस्लिम जैसे मसलों की जगह पेट, भूख और क्रोनी पूंजीवाद का नैरेटिव घर-घर, किसान-किसान बनेगा। इसके लिए वामपंथियों, राष्ट्रवादियों, स्वस्थ पूंजीवाद समर्थक उदारवादियों सभी को चुना पूर्व एक सामूहिक निश्चय, नैरेटिव बनवाना चाहिए। तब अपने आप नरेंद्र मोदी- अदानी- अंबानी की पांच साल की दास्तां के पक्ष या विपक्ष में जनमत संग्रह की थीम बनी हुई होगी।  

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