निर्मलाजी, लेकिन अंबानी क्यों?

न अरूण जेटली से और न रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से मालूम हुआ कि नाकाबिलों के बीच अंबानी की रिलांयस डिफेंस कैसे काबिल? माना सरकारी एचएएल कंपनी निकम्मी थी या लाख करोड़ रुपए का नहीं, बल्कि सिर्फ आठ हजार करोड़ रुपए का ही काम अनिल अंबानी को मिला है तब भी वह काम की कैसे हकदार? मान लेते हैं कि विमान बनाने का अनुभव लिए सरकारी एचएएल कंपनी में काम महंगा व अधकचरा होता है तब भी एकदम नई खोखा कंपनी कैसे उससे ज्यादा भरोसेमंद व काबिल? कैसे रिलायंस भारत की तमाम निजी कंपनियों की तरफ से सप्लाई याकि राफेल में मेक इन इंडिया के लिए, विमानों की सप्लाई के बाद उनके रखरखाव में काबिल ठेकेदार कंपनी? चलिए मानें कि हम क्या करें, फ्रांस की कंपनी ने अंबानी की कंपनी का चयन किया, सरकार का लेना देना नहीं है तो क्या डसाल्ट कंपनी ने अपनी तरफ से या सरकार से सरकार के करार में फ्रांसीसी सरकार से भारत को यह सार्वभौम गारंटी मिली है कि उसकी जवाबदेही होगी? उसकी गारंटी है अंबानी की कंपनी के लिए? अंबानी की कंपनी को चुना तो क्या फ्रांस सरकार गारंटी देती है कि वह सौ टका सही सर्विस देगी?

हां, भारत की बतौर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को लोकसभा में बताना चाहिए था कि सबसे बड़े डिफेंस ऑर्डर में अंबानी की रिलायंस डिफेंस का धंधा बना है तो उसकी तरफ से भारत की सरकार ने गारंटी दी हुई है या फ्रांस की सरकार ने दी हुई है? यह सवाल पूछना मूर्खतापूर्ण होगा कि क्यों ऐसी गारंटी चाहिए? इसलिए कि भारत ने, भारत की वायु सेना ने, वायु सैनिकों ने भुगता है रूस से आए मिग विमानों को हवा में उड़ते ताबूत बनते देख। भारत की सेना के कई लड़ाकू पायलट मिग विमानों को उड़ाते हुए मारे गए हैं। शांति काल में भी ऐसे पायलटों के मरने का आंकड़ा दुनिया में कहीं नहीं बना है जैसा भारत में बना है। मोटी वजह रूस से खरीदे गए विमानों में रखरखाव, कलपुर्जों की दिक्कत का माना गया। सोवियत संघ के ढहने के बाद वहां सरकारी कंपनियों, निजी कंपनियों की सर्विस इतनी बिगड़ी की गांरटी, व्यवस्थाओं के बावजूद मिग विमानों के रखरखाव में दिक्कत आई। विमान मौत के ताबूत बने।  

तब राफेल लड़ाकू विमान के रखरखाव में सौ फीसद गारंटीशुदा सर्विसिंग, रखरखाव, पुर्जों आदि के मेक इन इंडिया में क्यों नहीं यह गारंटी लेंगें कि अंबानी यदि भाग गया, रिलायंस डिफेंस यदि फेल हो गई तो फ्रांस सरकार और डसाल्ट एविएशन ऐसा न होने देने की गारंटी दिए हुए है। हां, अनिल अंबानी और रिलायंस का क्या मतलब है यह दो दिन पहले की टाइम्स ऑफ इंडिया वेबसाइट की इस खबर से जाहिर होता है कि स्वीडन की टेलीकॉम कंपनी एरिक्शन ने सुप्रीम कोर्ट में जा कर गुहार लगाई है कि अनिल अंबानी को गिरफ्तार करने का आदेश दे। इसलिए क्योंकि वे 550 करोड़ रुपए के भुगतान में टालमटोल कर रहे हैं। वे सर्वोच्च अदालत के दिए आदेश की जान बूझकर अनदेखी कर रहे हैं और कोर्ट से अनुरोध है कि रिलायंस कम्युनिकेशन को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हो व आरकॉम के रिलायंस जियो को टॉवर व स्पेक्ट्रम बेचने के सौदे पर रोक लगे। 

सोचें कि लोकसभा में अरूण जेटली और निर्मला सीतारमण की अंबानी की तरफदारी, उनकी कंपनी के राफेल सौदे में ठेके के औचित्य वाले भाषण के अगले ही दिन की यह खबर है कि कैसे इस कंपनी ने स्वीडन की महाबली टेलकॉम कंपनी को चूना लगाया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद देनदारी में टालमटोल है। तभी स्वीडन की कंपनी ने अनिल अंबानी की गिरफ्तारी के लिए अपील की। सोचें, अनिल अंबानी, रिलायंस कंपनियां मोदी के आज के राज में कितनी ताकतवर हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनी अपना पैसा नहीं ले पा रही हैं और अदालती फैसलों, आदेशों के बावजूद उन्होंने, उनकी कंपनी ने स्वीडन की एरिक्शन कंपनी को ठेंगा बताया हुआ है। 

इसलिए यह अब अनिवार्य है जानना कि फ्रांस सरकार ने रिलायंस डिफेंस को डसाल्ट द्वारा पार्टनर बनाने के सिलसिले में सरकार से सरकार को सार्वभौम (Sovereign) गारंटी दी है या नहीं? मगर इस मामले में अपना मानना है कि जब फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांदे ने ऑन रिकार्ड कहा है कि भारत ने, नरेंद्र मोदी ने रिलांयस डिफेंस को सुझाया है तो फ्रांस से भला इस कंपनी के लिए कैसे गारंटी मिल सकती है? आश्चर्य है कि अरूण जेटली और निर्मला सीतारमण ने घंटों लंबे अपने भाषणों में यह कहने का साहस नहीं दिखाया कि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ने झूठ बोला। वे झूठे हैं। 

पर जिस राष्ट्रपति की देखरेख में, जिससे बात करके नरेंद्र मोदी ने राफेल का सौदा किया उसे भारत की संसद में भारत की रक्षा मंत्री झूठा करार देती तो फ्रांस में भारत की, मोदी सरकार की कैसी साख बचती इसे समझना मुश्किल नहीं है। 

सो, अरूण जेटली ने उसके बजाय यह समझाया कि राहुल गांधी को ऑफसेट करार की ए, बी, सी समझ नहीं है। अब कोई पूछे कि जब सौदे के विवाद में आने की ए, बी, सी से ले कर जेड तक की वजह अनिल अंबानी की कंपनी है तो जेटली को क्या यह नहीं समझाना था कि अनिल अंबानी और रिलायंस डिफेंस क्यों कर एचएएल से अधिक समर्थ कंपनी है। इसकी गारंटी भारत सरकार देती है।  

आज मुझे सोशल मीडिया से जेटली, निर्मला सीतारमण के भाषण की वीडियो क्लिप इस शीर्षक के साथ मिले कि वाह, देखो विपक्ष को क्या खूब धो दिया। कोई पूछे कि इनके भाषणों में अनिल अंबानी की एचएएल के मुकाबले ज्यादा काबलियत का एक भी बिंदु सुनने को मिला? घोटाले का शक, जांच का विषय सिर्फ और सिर्फ अंबानी और उनकी कंपनी का सौदे में धंधा बनाना है। यह धंधा एक हजार करोड़ रुपए का, आठ हजार करोड़ रुपए का हो या बीस हजार करोड़ रुपए का या तीस का या एक लाख करोड़ रुपए का, मूल मसला यह है कि दिवालिया, कड़के उद्यमी और उसके ग्रुप को ठेका कैसे मिला, कैसे वह काबिल जिसका रिकार्ड घटिया सेवा का है।    

यहीं शक का आधार है। निर्मला सीतारमण ने यूपीए सरकार के वक्त एंटनी के डसाल्ट के चुने जाने की स्टेज पर फिर जांच-पड़ताल के उनके आदेश पर उनकी जैसी आलोचना की वह सर्वथा इसलिए गलत थी क्योंकि उस वक्त शक बना था कि डसाल्ट के पीछे मुकेश अंबानी हैं। एके एंटनी ने हिम्मत का तब काम किया था जो जल्दबाजी नहीं की। यह भी जानें कि फ्रांस के राफेल बनाम जर्मनी के यूरोफाइटर टायफून में मुकाबला भारी था। मैंने इसी कॉलम में 30 जून 2014 (मोदी सरकार के आने के महीने बाद) को ‘मोदी-जेटली खरीदेंगें कबाड़ हथियार?’ के शीषर्क में इस मामले पर लिखा था। तब लिखी इन पंक्तियों पर गौर करें- गूगल पर यदि राफेल बनाम यूरोफाइटर टायफून की तुलना की सर्च मारें तो जो चार्ट निकलेंगे उन सबके निष्कर्ष हैं- राफेल सस्ता विमान हैं लेकिन यूरोफाइटर असल में राफेल के मुकाबले अधिक इकोनॉमिकल है। ऐसा शायद हथियारों से लैस करने की लागत से होता होगा। तभी अपने यहां भी खबर है कि फ्रांस का राफेल अंततः मंहगा पड़ रहा हैं। फिर राफेल को बनाने वाली डसाल्ट कंपनी अपनी हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स से साझेदार बनने और तकनीक के शत-प्रतिशत ट्रांसफर में भी ना-नुकुर कर रही बताते हैं। 

‘दुनिया की रक्षा पत्रिकाओं का निष्कर्ष है कि यूरोफाइटर ज्यादा मारक हैं। यूरोफाइटर बेहतर आर्म्ड विमान हैं। राफेल को जहां किसी दूसरे देश ने नहीं खरीदा है वहीं यूरोफाइटर को सात देशों से ऑर्डर मिले हुए हैं। सवाल है तब भारत ने ही फ्रांस की कंपनी को क्यों चुना? इसके जवाब में एक फरवरी 2012 को डिफेंस-एयरोस्पेस.कॉम में जियोवानी द ब्रिगांटी के छपे लेख में यह टिप्पणी देखने को मिली कि यदि राफेल को अकेले भारत में सौदा पटाने में सफलता मिली है तो असल वजह राजनीतिक है। जाहिर है राफेल का सौदा गोलमाल और शक की सुई लिए हुए है। तभी यह तुक भी बैठती है कि ईमानदार पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने इस बारे में फुर्ती व जल्दबाजी नहीं दिखाई।.... इस सौदे के लिए मनमोहन सरकार के वक्त जैसी लॉबिंग हुई थी और कांग्रेस आलाकमान से लेकर मुंबई के खरबपति की लॉबिंग की जो चर्चाएं हुईं उसकी बैकग्राउंड में नरेंद्र मोदी- अरूण जेटली को इस पर अनिवार्यतः समीक्षा करनी चाहिए।’ 

‘...पर यह बहुत अजीब बात है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है और उससे पहले ही वायु सेना की एक ब्रीफिंग के हवाले रक्षा मंत्री का यह मूड एनडीटीवी के वेबसाइट पर झलक पड़ा कि वे पॉजिटिव हैं और राफेल के सौदे के पक्ष में हैं। इस खबर का संयोग फ्रांस के विदेश मंत्री के दिल्ली आने से ठीक पहले हुआ।’

‘जाहिर है दिल्ली में मोदी सरकार बनने के साथ हथियार लॉबी का खेल शुरू हो गया है। यूपीए सरकार के किए विचार को ही आगे सौदे में कन्वर्ट कराने का दबाव बनने लगा है। देखना है नरेंद्र मोदी और अरूण जेटली दबाव में आते हैं या अपनी कसौटियों, अपने विवेक, अपनी समझदारी और अपनी ईमानदारी पर हथियार खरीदते हैं या इधर-उधर की लॉबिंग में जस का तस ढर्रा बनाए रखते हैं।’

सोचिए, मैंने मोदी सरकार के बनते ही यह सब लिखा। लेकिन बाद में मोदी-जेटली ने समीक्षा करने के बजाय मनमर्जी अंदाज में ऑर्डर को घटाया, एचएएल को आउट किया और अनिल अंबानी की कंपनी को धंधे में घुसा दिया। और अभी तक इस बात का जवाब नहीं कि अनिल अंबानी और उनके रिलायंस ग्रुप का ऐसे महंगे और संवेदनशील सौदे में क्या मतलब? जिस सेठ को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में स्वीडन की नामी कंपनी एरिक्शन ने गिरफ्तारी के लिए, धोखे की याचिका डाली है उस सेठ, उसकी कंपनी को ले कर अरूण जेटली, निर्मला सीतारमण लोकसभा को इतना तो भरोसा देते हैं कि यह गारंटी मोदी सरकार की तरफ से कि यह कंपनी लड़ाकू विमानों के रखरखाव में नट बोल्ट फ्रांस से ही मंगवा कर लगवाएगी न कि दिल्ली के नारायणा से मंगवा कर मेक इन इंडिया करा राफेल को मिग जैसे उड़ते ताबूत में बदलेगी! कुछ तो गारंटी दो, काबलियत बताओ रिलायंस डिफेंस के एचएएल से अव्वल होने की!  

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