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राफेल पर सुप्रीम कोर्ट की सही पहल

सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस ने तीन जजों की अपनी बेंच के जरिए सही फैसला किया, जो सोचा कि पहले जाना जाए कि राफेल सौदे के फैसले से पूर्व प्रक्रियागत क्या कुछ था? यह समझना दूध का दूध, पानी का पानी होना है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने ठीक कहा कि वे सरकार को राफेल सौदे का नोटिस नहीं भेज रहे हैं। न ही अदालत लड़ाकू विमानों की ‘कीमत या उपयुक्तता’ के पहलुओं में जाना चाहती है। ‘उस नाते हम सरकार को नोटिस नहीं भेज रहे हैं। हम साफ कर देना चाहते हैं कि याचिका में जो दलीलें हैं, उन पर नहीं जा रहे हैं। वे आधी-अधूरी हैं। हम खुद पहले संतुष्ट होना चाहते हैं कि निर्णय तक पहुंचने की प्रक्रिया क्या थी? क्या–क्या कदम थे? 

सुप्रीम कोर्ट की एप्रोच सटीक है। इसलिए कि यदि सरकार में फैसला सोच-विचार कर हुआ है। नीचे से ऊपर तक सभी की राय, नोटिंग और पूर्व निर्धारित निर्णय प्रक्रिया अनुसार फ्रांस की डसाल्ट कंपनी से राफेल खरीदने का फैसला हुआ है तो अपने आप राफेल विमान की उपयुक्ततता और कीमत से लेकर विमानों की देख-रेख के लिए अंबानी की कंपनी के डसाल्ट के साथ ऑफसेट समझौते के मामले की सच्चाई या उसके विचार लिखे हुए होंगे? निश्चित प्रक्रिया अनुसार विचार तो हुआ होगा। आखिर हथियार कैसे खरीदे जाएं, इसका तरीका, प्रक्रिया, उसमें सरकार, रक्षा मंत्रालय, कैबिनेट की अलग-अलग कमेटियों का रोल पहले से परिभाषित है।  

क्या राफेल के आर्डर देने तक उस सबकी पालना हुई? या प्रक्रिया की बजाय मनमानी हुई? याकि कायदे और सलाह को दरकिनार कर फैसला हुआ? यहीं लाख टके का सवाल है। 

सो, औपचारिक तौर पर राफेल को लेकर सुनवाई भले शुरू नहीं हुई हो लेकिन मामले की तह में जाने का सुप्रीम कोर्ट ने मन बनाया लगता है। सरकार को 29 अक्टूबर तक बंद लिफाफे में बताना है कि राफेल का आर्डर देने के फैसले तक कैसे पहुंचा गया? पहुंचने का प्रक्रियागत सिलसिला क्या था?  

ध्यान रहे सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन दो याचिकाओं में अदालत की निगरानी में जांच की अपील थी। या तो सरकार पूरा ब्योरा दे या सौदे को रद्द करने का आदेश हो। याचिकाकर्ता एमएल शर्मा की याचिका में कहना था कि फ्रांस की डसाल्ट कंपनी से 36 लड़ाकू विमान खरीदने में 59 हजार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है।  

गुरुवार को अदालत में सरकार की तरफ से पेश हुए अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल का तर्क था कि इन याचिकाओं को खारिज किया जाए क्योंकि इनका मकसद सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के बीच हो रही लड़ाई में राजनीतिक फायदा उठाना है। 

अदालत ने न अटार्नी-जनरल वेणुगोपाल के कहे को माना और न याचिका अनुसार सौदे पर स्टे जैसी कोई बात कही। उसकी बजाय अपनी तह केंद्र सरकार से प्रक्रियागत जानकारी मांगी। 

संदेह नहीं राजनीतिक विवाद कीमत और अंबानी की कंपनी को लेकर है। भारत की वायु सेना को नए लड़ाकू विमान की जरूरत है और राफेल जरूरत की कसौटियों में सटीक है, इसको लेकर किसी को कोई आपत्ति या संदेह नहीं है। हिसाब से सौदा बहुत पहले होना था। कांग्रेस की यूपीए सरकार के वक्त हो जाना चाहिए था। तब नहीं हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कमान में हुआ तो झंझट इसके चलते भी नहीं है। झंझट तब और अब की निर्णय प्रक्रिया में किस-किस स्तर पर विचार और विचार दौरान सौदेबाजी के अलग-अलग चरण में कीमत, संख्या और सरकारी बनाम प्राइवेट कंपनी की भागीदारी में आए परिवर्तनों के चलते है। 

मतलब कैसे यह हुआ कि यूपीए सरकार अलग तरह का सौदा करने वाली थी तो मोदी सरकार ने अलग नतीजे में अलग सौदा किया? मनमोहन सरकार ने 126 राफेल खरीदने का इरादा सौदेबाजी के अंतिम चरण में बनाया। इसके लिए तब सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड, एचएल का फ्रांसीसी कंपनी डसाल्ट से ऑफसेट सौदा होना था। यहीं नहीं भारत में निर्माण, तकनीक ट्रांसफर का समझौता भी सहमति में था। कीमत तब प्रति विमान छह सौ करोड़ रुपए थी। वह सब हुआ तो रक्षा मंत्रालय में नीचे से ऊपर और कैबिनेट की कमेटियों में विचार, प्रक्रियागत अलग-अलग चरणों में विचार, फाइल नोटिंग के जरिए ही तो हुआ होगा। 

तब नई सरकार याकि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद नए सिरे से विचार शुरू हुआ तो उसके लिए प्रक्रिया, रीति-नीति तो वही रही होगी, जिसका सरकार में कायदा है। तब फर्क कैसे आया? 

सो, यदि सुप्रीम कोर्ट प्रक्रियागत बारीकियों में जा कर मनमोहन बनाम मोदी सरकार के वक्त हुए विचार, नोटिंग प्रक्रियागत चरणों को क्रमबद्धता से जांचे तो अपने आप फर्क के कारण समझ आने चाहिए। मूल मसला फैसले के पीछे के तरीके और विचार में अंतर का है। इसी के चलते मोदी सरकार निरूतर रही है। किसी को यह लॉजिक, तर्क समझ नहीं आया कि जो विमान पहले सवा छह सौ करोड़ रुपए में खरीदा जाना था वह 16 सौ करोड़ रुपए का हो गया तो कैसे? दलील दी गई कि पहले विमान का केवल खोखा खरीदा जा रहा था और अब आयुध प्रणालियों के साथ है।

भला यह कैसे संभव है? क्या मनमोहन सरकार के वक्त वायु सेना वालों ने बिना आयुध प्रणालियों के केवल खोखा खरीदने की जरूरत बताई? क्या तब खरीद का आधा फैसला हुआ था? मतलब छह सौ करोड़ रुपए का खोखा राफेल पहले खरीदेंगे और बाद में हजार करोड़ रुपए की आयुध प्रणालियां? 

यह बाल की खाल नहीं है। भारत की सुरक्षा की गंभीरता के सवाल हैं। दो सरकारों में विचार कैसे दिन-रात का अंतर लिए हुए हो सकते हैं, यह राफेल के खरीद सौदे से जाहिर है। इसलिए प्रक्रियागत जांच-पड़ताल जरूरी है तो हिसाब से सुप्रीम कोर्ट को बूझना–समझना चाहिए कि दो सरकारों के फैसले में एक से पैरामीटर, एक सी प्रक्रिया, एक ही वेंडर के बावजूद इतना भारी अंतर कैसे हुआ? 

इसलिए सुप्रीम कोर्ट की आज की पहल रक्षा मामलों में प्रक्रियागत व्यवस्था की बारीक पड़ताल साबित हो सकती है तो इससे आगे के लिए ठोस व्यवस्था भी बनेगी। जरूरत इतनी भर है कि बंद लिफाफे की बंद रिपोर्ट के साथ प्रक्रिया अनुसार बनी हुई फाइलों को भी समझा जाए। 

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