चार सौ मुंडी लाओ चार सौ सीटें पाओ!

पुलवामा में आंतकी हमले पर मोदी भक्तों, मूर्ख हिंदुओं ने सोशल मीडिया में जिस अंदाज में झंडा उठाया है वह प्रमाण है कि लक्ष्य चार सौ सीट याकि लोकसभा चुनाव जीतने का है। परसों सद्गुरू वासवानी ने सियासी/आध्यात्मिक/ राजगुरू के अंदाज में नरेंद्र मोदी को ज्ञान दिया कि बच्चा, बहुत हुआ अब धारा 370 को खत्म करने का अध्यादेश लाओ! तो क्या माना जाए कि 14 फरवरी से लेकर 14 मई 2019 के तीन महीनों के कैलेंडर में नरेंद्र मोदी ने, उनके चाणक्य अमित शाह ने, उनके सदगुरूओं ने हर दिन को ऐसे उकसावे, ऐसी घटना, ऐसे भाषण में गूंथा है, जिससे हर दिन लोगों के बीच भारत बनाम पाकिस्तान बने। हिंदू बनाम मुस्लिम हो। कश्मीर में ऑपरेशन चले और चार सौ कटे सिरों की वह माला बने जो मोदी को उनके दुबारा राज्यारोहण में बतौर राजमाला पहनाई जा सके। निश्चित ही भारत में नरेंद्र मोदी का अगला राज्यारोहण चार सौ मुंडियों वाले उस रक्तपात से होगा, उस हिंदू बनाम मुस्लिम के पानीपत से होगा, जिसका प्रायोजन अगले तीन महीने में मीडिया के जरिए यूपी, बिहार, बंगाल के घर-घर में चर्चा व चिंता में होना है। 

मतलब अगला लोकसभा चुनाव पिछले 16 आम चुनाव के सहज-सामान्य अंदाज वाले आम चुनावों जैसा नहीं होगा, बल्कि पानीपत की लड़ाई होगा। इस लड़ाई को खून से, उन्माद से, भावनाओं की रक्तरंजना से मोदी-शाह लड़ेंगे। पूरा चुनाव टीवी चैनलों, मीडिया के इस झूठे प्रचार पर लड़ा जाना है कि देखो 56 इंची शेर ने पाकिस्तान को पेशाब करा दिया। इमरान खान की नींद उड़ा दी। सऊदी अरब के प्रिंस शेख तक ने मोदी नाम के शेर के आगे मिमियाते हुए पाकिस्तान की ठुकाई की सहमति दी। अमेरिका के ट्रंप और चीन के शी सब पाकिस्तान का साथ छोड़ कर मोदी की वाह करते हुए कह रहे हैं मोदी तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं और काट लो आईएसआई वाले अजहर की और उसके आंतकी गुर्गों की चार सौ मुंडियां! देखो, देखो आज का पृथ्वीराज नहीं चूक रहा। वह मोहम्मद गौरी को मारने वाला विजेता है जो दिन रात अपनी राजमाला में पाकिस्तानी चेहरे को टंगवा देने के मिशन में खपा हुआ है। जिसने पाकिस्तान को अलग-थलग करवा दिया। उसे दिवालिया बना दिया। कोई उसे मदद नहीं कर रहा। उसके एटमी हथियारों को फंफूद लग गया है। वह अपने शेर नरेंद्र मोदी- अजित डोवाल-अमित शाह की दहाड़ से थर-थर कांप रहा है!  

हां, आंतकियों की 40 तो भारतीय सेना की काटी चार सौ मुंडियों के सिनेरियो से टीवी चैनलों के शो, गला फाड़ नैरेटिव, उठावनों में भी उन्माद के हुंकारों से ले कर जंगी माहौल और तीन तलाक, अनुच्छेद 370 जैसी तमाम बातों में सौ करोड़ हिंदुओं को भरमाने का यदि अगले तीन महीने लगातार अखिल भारतीय मैसेज बना रहा तो घर-घर अनिवार्यतः विचार बनेगा कि बस बहुत हुआ। दिखाओ पाकिस्तानियों, कश्मीरियों, मुसलमानों को औकात! तब वोट देने की अपने आप यह कसौटी होगी कि मोदी के अलावा है कौन? नतीजतन तब उत्तर प्रदेश में अमित शाह का वह उद्घोष सही प्रमाणित होगा कि भाजपा को 51 प्रतिशत वोट मिलेंगे। यूपी में 73 की जगह भाजपा 75 सीटें जीतेगी तो पूरे देश में 2014 से भी बड़ा चार सौ सीटों का जनादेश नरेंद्र मोदी लिए होगा। 

इसलिए चार सौ मुंडियां है रामबाण नुस्खा। तभी जो काम पांच सालों में नहीं हुआ वह अगले तीन महीने में होगा। मतलब सबका साथ, सबका विकास, इंसानियत-कश्मीरियत, नवाज शरीफ का शपथ में बुला कर उनके गले पड़ना, लाहौर जा कर पकौड़े खाना और तो और इस महीने भी श्रीनगर की डल लेक में नौका वहन करते हुए शून्य में हाथ हिलाने वाली रोमांटिक हीरोगिरी खत्म और शुरू तलवारबाजी! 

वैसे अपना मानना है कि आदमी सोचता क्या है और ईश्वर का फैसला दूसरा होता है! यदि साल भर से खराब वक्त वाली घटनाएं एक-एक करके होती रही हैं। हर कोशिश मोदी के लिए उलटी पड़ी है। लगातार नरेंद्र मोदी-अमित शाह का ग्राफ लुढ़का है तो 14 फरवरी की पुलवामा घटना के वक्त के ग्रह-नक्षत्रों का मंगल वाला मोड नरेंद्र मोदी के चार सौ मुंडियों-चार सौ सीटों का अच्छा वक्त ले आया हो, यह अपने को तार्किकता में सही समझ नहीं आता है। इसके बावजूद यह विचार भी है कि बम विस्फोट, आंतकी हमले से बनता है उन्माद, भावनाओं का पागलपन। पागलपन के दौर में कुछ भी हो सकता है। भावनाओं से पैदा पागलपन में कौम और राष्ट्र-राज्य भी खाड़ी में छलांग लगा सकते हैं। 

फिर मोदी-शाह की तारीफ का नंबर एक गुण यहीं है कि इन्हें हिंदू की कमजोर नस की समझ व उसे वक्त आने पर झनझना देने में विशेषज्ञता गहरी प्राप्त है। तभी मैं नरेंद्र मोदी के ग्राफ गिरने और डेढ़ सौ सीटों के आसपास अटकने के विश्लेषण के बीच भी पाठकों से कहता रहा हूं कि मेरी इस एक्स्ट्रीम बात को हमेशा नोट रखें कि कुछ भी हो नरेंद्र मोदी वापिस शपथ लेंगे। मोदी-शाह कुछ भी करेंगे लेकिन सत्ता छोड़ेंगे नहीं। चुनाव से ऐन पहले जो होगा वह ऐसा होगा, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की हुई होगी। कोई आंतकी घटना होगी या किसी हिंदू नेता पर कोई आंतकी हमला हो जाए। मतलब जिसकी कल्पना भी न हो वह होगा। 

और जान लें इस समझ के बावजूद मेरी कल्पना से परे यह चुनावी आह्वान है कि चार सिर काट लाओ और बदले में पाओ चार सौ सीटें! या सद्गुरू वासवानी का मोदी से कहना कि धारा 370 खत्म करने का अध्यादेश ले आओ! या यह नैरेटिव कि चलो पानीपत के मैदान में! उठाओ कलम लाओ अध्यादेश! भाषण दो बताओ सीने की आग! उठाओ तलवार, काट कर लाओ मुंडियां!

सोचें, लापरवाही या जान बूझकर होने दिए गए एक ट्रीगर से भारत के आम चुनाव के लिए घटना-दर-घटना का कैसा रोडमैप खुला है? सबको बदले की आग में झोंक दिया है। भारत का प्रधानमंत्री डंके की चोट जनसभाओं में भीड़ में कह रहा है कि मेरे दिल में भी बदले की आग है। क्या देश का प्रधानमंत्री तीन महीने आग में जलता रहेगा या मतदान से पहले चार सौ मुंडियां लाने की चुनौती पूरा करेगा?  सोचें, सवा सौ करोड़ लोगों का भारत राष्ट्र-राज्य चुनाव से ऐन पहले आज किस मकसद में कैसी जंग के कगार पर है? मुंडियां चाहिए क्योंकि हम अंदरूनी सुरक्षा, चाक चौबंद बंदोबस्तों में लापरवाह हैं। फेल हुए हैं!

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