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हर नेता को लेना होगा संकल्प!

क्यों और किसलिए? ताकि बच पाए देश की वह राजनीतिक सरंचना, जिसमें हिंदुओं का सत्व-तत्व है। 2019 में सबको सोचना है कि देश और हम हिंदू किस राजनीतिक सरंचना में फलते-फूलते, खिलते हैं? क्या अनुभव है पिछले पांच सालों का? इस मामले में विचार, संकल्प का पहला दायित्व मोहन भागवत, संघ पदाधिकारियों, भाजपा सांसदों, विधायकों, नेताओं यथा डॉ. मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी याकि संघ-भाजपा परिवार का है। इन्हें अपने अनुभव पर तौलना है, फैसला लेना है कि वाजपेयी वाली सरकार, आडवाणी-जोशी वाली पार्टी चाहिए या नरेंद्र मोदी वाली सरकार और अमित शाह वाली भाजपा? अनुभव बोलता है तो सोचना और संकल्प भी बनना चाहिए। 

मोहन भागवत व संघ के हिंदुवादियों के एजेंडे में भी यदि सोचें तो इनके लिए पांच सालों का अनुभव क्या है? क्या जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 या अनुच्छेद 35 ए खत्म हुआ? क्या कॉमन सिविल कोड बना? क्या गौहत्या पाबंदी का अखिल भारतीय कानून बना? क्या मदरसा शिक्षा बंद हुई? क्या राम मंदिर बना? क्या शैक्षणिक पाठ्यपुस्तकों का राष्ट्रवादी या हिंदुवादी रूपांतरण हुआ? हिंदुओं के जातीय जहर का फैलाव रूका या फैला? क्या शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, कला में एक भी ऐसा काम हुआ, जिसकी बतौर वैकल्पिक वैचारिकता के धाक बनी या वाह हुई हो? कटु सत्य है कि उलटे पांच वर्षों में संघ और उसकी विचारधारा बदनाम हुई है, उसका यह वैश्विक धिक्कार बना है कि ये हिंदू कैसे हैं जो भीड़ बना कर लोगों को लिंच करते हैं! 

सबकी वजह पांच साला सत्ता अनुभव है। पर सत्ता याकि सरकार की लक्ष्यहीनता, विचारविहीनता, सत्ता लोलुपता और नेतृत्व का अहंकारी-तानाशाही मिजाज का मसला कुछ समय के लिए नजरअंदाज भी कर दें तो उस राजनीतिक संस्कृति, आचरण का क्या होगा जो विचारधारा, राजनीतिक आंदोलन, चाल-चेहरे-चरित्र को बनाती या बिगाड़ती है व  इस सबके लिए परिवेश बनाती है! कहने को कह सकते हैं कि मोहन भागवत, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी आदि को सत्ता और सत्ता की जेड सुरक्षा का परिवेश मिला है तो यही अपने आप में बड़ी बात है। मोहन भागवत इसी बात से गदगद घूमते हैं कि उनके वक्त में भगवा आंधी आई। मगर अपना मानना है (शायद गलत हो सकता हूं) कि एक औसत हिंदू जो भलापन लिए होता है वह पिछले पांच सालों के अनुभव में यदि छटपटाया रहा है तो संघ-भाजपा के लोग भी छटपटाए रहे होंगे। भाजपा, संघ परिवार में ढाई लोगों की सत्ता में मुश्किल से ढाई सौ लोग आनंदित होंगे बाकी तो सब मन ही मन इस भय, इस शर्म में हैं कि हमने अपने को ही बरबाद करने वाले कैसे-कैसे भस्मासुर पैदा किए। जिस चाल, चेहरे, चरित्र और राजनीतिक सरंचना में मोहन भागवत या लालकृष्ण आडवाणी ने धुन के साथ भाजपा को बनाया था वह क्या पांच सालों के अनुभव में असहज नहीं रही होगी? 

पर पांच सालों में भागवत और भाजपा भयभीत भी बने हैं। बहरहाल, मैं भटक रहा हूं। बुनियादी बात है कि पांच साल के अनुभव के बाद संघ-भाजपा के सच्चे (फर्जी, गुलाम नहीं) पदाधिकारी और नेता क्यों न सोचें कि विचारधारा को, चाल-चेहरे-चरित्र को बचाना है तो संकल्प लें कि बुद्धि, विवेक, निडरता से हम अपने आपको बचाएंगें। हमारी प्राथमिकता भारत राष्ट्र-राज्य की उस राजनीतिक सरंचना को बचाना है, उसे भयमुक्त, सहज और शिष्ट बनाना है, जिसके चलते ही संघ और भाजपा और उसकी विचारधारा की जन-जन में स्वीकार्यता बनी और उसे देश की सहज एक धारा, देश का एक विकल्प स्वीकारा गया।    

सवाल एक नेता, एक प्रधानमंत्री, एक सरकार का नहीं है बल्कि हिंदुओं के प्राणवायु से बने सवा सौ करोड़ लोगों के उस राष्ट्र-राज्य का है, जिसकी लोकतांत्रिक तासीर में पहली जरूरत है भद्रता और शिष्टाचार की। ध्यान रहे लोकतंत्र शिष्ट समाज की जीवन शैली का नाम है और यह हम हिंदुओं की रामराज्य कल्पनाओं में गुंथा हुआ है। यदि ऐसा है तो भाजपा के हर नेता, हर सांसद, हर विधायक को बुद्धि, विवेक में सोचना होगा या नहीं कि नरेंद्र मोदी ने पांच साल में भारत को शिष्ट बनाया है या अशिष्ट? उनके अशिष्ट राज ने न केवल सबको अशिष्ट बना डाला है, बल्कि सवा सौ करोड़ लोगों के मीडिया नैरेटिव को इतना बुद्धिहीन बनाया है कि शर्म से हर समझदार का सिर झुका रहता है! हर अनुभव बरबादी, ठहराव, भटकाव, सनक, झूठ, अहंकार और धोखे की अनुभूति लिए हुए है? क्या यह सत्यता नहीं है?  यदि इस बात में सत्यता के बीज हैं और उससे लोकतंत्र के पूरे विनाश के खतरे हैं। तब संघ- भाजपा के हर नेता को क्या 2019 में यह संकल्प नहीं लेना चाहिए कि वे संन्यास ले लेंगें, घर बैठ जाएंगें लेकिन भारत को अंधकार में और नहीं धकेलेंगें! 

हां, संघ और भाजपा के नेताओं के लिए 2019 यह गहरी, गंभीर चुनौती लिए हुए है कि वे विचार की अपनी धारा को बचाएं। अपना मानना है कि मोहन भागवत, राजनाथ सिंह या नितिन गडकरी आदि उस मूर्खतापूर्ण नैरिटिव, बहस, विमर्श पर ठप्पा नहीं लगा सकते हैं, जो सियासी हितों के लिए टीवी चैनलों से चलवाया जा रहा है। भला कैसे कोई हिंदू इन बातों पर राजनीति को पकाए जाने के लिए वाह करेगा कि हनुमानजी दलित थे या अमित शाह ने देखो क्या कमाल किया जो दलित–साधु संतों के साथ उज्जैन कुंभ में स्नान किया या अर्ध कुंभ को पूर्ण कुंभ की तरह प्रचारित कर हिंदुओं से आह्वान हो कि चलो मंदिर बनाते हैं! जिस नेतृत्व ने हिंदुओं को लड़वाया, एससी-एसटी बनाम फारवर्ड में झगड़े कराए, मराठा, पटेलों आदि में आरक्षण की भूख पैदा की, दमन के साथ जातियों को आमने-सामने ला दिया तो उसे क्या मोहन भागवत, राजनाथ सिंह, गडकरी, डॉ. जोशी, शिवराज सिंह आदि हिंदू राष्ट्र वाली उपलब्धियां मानेंगें या धिक्कारेंगें?  

हो सकता है मैं गलत हूं मगर मेरा मानना है कि ये सब मन ही मन ग्लानि, क्षोभ में होंगे। बावजूद इसके यदि ये इसे चाणक्य की रणनीति मान अगले सौ दिन मोदी के जयकारे लगाते हैं तो प्रमाणित होगा कि हिंदुओं की यह धारा बिना विवेक और बुद्धिव के है। 

और बुद्धि, विवेक की परीक्षा गैर-भाजपाई नेताओं की भी है। इनकी संघ-भाजपा के नेताओं से लाख गुना ज्यादा। राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी, ममता बनर्जी से लेकर नीतीश कुमार, रामविलास पासवान सभी गैर-भाजपाईयों को जान लेना चाहिए कि पांच सालों में जो हुआ है उस पर यदि फिर ठप्पा लगा तो सवा सौ करोड़ लोग भारत बनाम पाकिस्तान में बंटे हुए होंगें और तब देश के तमाम गैर-भाजपाई नेताओं को पाकिस्तानियों का प्रतिनिधि मान, चोर मान देश के कैदखानों मे डाला जाएगा। जेल अपराधियों से नहीं, बल्कि राहुल गांधी, अखिलेश, तेजस्वी, नीतीश, ममता, मायावती आदि तमाम नेताओं, राजनीतिक एक्टिविस्टों से भरे होंगे और मोदी-शाह भक्त तालियां बजाते मिलेंगें।

आप कह सकते हैं कि मैं अतिवादी हो रहा हूं। मगर 2019 में नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जीत अनिवार्यतः 25-50 साल राज करने के पुतिनवादी निश्चय का लोकतंत्र पर हथौड़ा होगा। तब खम ठोंक आह्वान होगा कि विपक्ष मतलब पाकिस्तानी! जो प्रधानमंत्री अपनी सार्वजनिक सभा में डॉ. मनमोहन सिंह को पाकिस्तानियों के साथ सांठगांठ करने वाला बताए उन प्रधानमंत्री के लिए, उनकी जमात के लिए मायावती, अखिलेश, तेजस्वी, नीतीश, रामविलास, राहुल गांधी को तिहाड़ में डालना भला क्या मुश्किल है! सोचें मई 2019 में नरेंद्र मोदी विपक्षी फूट से यदि पौने तीन सौ सीटें जीत कर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं तो वे मायावती, अखिलेश, तेजस्वी, ममता की राजनीति को जिंदा रहने देंगें या उसे हमेशा के लिए खत्म करेंगें?  

इसलिए अखिलेश, मायावती, राहुल, ममता और अरविंद केजरीवाद आदि की बुद्धि, विवेक की 2019 में परीक्षा मामूली नहीं है। इनके संदर्भ में सवाल है कि ये अपने–आपको अक्लमंद, स्वविवेकी साबित करते हुए छोटे-छोटे स्वार्थों से ऊपर उठते हैं या नहीं? ये चार सीटें, दस सीटों या कौन बनेगा प्रधानमंत्री जैसे फालतू सवालों और स्वार्थों के फेर में पड़ते हैं या देश और देश की राजनीतिक संस्कृति को बचाने का बौद्धिक संकल्प लेते हैं? 

अब इस मोड़ पर, यहां रोल बनता है प्रबुद्ध, राजनीतिक चेतना वाले समझदारों का और राष्ट्रवादी मध्य वर्ग का। (जारी)

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