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माल्या-जेटली और पतन के लक्षण!

अपनी पुरानी थीसिस है कि जब भी किसी सरकार का गठन होता है तो साथ में उसके पतन का चेहरा भी शपथ लेता है और मोदी सरकार के पतन का चेहरा अरूण जेटली हैं। मेरा यह सोचना कितना सही है, इसे वक्त मई 2019 में बताएगा। पर जरा सोचें, अरूण जेटली यदि वित्त मंत्री नहीं होते तो क्या कोई प्रधानमंत्री नोटबंदी की मनमानी कर पाता? भारत में क्या जीएसटी का कूड़ा संस्करण बनता? पेट्रोल-डीजल के दामों में क्या ऐसे आग लगती?  बैंकों का क्या ऐसा भट्ठा बैठता? जाहिर है मोदी सरकार के साढ़े चार साल का पर्याय बदहाल आर्थिकी है तो उसका पर्याय चेहरा है अरूण जेटली! चेहरा मतलब थिंक ऑफ इकॉनोमिक मेस एंड थिंक ऑफ जेटली! सोचें, आजाद भारत के इतिहास में व्यापारियों-उद्यमियों-जनता की कमर तोड़ने, बैंकों, वित्तीय संस्थाओं को बदहाल बनाने की जैसी जो बरबादी अरूण जेटली की कमान मे हुई है क्या वैसी बरबादी भारत के किसी भी पूर्व वित्त मंत्री की कमान में हुई है? 

इस सबके बावजूद सत्ता में अरूण जेटली जस के तस। यह मई 2019 तक चलेगा। एक त्रासद हकीकत यह भी बननी है कि सरकार ज्यों-ज्यों पतन की और बढ़ेगी प्रधानमंत्री मोदी के लिए जेटली की उपयोगिता बढ़ेगी। जो जानते-समझते हैं उन्हें पता है कि जेटली की बीमारी की स्थिति में वित्त मंत्रालय में बतौर स्थानापन्न पीयूष गोयल ने अच्छा काम किया था। खुद मोदी-शाह उनके मुरीद हुए। पीयूष गोयल ने काम में समझदारी की छाप छोड़ी। जीएसटी कौंसिल में उन्होंने जो फैसले करवाए, जो सुधार कराए वे ही अपने आपमें इतने भारी व प्रभावी थे कि देश के कारोबारियों में वित्त मंत्रालय को लेकर पहली बार यह हवा बनी कि बिगड़े को सुधारने के लिए वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने सकारात्मक पहल की!

अपना न जेटली से मतलब है और न गोयल से। मगर भाजपा के सीए, कारोबारी सांसदों से लेकर साफ-सुथरे उद्योगपतियों ने सचमुच अपने को कहा कि पीयूष गोयल ने अच्छा काम किया। जीएसटी की व्यावहारिक दिक्कतों को समझ पीयूष गोयल ने फैसले करवाए। इसलिए भाजपा के आला सूत्रों से भी संकेत बने थे कि पीयूष गोयल बतौर वित्त मंत्री काम करते रहेंगे। मगर अपना मानना था कि अरूण जेटली का रोल तो सरकार के जाते-जाते ज्यादा बनेगा। नरेंद्र मोदी के लिए विपक्ष के एलायंस को तुड़वाने में अमर सिंह से ले कर ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, चंद्रबाबू सबके नाम पर उनसे डायलॉग रखने या बाद में पटा सकने की यूटिलिटी व आम चुनाव में अल्पमत की सूरत जैसी स्थितियां जेटली के लिए फायदेमंद हैं। खराब सियासी हालातों में विपक्ष में भी एंबेसडर के नाते जेटली अपनी उपयोगिता का पाठ पढ़ा देंगे। 

तभी मोदी को मजबूरन अरूण जेटली को वित्त मंत्रालय में बैठाना पड़ा। और अपनी थीसिस वाले इस संयोग पर फिर गौर करें कि वे ज्योंहि लौटे तभी से वित्त मंत्रालय के मामलों में हाहाकार बना हुआ है। फिर भले पेट्रोल-डीजल के दामों का हाहाकार, रूपए का लुढ़कना हो या बैंकों के कर्जों या महंगाई जैसी बातें हों। 

बहरहाल, अरूण जेटली आम चुनाव तक प्रधानमंत्री मोदी के लिए उपयोगी हैं। एक और मजेदार चर्चा उनके दरबारियों के बीच की सुनाएं। दरबारियों में भरोसा है कि उनके अरूणजी मई 2019 के बाद पीएम बन सकते हैं। दलील है कि यदि भाजपा को लोकसभा में 180 सीट के आसपास मिली तो नरेंद्र मोदी को तो कोई प्रधानमंत्री स्वीकारेगा नहीं और ऐसे में जेटली को मोदी–शाह आगे करेंगे। दोनों के लिए आगे सब ठीक ठाक की जरूरत में अरूण जेटली ही मोदी के लिए प्रधानमंत्री पद लायक अकेले भरोसेमंद व उपयुक्त होंगे। 

बहरहाल पतन के चेहरे के लूट पिट जाने के बाद तारणहार बनने की दरबारियों की इस थीसिस को पंख लगेंगे या नहीं यह भी मई 2019 में मालूम होगा। फिलहाल तो अपनी थीसिस फिर बलवान है कि नरेंद्र मोदी के खाते की विजय माल्या की बदनामी भी अंततः उस चेहरे पर जा टिक रही है, जिसकी जुबानी अब सफाई में कुछ भी कहा जाए वह लोगों के गले नहीं उतरेगी। जान लें कि आर्थिकी के मामले में अरूण जेटली के दरबारी कहते रहे हैं कि वित्त मंत्रालय में सब कुछ तो नरेंद्र मोदी करते हैं। उनका क्या लेना-देना? मगर कोई पूछे कि यदि यही हकीकत है तो जेटली ने क्यों पीयूष गोयल को वित्त मंत्रालय में नहीं रहने दिया? क्यों वे वित्त मंत्रालय में लौटने की छटपटाहट में रहे और इसी मंत्रालय में उन्हें चैन क्यों मिलता है? 

बहरहाल, वह छटपटाहट अब उनके लिए और मोदी सरकार दोनों के लिए विजय माल्या के भंडाफोड़ से फिर भारी बन गई है। वक्त और भाग्य का कमाल देखिए कि बैंक घोटालों, उसके चर्चित नंबर एक चेहरे विजय माल्या के विवाद में भी बतौर वित्त मंत्री अरूण जेटली इस नाते जवाबदेह हैं क्योंकि वे वित्त मंत्री हैं। 

उस नाते सोचें कि कितना भारी धमाका जो सरकारी बैंकों, सरकार को चूना लगा कर भागा सेठ विजय माल्या लंदन में अदालत के बाहर कहे कि उसने वित्त मंत्री से बात कर भारत छोड़ा। जब यह खबर आई तो हड़बड़ाते जेटली ने सफाई दी – हां, मैं मिला था पर वह संसद के गलियारे में महज चलते-चलाते मुलाकात थी। मतलब भगोड़े माल्या का कहा –तथ्यात्मक तौर पर झूठा। वह एक वाक्य की मुलाकात थी, जिसमें मैंने कहा –मेरे से बात करने का मतलब नहीं। 

क्या एक वाक्य की ही चलते-चलाते वह मुलाकात थी? ऐसा था भी तो अरूण जेटली ने इस बात को पहले कभी क्यों नहीं कहा? वे इतने ब्लॉग लिखते हैं। एक ब्लॉग इस मुलाकात का जिक्र करते हुए भी भगोड़े माल्या पर लिख देते। विजय माल्या ने जब वित्त मंत्री से मिल कर आने की बात कही तभी क्यों जेटली को याद आया- हां, विजय माल्या से मिला था। 

मगर इस पर भी तुरंत उस मुलाकात के चश्मदीद सांसद पीएल पूनिया का प्रतिवाद आया। राहुल गांधी के साथ प्रेस कांफ्रेस में उन्होंने कहा -जेटली झूठ बोल रहे हैं। जेटली और माल्या ने संसद भवन के सेंट्रल हॉल में अलग बात की थी। वह एक मार्च 2016 को हुई थी। दोनों ने एक तरफ अकेले में कोई 15-20 मिनट गुफ्तगू की। वहां लगे सीसीटीवी कैमरों में प्रूफ हैं। उन्हें देख लें। यदि मैं गलत साबित हुआ तो राजनीति छोड़ दूंगा!

भारत के वित्त मंत्री को झूठा करार देने की बात और उससे जुड़े आगे-पीछे के सवाल। और यह भी जान लिया जाए कि इस पर चर्चा अरसे से चली आ रही है। दिल्ली के जानकार हल्कों में दस तरह की चर्चाएं हैं। इसमें बड़ा तड़का भाजपा के सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मारा हुआ है। उन्होंने इस साल 12 जून को यह ट्विट किया था कि – माल्या भाग नहीं सकता था क्योंकि उसके खिलाफ हवाईअड्डों पर लुकआउट नोटिस जारी था। लेकिन वह दिल्ली में एक पावरफुल व्यक्ति से मिला और उसने लुकआउट नोटिस को बदलवा उसे रिपोर्ट करने वाला बनवा दिया! कौन है वह व्यक्ति जिसने नोटिस बदलवाया? 

वह ट्विट अब फिर चर्चा में है। इस अनुसार घटनाक्रम है कि अक्टूबर 2015 में सीबीआई ने भारत के हवाईअड्डों को लुकआउट नोटिस दे दिया था। इसमें कहा गया था कि विजय माल्या विदेश जाना चाहे तो उसे एयरपोर्ट पर हिरासत में लें। इसे बाद में बदल दिया गया और कहा गया माल्या दिखें तो उसकी सूचना दी जाए। यह नोटिस कब किसके कहने पर बदला, यह सवाल डॉ. स्वामी ने जून में उठाया था। तारीख का संयोग यह कि एक मार्च को जेटली–माल्या की मुलाकात हुई और दो मार्च को विजय माल्या लंदन भाग गया। नौ मार्च को तब के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को सूचना दी कि जिस दिन बैंक वाले कर्ज वसूली पंचाट गए उस दिन माल्या भागा।  

सो, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पीएल पूनिया की चश्मदीदी पेश कर सवाल है कि क्यों तो भगोड़े से जेटली ने बात की? कैसे लुकआउट-अरेस्ट नोटिस बदला इनफॉर्म नोटिस में? जेटली ने क्या इसे अपने स्तर पर किया या ऊपर से आदेश था? यह एकदम साफ और दो टूक मामला है। एक आर्थिक अपराधी वित्त मंत्री को कह कर जाता है कि वह लंदन जा रहा है तो क्यों नहीं उन्होंने तुंरत अपने अफसरों को सूचना दी? 

जो हो, अब विपक्ष के फोकस में अरूण जेटली हैं। सो, वे मोदी-शाह के लिए आगे क्या विपक्ष पटाएंगे? अपने लिए यह मामला दिलचस्प इसलिए है क्योंकि मैं इसे वित्त मंत्रालय की दशा-दिशा और मोदी सरकार में जेटली के रोल से चिन्हित करता हूं। मोदी सरकार का हस्र क्या और कैसे होगा, यह हर दिन किसी न किसी लक्षण से दिख रहा है और ये लक्षण दिसंबर बाद फफोलों की तरफ फूटेंगे।

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