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73 प्रतिशत धनसंपदा चंद अमीरो की!

क्‍या कभी आपने सोचा, कल्पना की कि भारत में एक प्रतिशत लोग सवा सौ करोड़ लोगों  के देश की 78 प्रतिशत धनसंपदा के मालिक है!  ये कौन है एक प्रतिशत लोग? एक प्रतिशत में उन 101 खरबपतियों ने 2017 में गजब किया। इन्होने अपनी कमाई, अपना मुनाफा, धनसपंदा को सुरसा की तरह बढ़ाया। और गरीब बेचारे रेंगने वाली दशा में भी नहीं। 2017 में भारत के 67 प्रतिशत गरीबों की धनसंपदा सिर्फ एक प्रतिशत की रेट से बढ़ी जबकि भारत के एक प्रतिशत अमीरों का खजाना 73 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ा। और जान ले कि 101 खरबपतियों की लिस्ट में टॉप पर गुजराती मुकेश अंबानी हंै। मुकेश अंबानी की धनसंपदा 2017 या 2018 में कितनी बढ़, इसका आंकड़ा नहीं है लेकिन जनवरी की इस खबर पर गौर करें कि रिलायंस कंपनी को तीन महीने की तिमाही में 10,251 करोड़ रू का नेट मुनाफा हुआ। सोचे तीन महीने में दस हजार करोड़ रू के मुनाफे की रफ्तार में अंबानी परिवार की धन-संपदा कैसा जंप मार रही होगी। 

ऐसे ही गौतम अदानी की धनसंपदा में बले–बले है। इनका ऐसा चौखा धंधा हुआ पड़ा है कि कहने ही क्या! हर दिन, हर महीने खबरे मिलती हंै कि अंबानी और अंदानी याकि गुजराती सेठों ने फंला-फंला धंधे में हाथ मारा। बिडला या नारायणमूर्ति या टाटा जैसे खानदानी खरबपतियों, उनकी गतिविधियों में विस्तार नहीं है लेकिन अंबानी, अदानी, सांघवी, मेहता, पटेल आदि उन गुजराती खरबपतियों की पौ-बारह है जिनकी उद्यमशीलता में मोदी राज लड़ाकू विमान तक के दरवाजे खोल दिए! किसी को डिफेंस के ठेके तो किसी को सरकारी शेयर, बंदरगाह टेकआवर तो किसी की बिजली सप्लाई की रेट में बढ़ोतरी जैसी बातों में चांदी ही चांदी है। हां, सभी खरबपती सुरसा की तरह नहीं बढ़ रहे हंै लेकिन गुजराती खरबपतियों के यहां जितनी हलचल है, उनकी जैसी मॉनोप़ॉली बन रही है उस पर जितना सोचेगे दिमाग भन्नाएगा। समझ नहीं आएगा कि पूरी आर्थिकी जहां तंगी, बदहाली की मारी है लेकिन ये बम-बम हुए पड़े हैं।   

मैं न अमीरी का विरोधी हूं और न निजी क्षेत्र का। मैं दक्षिणपंथी व पूंजीवाद समर्थक हूं। लेकिन स्वस्थ पूंजीवाद का। भारत में पिछले पांच सालों में जो हुआ है या उससे पहले भी जो होता रहा है उसके प्रतीक अंबानी, अदानी का घराना है। और वह इस हकीकत का प्रमाण है कि यदि प्रणब मुखर्जी या नरेंद्र मोदी मेहरबान तो अंबानी और अदानी बलवान!  तब भला देश की 100 फिसदी धनसंपदा में ये खरबपति क्यों न 80-90 फीसदी अपना कब्जा नहीं बना लंेगे।

ऐसा दुनिया के पूंजीवादी देशों, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी में नहीं होता है। तभी वैश्विक संस्था ऑक्सफोम ने भारत में अमीर और गरीब के बीच असमानता को ले कर हाल में जो रिपोर्ट जारी की है उसका अर्थ है कि यदि भारत के सवा सौ करोड़ लोग यदि वक्त रहते नहीं चेते तो भारत दुनिया का नंबर एक असमान देश बनेगा। लोगों का जीना अंग्रेजों के वक्त से लाख गुना अधिक शोषण लिए हुए होगा। भारत में सन् 2000 में 9 खरबपति थे। उनकी संख्या 2017 में 101 हुई। सन 2017 में इन खरबपतियों सहित एक प्रतिशत लोगों की धनसंपदा में एकदम कोई 21 लाख करोड़ रू का जंप हुआ। और जान ले यह संख्या भारत सरकार के 2017-18 के कुल बजट की राशि के बराबर बैठती है।

लाख टके का सवाल है कि सवा सौ करोड़ लोगों में अऱबपति और खरबपति की संख्या क्या शुद्ध रूप से कारोबार, उत्पादकता के चलते है या क्रोनी पूंजीवाद और भ्रष्टाचार के चलते बढ़ी है? दूसरा सवाल है कि यदि प्राईवेट क्षेत्र के मुकेश अंबानी या गौतम अदानी अपनी रिफाइनरी, जियो कनेक्शन, बंदरगाह, गैस, कोयले, आयात-निर्यात के धंधे से धनसंपदा बढ़ा रहे हंै तो इन्ही क्षेत्रों में बनी सरकारी कंपनियां भी क्या इतनी ही कमाई कर रही हैं? सरकारी कंपनियों, प्रतिष्ठानों और कारोबार का फिर सरकार की कमाई में क्यों नहीं उतना योगदान है जिससे सरकारी खजाना लबालब बने और जनता में वह फिर बांटा जा सके? मगर हकीकत उलटी कैसे? मोदी सरकार दिवालिया कैसे और अंबानी-अदानी के खजाने मुठियाते हुए  कैसे? 

इन सवालों से तब फिर बहस सरकारी बनाम प्राईवेट क्षेत्र के प्रदर्शन, काबलियत, कंपीटेंश को ले कर बनेगी। उस सबके बजाय फिलहाल पांच सालों में आर्थिकी के अनुभव और उसमें खरबपतियों और खास कर गुजराती खरबपतियों के मालामाल होने पर फोकस बनाया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नोटबंदी के बाद से कहना रहा है कि वे गरीबों के लिए है। उन्होने कालेधन पर मार की और अमीरों गंगा में पैसा बहाने को मजबूर किया। मतलब गरीब की कमाई बढ़वाई और अमीर को कसा। लेकिन यदि ऐसा होता तो ऑक्सफोम की रिपोर्ट से कैसे यह तथ्य निकलता कि अमीर और अमीर हुए, उनकी कमाई में सौ रू की बढ़ोतरी हुई वहीं देश के 68 करोड़ गरीब की कमाई सिर्फ एक रू बढ़ी!

इस हकीकत को 68 करोड़ गरीब आबादी के बजाय यदि 125 करोड़ लोगों पर कसे तो देश के 124 करोड़ लोग सचमुच में पिछले पांच वर्षों में अमीर के आगे सतत पिछड़ने, और ज्यादा गरीब बनते जाने की त्रासदी लिए हुए है। पता नहीं ऑक्सफॉम के आकंडों में गरीब को कथित रूप से दिए गए सिलेंडर, शौचालय का पैसा या पांच सौ, हजार रू की पैंशन, कन्यादान जैसे फायदे जोड़े गए है या नहीं। इन दिनों सरकारों का दांवा और फोकस इसी बात पर होता है कि उन्होने कितनी खैरात बांटी, कितना दान किया, कितनी योजनाएं चलवाई। कमाई बढ़ना और फ्री में पैसा मिलने के हिसाब अलग-अलग बनते है। अब यदि ऐसा है तब क्रोनी पूंजीवाद और भ्रष्टाचार के पैसे की लूट भी बढी हुई कमाई का आधार बनती है। अनिल अंबानी को रॉफेल का सौदा मिला या पॉवर कंपनियों को सरकार ने बिजली की प्रति यूनिट रेट बढ़ाने की अनुमति दी तो उसे सरकार द्वारा उद्योगपतियों को लुटाई खैरात क्या नहीं कहेगें?  इन्ही बातों से तब अंबानी, अदानी जैसे खरबपतियों की कमाई ने जंप पाया!

यह जंप ही खरबपतियों के यहां क्या धनघान्य के सुरसा की तरह बढ़ने की वजह नहीं है? सरकार गरीब को रेवडियां बांटती है और खरबपतियों को यदि देश के प्राकृतिक संसाधन लुटाती है, सवा सौ करोड लोगों पर एकाधिकार बनाने देती है तो उसे क्या कहेंगे? भारत की स्थिति में एक स्तर पर लगता है कि सरकार लुटाने के लिए ही है। गरीब को रेवड़ियां लुटाएगी और खरबपतियों को देश, देश के प्राकृतित संसाधन! यहां आबादी मतलब 124 करोड़ लोगों की संख्या भी वह प्राकृतिक संसाधन है जिसके बाजार पर एकाधिकार बनाना या बनवाना देश को लुटना-लुटवाना ही है। और यदि ऐसा है तो क्या आम चुनाव में इसको बहस का मुद्दा नहीं बनना चाहिए? 

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