Loading... Please wait...

कांग्रेस पूरी तरह भाग्य भरोसे!

ऐसे ही लगता है। राहुल गांधी के राफेल, चौकीदार वाले एक नैरेटिव को छोड़ें तो कांग्रेस भला कहां नरेंद्र मोदी के चौके-छक्कों, हल्लों का जवाब दे पा रही है? बुधवार को राज्यसभा में सरकार की तरफ से रविशंकर प्रसाद का यह आगाह करना ठीक था कि विरोधियों सुन लो अभी तो कई छक्के मारे जाने हैं! फारवर्ड के आरक्षण के छक्के पर विपक्ष जैसे निरूतर मिला, काउंटर हमला नहीं कर पाया वह प्रमाण है कि विपक्ष में कोई नेता या पार्टी नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं है। इस मामले में कांग्रेस इसलिए जवाबदेह अधिक है क्योंकि मोदी-शाह की रणनीति में पहला टारगेट कांग्रेस है। फारवर्ड आरक्षण भी बुनियादी तौर पर कांग्रेस के वोट खिसकाने के मकसद से है। 

हां, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़, महाराष्ट्र, दिल्ली, हिमाचल, हरियाणा, उत्तराखंड में भाजपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई में आरक्षण, फारवर्ड जातियों का आंदोलन क्योंकि माहौल और वोटों को प्रभावित करता है तो राहुल गांधी की जरूरत है कि वह छक्के के जवाब में मारक गेंदबाजी करें या कराएं। अभी आरक्षण हुआ, कल किसानों को प्रति एक़ड़ नकद पैसा देने की घोषणा हुई या मंदिर निर्माण के लिए चलो का आह्वान हुआ, फिर यूनिवर्सल इनकम में सबके खातों में हजार-दो हजार रुपए पहुंचा देने का मोदी ने छक्का मारा तो क्या हर मामले में कांग्रेस स्वागत करती रहेगी? मोदी सरकार छक्के मारे और विपक्ष तालियां बजा कर कहे कि हम स्वागत करते हैं तो फिर चुनाव में राहुल गांधी के चौकीदार चोर के हल्ले को कौन सुनेगा?

तभी लगता है कांग्रेस में सोनिया गांधी, अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, डॉ. मनमोहन सिंह, एके एंटनी, मल्लिकार्जुन खड़गे आदि सभी विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद सोचे हुए हैं कि जैसे अभी जीते वैसे लोकसभा चुनावों में भी जीतेंगें। या फिर मानना है कि राहुल गांधी जब नरेंद्र मोदी के खिलाफ इतनी आक्रामकता लिए हुए हैं तो और कुछ करने की जरूरत नहीं है। ऐसा शायद राहुल गांधी और उनकी करीबी नौजवान टीम भी मानती हो। यह आत्मघाती एप्रोच है। इसलिए क्योंकि मई 2019 का चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम पूरे विपक्ष की सामूहिकता लिए होगा। विपक्ष की सामूहिकता तभी संभव है जब विपक्ष की तरफ से सामूहिक हल्ला, नैरेटिव बने। जैसे 19 जनवरी को ममता बनर्जी ने कोलकत्ता में विपक्ष का जमावड़ा बुलाया है तो उसमें भी ममता के अकेले धुरी बनने से अखिल भारतीय मैसेज नहीं बनेगा। ममता बनर्जी हों या चंद्रबाबू नायडू या शरद पवार या मायावती या अखिलेश यादव इन सबके लिए कांग्रेस के अनुभवी नेता, मैनेजर एक्टिव नहीं होंगे तो चुनावी अखाड़े में विपक्षी पाला बिखरा रहना है। विपक्ष के लिए चुनाव बिना दिशा और बिना नैरेटिव के होना है। मतलब जैसे अभी हुआ है कि सरकार ने फारवर्ड आरक्षण का पैंतरा चला तो विपक्ष का जवाबी पैंतरा नहीं था, बल्कि विपक्ष भी सरकार से हां में हां मिलाता हुआ था।  

सोचें, लड़ाई का अखाड़ा सजा है। उसमें नरेंद्र मोदी ने अपने पाले से हल्ला किया कि हम ले आए फारवर्ड आरक्षण, किसानों के लिए पैसा, नौजवानों के लिए भत्ता तो विपक्षी पाले में नेता एक-दूसरे का मुंह देखेंगें या कोआर्डिनेशन होगा, सामूहिक जवाबी दांव चला जाएगा?  पर आज लाचारी है, बेसमझी है। चौकीदार के आगे राहुल गांधी अकेले गेंदबाजी करते हुए हैं तो मोदी की तरफ से घोषणाओं के, डराने के, व्यवस्थाओं के, धनबल, बाहुबल, प्रचारबल के तमाम तरह के छक्के हैं। ममता, चंद्रबाबू, अखिलेश, मायावती, तेजस्वी सब फील्ड में खड़े अपने कोनों, अपने इलाके में टस से मस नहीं हैं। विपक्ष में न कोआर्डिनेशन है और न सामूहिकता बनवाने की कोशिश है। एक वजह सर्वमान्य कैप्टेन का न होना है तो दूसरी वजह नरेंद्र मोदी के आगे गेंदबाजी करते हुए राहुल गांधी का अपनी तह भी कोआर्डिनेशन नहीं कराना है। वे और उनका कांग्रेस हाईकमान (यदि कोई है तो) मान रहे हैं कि नरेंद्र मोदी कितने ही छक्के मारें जनता ने उन्हें आउट मान लिया है। जनता अपने आप राहुल गांधी को विजयी घोषित करेगी।

मैं फिर लिख रहा हूं इस बात को कि इस एप्रोच में कांग्रेस धोखा खाएगी। भाजपा को लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक सीटें कांग्रेस के प्रभाव वाले इलाके या कांग्रेस के राज वाले प्रदेशों में ही मिलेगी। मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र आदि राज्यों में कांग्रेस बराबरी का मुकाबला भी नहीं बना पाएगी। 

इससे अधिक गंभीर मसला विपक्ष की सामूहिकता में कांग्रेस का रोल नहीं बनना है। भला उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव एलायंस बनाएं और यदि सोनिया गांधी पहल कर मायावती से मिलने न जाएं तो बात क्या बन सकती है? पर सोनिया गांधी ने कमान राहुल गांधी को दे दी है तो वे क्यों मिलें? मतलब विपक्षी एकता, एलायंस की राजनीति में प्रोएक्टिव होने, पार्टी को चुनाव के लिए तैयार करने के फैसले कौन करे? 

गौरतलब है कि मोदी-शाह ने तमाम तरह की कमेटियां बना कर चुनाव की तैयारियों में भाजपा को पूरी तरह झोंक दिया है। राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी से ले कर हर छोटे-बड़े नेता को दौड़ा दिया है। तमाम प्रदेशों में नेताओं की ड्यूटी लगा दी है। ठीक विपरीत कांग्रेस में हलचल नहीं है। कांग्रेस मुख्यालय के पदाधिकारी पूरी तरह राहुल गांधी के कहने के इंतजार में हैं। यह सोचना गलत साबित हो रहा है कि लोकसभा चुनाव की बड़ी चुनौती के चलते सोनिया गांधी और उनकी पुरानी टीम एके एंटनी, अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह घोषित तौर पर ममता, अखिलेश, शरद पवार, मायावती आदि से एलायंस बनवाने में जुटेंगें। तय मानें कि क्षत्रपों को पटाना, मनाना, समझाना, फुसलाना अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत, कमलनाथ जैसे पुराने नेताओं के बूते ही संभव है। अगले सौ दिनों में मोदी-शाह जितने छक्के मारेंगें, विपक्षी एलायंस को तोड़ने की जितनी कोशिश करेंगें, पैसे और मीडिया में विपक्ष को कमजोर बनाने के जितने बंदोबस्त होंगे उन सबकी काट के लिए सोनिया गांधी और उनकी पुरानी टीम को ही अपने आपको झोंकना होगा। राहुल गांधी अपने को चौकीदार के आगे खड़ा रखें मगर विपक्ष के अखाड़े का प्रबंधन तो सोनिया गांधी की देखरेख में एंटनी, डॉ. मनमोहन सिंह, अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह आदि के बूते ही संभव है। आज की तारीख में कांग्रेस के चार नेताओं मतलब सोनिया गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह, अहमद पटेल और दिग्विजय सिंह की सर्वाधिक उपयोगिता है। 

उपयोगिता का अर्थ है कि मोदी-शाह के उम्मीदवारों के सामने विपक्ष का एक उम्मीदवार बनवाना। इसमें डॉ. मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी का दूसरी पार्टियों के नेताओं पर नैतिक बल काम कर सकता है तो सौदा पटाना अहमद पटेल और दिग्विजय सिंह के बस में है। एलायंस, तालमेल कराना ही प्राथमिकता वाला नंबर एक काम है। इसी से नैरेटिव बनेगा। ये ही ममता बनर्जी को इस बात के लिए रजामंद करा सकते हैं कि बंगाल में तृणमूल, कांग्रेस और लेफ्ट तीनों तालमेल से चुनाव लड़ें या मायावती व अखिलेश के साथ कैसे भी हो पूरा विपक्ष यूपी में मिलजुल कर चुनाव लड़े। ऐसे ही महाराष्ट्र में शरद पवार-अहमद पटेल मिल कर हालात बनवाएं, जिससे उद्धव ठाकरे तक से लोकसभा चुनाव के संदर्भ में न्यूनतम सहमति बने। पूछ सकते हैं कि क्या यह संभव है? बिल्कुल है। इसलिए क्योंकि मोदी-शाह ने हर पार्टी, हर नेता को अपने अहंकार का जैसा जो अनुभव कराया है उससे जमीन बनी हुई है। फिर राजनीति संभावनाओं का खेल है। जब मोदी-शाह सब कुछ दांव पर लगा दे रहे हैं। भारत का खजाना खाली कर देने, जनता का पैसा जनता को लुटाने से ले कर हिंदू समाज को आरक्षण से तो नागरिकों को हिंदू-मुस्लिम से बिखेरने की सीमा तक जा रहे हैं तब भला विपक्ष या कांग्रेस की वरिष्ठ टीम को क्यों नहीं वह सब करना चाहिए जो अकल्पनीय हो। मोदी सरकार छक्के मार रही है, अखिलेश यादव के यहां भी जब सीबीआई पहुंचा दे रहे हैं तो उद्वव ठाकरे से तालमेल बनाने या अपने हित, अपनी सीटें छोड़ यूपी, बंगाल में एलायंस बना कर क्यों नहीं छक्के मारे?

पर क्या इस एप्रोच में राहुल गांधी और कांग्रेस काम करते लग रहे हैं?

496 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech