Loading... Please wait...

मोदी-शाह का तुरूप है कन्हैया!

वामपंथियों, सेकुलरों को सोचना, समझना चाहिए कि तीन साल बाद कन्हैया कुमार को देशद्रोही करार देने वाली चार्जशीट अदालत में दायर हुई तो भला क्यों? क्यों दिल्ली पुलिस को तीन साल लगे? आम चुनाव से ऐन पहले क्यों आरोपपत्र बना? कांग्रेस और विपक्ष की प्रतिक्रिया वहीं हुई जो भाजपा चाहती है। कन्हैया पर लगे आरोप को पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने अनर्गल बताया है। तो क्या पी चिदंबरम उनकी वकालत के लिए अदालत में उतरेंगें? क्या विपक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह के आरोप को चुनावी मुद्दा बना सकता है? क्या राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल कन्हैया और उनके जेएनयू साथियों के बचाव में एकजुटता दिखाते हुए वैसे ही अदालत में समर्थन देने पहुंचेंगे जैसे एक वक्त जेएनयू गए थे? ऐसा संभव नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। इसलिए कि दिल्ली पुलिस की चार्जशीट और 19 जनवरी को अदालत में सुनवाई का जितना हल्ला बनेगा उतने ही हिंदू वोट मोदी-शाह की रणनीति में पकने हैं! 

हां, कन्हैया एंड पार्टी की अदालत में हाजिरी के वक्त सहानुभूति में, उनको नैतिक समर्थन में यदि राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी आदि जा खड़े हों तो विपक्ष को लेने के देने पड़ेंगे। मान लें कम्युनिस्ट पार्टी, वामपंथी, सेकुलर जमात इसी बात को मुद्दा बना कर मोदी सरकार को दमनकारी, तानाशाह सरकार प्रचारित करने का अभियान चलाने की ठाने और लोकसभा चुनाव लड़े तो नोट करके रखें कि बिहार की जिस बेगूसराय सीट पर सीपीआई ने कांग्रेस-राजद से बात करके कन्हैया को उम्मीदवार तय किया है वहां के भूमिहार भी भैय्या कन्हैया को छोड़ कर न केवल भाजपा की तरफ मुड़ेंगे, बल्कि पूरे बिहार में भाजपा और नीतीश कुमार के एलायंस में जान लौट आएगी। 

मतलब कन्हैया एंड पार्टी हिंदुओं में यह हवा बनवाने वाली ताकत रखती है कि अरे, यदि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देंगे तो क्या आजादी, आजादी का नारा लगाने वाले कन्हैया और उमर जैसे लोगों की दिल्ली में सरकार बनवाएंगे? 

तभी सोचा जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने कितनी समझ और कैसे बारीक चुनावी पैंतरे में कन्हैया के खिलाफ चार्जशीट दायर करवाने का समय चुना! जेएनयू की कन्हैया एंड पार्टी के अलावा असम में नागरिकता विधेयक का विरोध करने वाले विद्वान हीरेन गोहेन, अखिल गोगोई और पत्रकार मंजीत मंहत के खिलाफ भी पुलिस ने देशद्रोह का आरोप लगाया है। इस घटनाक्रम के साथ बुलंदशहर के गोहत्या के आरोपी मुसलमानों को राष्ट्रीय सुरक्षा एक्ट याकि एनएसए में एक साल के लिए जेल में डालने व एनआईए के द्वारा इस्लामिक स्टेट के आंतकी हमलों की साजिश के भंडाफोड़ की घटनाओं को जोड़ें तो मतलब वहीं बनता है जो चुनाव से पहले सत्ता पक्ष के नैरेटिव बनाने के जुगाड़ में हुआ करता है। एक वक्त कांग्रेस और पी चिदंबरम ने हिंदू आंतकवाद के चेहरों पर नैरेटिव बनवाया था और आज मोदी-शाह की हर संभव वह कोशिश है, जिससे हिंदू बनाम मुस्लिम का धुव्रीकरण बने।

सवाल है आज सेकुलर, वामपंथी या भाजपा विरोधी क्षत्रप जैसे मायावती, अखिलेश यादव क्या यह हल्ला बना सकते हैं कि मोदी-शाह को हराना है क्योंकि ये हिंदू राजनीति करते हैं। क्या विपक्ष के बूते धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता, उदारवाद बनाम अनुदारवाद, हिंदू बनाम सेकुलर के राग पर चुनावी माहौल बना सकना संभव है? कतई नहीं। विपक्ष की राजनीति, विपक्ष के मंच के आईकॉन कन्हैया नहीं हो सकते हैं। ममता बनर्जी यदि 19 जनवरी के विपक्षी जमावड़े में कन्हैया का मंच पर भाषण करा दें तो मोदी- शाह की, भाजपा की पौ बारह होगी। 

उस नाते वक्त का कमाल देखें कि एक वक्त सांप्रदायिकता के खिलाफ आंदोलन करते हुए, हल्ला बनाते हुए हिंदू मतदाताओं को समझाया जाता था कि वे दंगे कराने वालों को वोट देंगे या दंगाईयों को कुचलने वालों को वोट देंगे? कांग्रेस ने डा. मनमोहन सिंह के दस वर्ष के राज में हल्ला बनाया कि हिंदू आतंकवाद से हमें बचना है, उससे लड़ना है। 2014 के चुनाव में सोनिया गांधी व कांग्रेस ऐन वक्त तक इस विश्वास में थे कि गुजरात के दंगों, सांप्रदायिकता व हिंदू राजनीति की पहचान लिए नरेंद्र मोदी कभी भारत में सर्वमान्य हो नहीं सकते। बतौर गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे या पी चिदंबरम सभी ने हिंदू आंतकवाद को मुद्दा बनाया। ये सोचते थे कि यदि प्रज्ञा ठाकुर, हिंदू आंतकियों की धरपकड़ होगी तो भाजपा कार्नर होगी, रक्षात्मक रहेगी और सेकुलर वोटों का भभका कांग्रेस को मजे से चुनाव जीता देगा!

सो, तब और अब का फर्क है कि अगले आम चुनाव के लिए मोदी-शाह ने घटनाओं की लिस्ट के साथ जो कैलेंडर बनाया है उसमें एक-एक दिन वह सब होगा, जिससे हिंदुओं के दिमाग में भभका बने कि हमें कन्हैया नहीं, मायावती नहीं, केजरीवाल नहीं, राहुल गांधी नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी चाहिए। वह नरेंद्र मोदी, जिसने देखों जेएनयू में आजादी, आजादी के नारे लगाने वालों को नहीं बख्शा। गोहत्या आरोपियों को राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा मानते हुए एनएसए में जेल में डाला। जिनकी कमान में एनआईए एजेंसी ने इस्लामिक स्टेट की साजिश पकड़ी!

वामपंथी, कांग्रेस व चिदंबरम भले कन्हैया एंड पार्टी पर लगे आरोपों को अनर्गल बताएं, उनके कहने से न सुनवाई होनी है और न मोदी सरकार के खिलाफ जन माहौल बनना है। अपना मानना है इससे उलटे भाजपा को फायदा होगा। जेएनयू की घटना नौ फरवरी 2016 की है। उसको तीन साल बाद चुनाव से ऐन पहले देशद्रोह की सुर्खी में बदला गया है तो समझा जाना चाहिए कि हिंदू मनोविज्ञान को वोट के लिए पकाने का प्रबंधन कैसा सुविचारित है। आगे ऐसी दस बातें होंगी। हर बात से जनता में यह फर्क, यह विचार उभारा जाना है कि कन्हैया जैसे लोगों को, उनके हमदर्दों को वोट देंगे या उन नरेंद्र मोदी को दोगे जो देशद्रोहियों को जेल में डाल दे रहे है। उस नाते कन्हैया का मामला भी विपक्ष के लिए अप्रत्याशित है। अगले सौ दिन की चुनावी राजनीति में मोदी-शाह का पहले कैलेंडर है उस अनुसार फैसले व घटनाएं हैं तो विपक्ष का मामला कुल मिला कर प्रतिक्रिया भर देने का है या इस स्यापे का है कि ये कैसा जुल्म ढा रहे हैं और हम करें तो क्या करें। या यह तल्खी कि आरोप अनर्गल है। 

तय मानें अगला चुनाव अनर्गल बातों के नैरेटिव पर ही लड़ा जाएगा। कन्हैया जैसी तुरूपों पर मोदी-शाह एक के बाद एक दांव चलने वाले हैं। इन्हें विपक्ष तभी बेअसर कर सकता है जब वह बोले ही नहीं और नजरअंदाज करते हुए अपनी बात, अपने एजेंडे पर फोकस रखे। वह क्यों अपने को देशभक्त बनाम देशद्रोही, हिंदू बनाम मुस्लिम की बहस में उलझाए।

581 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech