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राष्ट्रपति शासन तो भ्रष्टाचार मुद्दा!

लोकसभा चुनाव में बंगाल मोदी-शाह की नंबर एक प्रयोगशाला है। 2014 के यूपी की तरह! यहा हिंदू-मुस्लिम धुव्रीकरण होगा तो उधर पी चिदंबरम, रॉबर्ट वाड्रा, अखिलेश, मायावती, अहमद पटेल, हुड्डा आदि के साथ ममता बनर्जी भी सीबीआई-ईडी हिरासत या पूछताछ के शोर में इस प्रचार का हिस्सा होगा कि देखो मैं चोरों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा हूं इसलिए चोर मुझे हटाना चाहते हैं। नए सीबीआई प्रमुख के काम संभालने से ठीक पहले रविवार के दिन कोलकाता पुलिस कमिश्नर से पूछताछ की कोशिश का सीधा अर्थ है कि ममता बनर्जी को भ्रष्टाचार आरोपों के लपेटे में लेना है। इसे ममता बनर्जी ने तुरंत समझा तभी उन्होंने सीबीआई टीम को हिरासत में लिवा कर धरने पर बैठने का फैसला किया। मामला सुप्रीम कोर्ट में है। कोर्ट कोई भी व्यवस्था करे। मगर यदि राज्यपाल ने कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की रिपोर्ट दी तो मोदी सरकार बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने में देरी नहीं करेगी। मोदी-शाह का मानना होगा कि बंगाल में प्रशासन यदि ममता का न रहे तो लोकसभा में भाजपा को जोरदार सफलता मिलेगी। मेरा अपना मानना है कि ममता बनर्जी, कांग्रेस और लेफ्ट तीनों का बंगाल में अलग-अलग चलना भाजपा के लिए दो अंकों में जीत की गारंटी है। दस से ज्यादा सीटें जीत सकती है तो 2009 के चुनाव की तरह अगले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का ताना-बाना वैसा भी ढह सकता है जैसा 2009 में लेफ्ट का ढहा था। 

पर अभी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगा। फिलहाल इतना तय मानें कि बंगाल में हिंदू बनाम मुस्लिम और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई करवाने में भाजपा के लिए अनुकूलताएं हैं। जैसे कांग्रेस नेताओं और अखिलेश-मायावती के खिलाफ ईडी-सीबीआई से सरकार ने तानाबाना बनवाया है, मिशेल-सक्सेना-तलवार को हिरासत में लिया है और ईडी से गिरफ्तारी भर की देरी है वैसे ही ममता बनर्जी से पूछताछ या उन्हें हिरासत मे लेने का तानाबाना बन रहा है। बंगाल में इस तानेबाने को ममता बनर्जी के भेदिए याकि मुकुल राय से बनवाया जाना बहुत असरदार होगा। आखिर मुकुल राय ने ही तो ममता को जितवाने के लिए चिट फंड या पैसे के बंदोबस्त में सब कुछ किया था। वह हकीकत अब तमाम तरह की जांच में कारगर बनी हुई होगी। ममता को घेरने वाली इस कथा में वह सब है, जिससे नैरेटिव बने कि तृणमूल और ममता बनर्जी की पूरी राजनीति चिट फंड में घपलों और भ्रष्टाचार की नींव से निर्मित है। 

मतलब ममता बनर्जी यदि बांग्ला अस्मिता, अपनी लड़ाकू इमेज और मोदी-शाह की तानाशाही के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगी तो जवाब में मोदी-शाह के पास भ्रष्टाचार व हिंदू-मुस्लिम धुव्रीकरण का पैंतरा बना हुआ होगा। इस सबमें ममता बनर्जी अचानक तब लाचार होंगी, जब प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग जाए। तब ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का लोकसभा चुनाव से पहले सब कुछ बिखर जाएगा। प्रदेश की 42 सीटों पर मुकुल राय की जमीनी समझ के बूते मोदी-शाह बेताज बादशाह की तरह बंगाल में चुनाव लड़ेंगे। यानी नामुमकिन नहीं है जो एक झटके में उत्तर प्रदेश के नुकसान की भरपाई बंगाल से हो जाए!   

हां, यह संभव है। इसी पर मोदी-शाह-विजयवर्गीय-मुकुल राय काम कर रहे हैं। तो क्या माना जाए कि बंगाल में ऐन चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन मुमकिन है? हां, संभव है। संसद सत्र के खत्म होने के बाद मोदी सरकार बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति के हवाले राष्ट्रपति शासन लगा सकती है। सवाल है क्या यह विपक्ष को एकजुट करना नहीं होगा? क्या तब पूरे देश में नैरेटिव मोदी सरकार द्वारा संस्थाओं के दुरूपयोग, तानाशाही रवैए का नहीं बनेगा? 

बन सकता है और भाजपा को शेष भारत में चुनावी नुकसान भी हो सकता है। यदि 15 फरवरी से लेकर पांच मार्च तक विपक्ष के नामी चेहरों को ईडी, सीबीआई की हिरासत में लेकर, उन्हें पूछताछ के कटघरे में लाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का हल्ला मोदी-शाह ने बनवाया तो बहुत गजब होगा। तब माहौल और राजनीति इतनी गरमाएगी कि सुनामी की दिशा का अनुमान अपना भी नहीं बन रहा है। अपना मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बंगाल की सभाओं में जो बयान दिए और जन सभाओं के लिए जो शुरुआती इलाके चुने गए हैं उसका निष्कर्ष हिंदू बनाम मुस्लिम और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर आंधी बनाने की दो टूक रणनीति है। इसमें मील का पत्थर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन का फैसला होगा। बिगड़ी कानून-व्यवस्था का हल्ला लॉजिकल घटनाक्रम लिए हुए हो, इसकी भी बारीक तैयारी है।

विपक्ष याकि ममता बनर्जी, कांग्रेस और लेफ्ट इस सबके लिए तैयार नहीं हैं। उलटे सभी गलतफहमियों में जी रहे हैं! सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण एप्रोच लेफ्ट की है। लेफ्ट की मानें तो सब तृणमूल और भाजपा का मिलाजुला खेल है! दरअसल कांग्रेस और लेफ्ट दोनों सोच रहे हैं कि बंगाल में वे अभी भी बचे हुए हैं इसलिए तृणमूल बनाम भाजपा की लड़ाई से अपने को अलग रखते हुए बीच का अपना स्पेस बचाए रखना है। हकीकत में बंगाल पूरी तरह धुव्रीकरण में है। ममता बनर्जी बनाम मोदी-शाह की सीधी लड़ाई है। मगर एक तो ममता बनर्जी का अहंकार और अकेले ही लड़ लेने का उनका मुगालता है तो दूसरी और ममता, राहुल और येचुरी तीनों ही हालातों की नजाकत समझे बिना बिखरे हुए हैं।  

आश्चर्य जो ममता बनर्जी अभी भी सोच नहीं पा रही हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले यदि वे चिट फंड और भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई के सीधे घेरे में आईं व राष्ट्रपति शासन लगा तो वे अकेले क्या खाक चुनाव लड़ सकेंगी? पिछले चौबीस घंटे के घटनाक्रम के बाद उन्हें पूरी चिंता के साथ राहुल गांधी और सीताराम येचुरी से संवाद बनाना था लेकिन जैसे उन्होंने 2009 में पहले अकेले लेफ्ट से लड़ाई लड़ी उसी आत्मविश्वास में वे अभी भी हैं जबकि अब सत्ता में रह लेने से दस तरह के दाग लग चुके हैं। हकीकत में मोदी-शाह ने मुकुल राय के जरिए ममता बनर्जी को जिस बारीकी से घेरा है वह पुलिस कमिश्नर से पहले की सीबीआई की पूछताछ-गिरफ्तारियों से भी जाहिर है। बाकायदा रोडमैप में मोदी-शाह टीम काम कर रही है।

यह रोडमैप अखिल भारतीय पैमाने का है। वह कांग्रेस के लिए है तो केरल में लेफ्ट व यूपी में अखिलेश- मायावती के लिए भी है। रेत खदान से ले कर चिटफंड, अगस्ता सौदे, दीपक तलवार-सक्सेना यदि जनवरी-फरवरी में सुर्खियों में आए हैं तो क्या यह रॉबर्ट वाड्रा, ममता, अखिलेश, एनसीपी याकि कथित भ्रष्टों के खिलाफ लड़ाई का चुनावी नैरेटिव बनाने के लिए नहीं है? सचमुच राहुल गांधी भले सोचें कि वे फ्रंट फुट से खेल लेंगे लेकिन मोदी-शाह बैक फुट से ईडी-सीबीआई, हिंदू-मुस्लिम के जरिए जो कर देंगे उसका विपक्ष को, राहुल को फ्रंट फुट से भान तक नहीं हो पाएगा। वैसे ही जैसे ममता बनर्जी को नहीं हो पा रहा है।    

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