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अंबानी, अदानी की संपदा का हो राष्ट्रीयकरण

ताकि क्रोनी पूंजीवाद पर हथौड़ा चले। वे खरबपति काबू में आएं, जिन्होंने पिछले सालों में सवा सौ करोड़ लोगों की बदहाली, कड़की दशा के बावजूद अपनी धनसंपदा को एक साल में 21 लाख करोड़ रुपए बढ़ाया! आंकड़ा है कि सन् 2017 में इन खरबपतियों सहित एक प्रतिशत लोगों की धनसंपदा में जो 21 लाख करोड़ रुपए का जंप हुआ था वह भारत सरकार के 2017-18 के कुल बजट की राशि के बराबर है। इनमें अंबानी, अदानी वे चेहरे हैं, जिन्होंने मोदी राज में बेइंतहा मलाई खाई है। इनकी धनसंपदा के राष्ट्रीयकरण का वादा कर राहुल गांधी, और कांग्रेस मजे से देश के हर गरीब को न्यूनतम आय मतलब चाहे तो बीस हजार रुपए नियमित हर महीने देना भी सुनिश्चित बना सकती है। हां, जो आंकड़े हैं उस अनुसार यदि साल में 14-15 लाख करोड़ रुपए का जुगाड़ (जैसे अंबानी-अदानी की कंपनियों का राष्ट्रीयकरण, उन्हें सरकार से चलवा कर या उनकी नीलामी-विनिवेश या 101 सुपर अमीरों पर सुपर अमीर टैक्स लगा कर) से कांग्रेस मजे से पांच साल में सभी गरीबों को बीस हजार रुपए प्रतिमाह की आय, पेंशन की व्यवस्था बनवा सकती है।

तभी अपनी दलील है कि कांग्रेस को अंबानी, अदानी को क्यों नहीं टारगेट बनाना चाहिए? बनाना इसलिए जरूरी है ताकि सवा सौ करोड़ लोगों का ध्यान सचमुच में आर्थिक मसलों पर बने। भारत का मतदाता मंदिर, हिंदू-मुस्लिम और फर्जी विकास की भूलभुलैया के बजाय बदहाली, बेरोजगारी और अमीर-गरीब की बढ़ती खाई पर सोचने को मजबूर हो। कोई माने या न माने अपना मानना है कि नरेंद्र मोदी के राज में सर्वाधिक मलाई खाने वालों के प्रतिनिधि चेहरों में मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, गौतम अदानी, टोरेंट ग्रुप के सुधीर उत्तमलाल मेहता, समीर मेहता और सन फार्मा के दिलीप सांघवी, केडिला फार्मा के पंकज पटेल याकि गुजराती खरबपतियों पर देश के उद्योगपतियों की पूरी नजर रही है। इन गुजरातियों की धनसंपदा में भारी जंप के साथ देश के प्राकृतिक संसाधनों, केजी गैस बेसिन से लेकर टेलीकॉम तक में स्वच्छंद धंधेबाजी ने सबका ध्यान मनमानी, मोनोपॉली पर केंद्रित बनाया है। ये ही जिम्मेवार हैं भारत में अमीर-गरीब में पांच सालों में बनी भारी खाई के लिए। 

हां, सोचें ऑक्सफोम संस्था के इस ताजा आंकड़े पर कि 2017 में भारत के 67 प्रतिशत गरीबों की धनसंपदा जहां सिर्फ एक प्रतिशत की रेट से बढ़ी वहीं भारत के एक प्रतिशत अमीरों का खजाना 73 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ा। अमीरों की इस लिस्ट में आला नंबर एक चेहरा मुकेश अंबानी का है, जिसे पूरी दुनिया में भारत के क्रोनी पूंजीवाद का प्रतिनिधि चेहरा बूझा जाता है। 

मामला अकेले मुकेश अंबानी का नहीं है, बल्कि अनिल अंबानी, गौतम अदानी जैसे कोई दर्जन भर उन खरबपतियों का है, जिनकी धनसंपदा में उछाल से सवा सौ करोड़ लोगों के देश में अमीर बनाम गरीब की खाई इतनी गहरी और चौड़ी हो गई है कि सवा सौ करोड़ लोग जब कभी खाई में लुढ़केंगे तो पैंदे का पता ही नहीं पड़ेगा। पांच सालों में कुछ खरबपतियों को छोड़ पूरा देश गरीब, कंगाल, बदहाल हुआ है। किसानों ने आत्महत्या की, पैदल मार्च किए तो नौजवान करोड़ों की तादाद में बेरोजगार हैं। इन खरबपतियों ने बदहाली के बीच आम जन, गरीब मन के प्रति संवेदनशील होने की बजाय अपनी धनसंपदा का ऐसा नंगा प्रदर्शन किया, शादियों-उत्सवों में पैसा फूंक अपना ऐसा वैभव दिखाया जो कुल मिला कर गरीब जनता के जले पर नमक छिड़कने समान था। 

जो लोग कहते हैं कि भारत की आर्थिकी दुनिया की छठवीं हो गई है वे खरबपतियों के मुटियाने (सोचें, एक साल में 73 प्रतिशत की रफ्तार से खरबपतियों का खजाना बढ़ना और साल में 21 लाख करोड़ रुपए का जंप) से है न कि गरीब की जेब में पैसा पहुंचने से है। नरेंद्र मोदी और उनके प्रचारक लाख ढिंढोरा पीटें कि भारत की आर्थिकी दुनिया की छठवीं हो गई है तो वह सवा सौ करोड़ आम जन की संपन्नता से नहीं है, बल्कि एक प्रतिशत अमीरों- खरबपतियों के मोटा होते जाने से है।  

सोचें, कैसी भयावह और राजनीतिक तौर पर विचारणीय बात कि अंबानी-अदानियों का मोटापा आर्थिकी का कथित मोटापा है न कि गरीब की जेब में एक रुपए की सालाना बढ़ोतरी से। 

तब क्यों न कांग्रेस और विपक्ष 101 खरबपतियों के पांच साल में मोटाने को मुद्दा बनाए? भारत के आम जन की जेब में एक रुपया बढ़ा है तो अंबानी की जेब में लगातार 50 या 73 रुपए हर साल बढ़ते जाएं तो हम आखिर देश में कितनी असमानता बढ़ा देंगें? 2017 में मुकेश अंबानी की धनसंपदा में कितनी बढ़ोतरी हुई इसका आंकड़ा नहीं है। लेकिन 2014 की हुरून इंडिया रिच लिस्ट अनुसार उस वर्ष इनका खजाना 1.65 लाख करोड़ रुपए बढ़ा। 2016 में सभी खरबपतियों का खजाना 4.89 लाख करोड़ रुपए बढ़ा वहीं 2017 में 20.7 लाख करोड़ रुपए बढ़ा। एक तरफ लोगों को महीने में 12-14 हजार रुपए का न्यूनतम वेतन नहीं और बेरोजगारी, कंगाली में आत्महत्या की नौबत तो दूसरी और 20 लाख करोड़ रुपए की एक प्रतिशत, 101 खरबपतियों की कमाई क्या मतलब रखती है? यह असमानता, असंगतता, क्रोनी पूंजीवाद है, मतलब जिन पर सरकार याकि नरेंद्र मोदी का हाथ वहीं भारत में खरबपति बनते जाने के लिए लगातार अधिकृत। 

हां, यह न स्वस्थ पूंजीवाद है और न ईमानदारी या मेहनत है। यह जमीन, आसमान, पाताल याकि स्पेक्ट्रम, गैस बेसिन, बंदरगाह, रिटेल धंधे से भारत के प्राकृतिक संसाधनों, उपज का वह दोहन है, जो सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की अबाध गति में मिलियन से बिलियन, बिलियन से ट्रिलियन बनते जाना है।

तभी भारत वह देश है जहां अमीर बनाम गरीब की खाई अंग्रेजों के वक्त से आज ज्यादा भयावह रूप से चौड़ी है। दुनिया के पैमाने पर भारत की खाई पिछले साल सर्वाधिक रफ्तार से और गहरी-चौड़ी हुई। 125 करोड़ लोगों का एक प्रतिशत कितना होता है? सवा करोड़ लोग। इनमें फिर 101 खरबपतियों की संख्या 0.00 के आंकड़े में कहा फिट होती है? सो सोचें कि चंद लोगों का 124 करोड़ लोगों के याकि देश के खजाने पर आधिपत्य है। तभी देश में यह संकल्प बने, यह राजनीतिक बहस हो, चुनाव का यह वचनपत्र बने कि आम आदमी के हित में इन प्राइवेट कुबेर खजानों से हर साल 17 लाख करोड़ रुपए ले कर हर गरीब को हर महीने बीस हजार रुपए का वेतन व पेंशन दी जाएगी!   

कल और विचार करेंगे!

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