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मायावती समझें, बनें बड़ी नेता!

मायावती वह गलती कर रही हैं, जो उनके सियासी जीवन को डूबोने वाली होगी। इसलिए कि उनके चलते भाजपा उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 25 सीटें जीत सकती है। भाजपा की इतनी सीटें जीतने से खुद बसपा भी 22-24 सीटों पर अटकेगी। ऐसा हुआ तो पूरे विपक्ष में, कांग्रेस के समर्थन से मायावती का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनना तो दूर सभी के लिए वे भाजपा को जितवाने वाली मानी जाएंगी। हां, यूपी की जमीनी हकीकत है कि यदि सपा-बसपा-अजित सिंह-कांग्रेस एकजुट एलायंस से या परोक्ष तौर पर योजनाबद्ध बिसात बिछा कर लोकसभा चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा दस सीट का आंकड़ा नहीं पार कर सकती। मगर अब वह ये आंकड़ा पार करेगी और विपक्ष की फूट में 20 से 25 सीटें जीतेगी। इतनी सीटें मामूली नहीं हैं। भाजपा का उत्तर प्रदेश में 25 सीटें जीतना मोदी-शाह के कुल लोकसभा आंकड़े में बड़ा सहारा होगा। अपने को लग रहा है कि विपक्ष के तीन नेता लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह को जंप कराएंगे। नंबर एक पर मायावती, नंबर दो पर ममता बनर्जी और नंबर तीन पर अरविंद केजरीवाल ऐसा चुनावी मुकाबला बनवाएंगे, जिससे विपक्ष की फूट के चलते दिल्ली से कोलकात्ता तक भाजपा को सम्मानजनक सीटें प्राप्त हों।

इनमें उत्तर प्रदेश का मसला गंभीर है। बसपा ने मायावती का जन्मदिन मनाते हुए उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने का जो हल्ला बनाया है वह इसलिए फालतू है क्योंकि यूपी में भाजपा के सर्वाधिक सीटें जीतने के अवसर मायावती बना रही हैं। नोट करके रखें कि यूपी में 25 सीटों की जीत पूरे देश में भाजपा की सबसे बड़ी प्रादेशिक जीत होगी। भाजपा को किसी और दूसरे प्रदेश से 25 सीट नहीं मिलनी है। चुनाव के बाद यह इतनी बड़ी बात होगी कि अभी कल्पना नहीं कर सकते। तब बसपा-सपा एलांयस भले 40-45 सीटें जीते मगर दिल्ली में इसकी धमक वैसी कतई नहीं बनेगी जैसी यूपी में भाजपा के पूरे सफाए पर बनती। 

सो, मायावती की गलती है जो उन्होंने अपने आपको नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा करके यूपी में भाजपा के पूरे सफाए की ठानने का रोल नहीं सोचा। कल्पना करें यदि उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से भाजपा पांच-आठ सीटें जीते तो ऐसा संभव बनाने वाले एलायंस की नेता के नाते मायावती की क्या गजब अखिल भारतीय इमेज होगी? तब मायावती को लेकर गैर-भाजपाईयों में अपने आप क्या स्वीकार्यता नहीं बनेगी? वे निश्चित ही प्रधानमंत्री पद की सहज-स्वाभाविक दावेदार बनेंगी। लेकिन मायावती ने नरेंद्र मोदी-अमित शाह को हराने के सब कुछ झोंक देने, सबको साथ लेने का मैसेज नहीं बनाया। उन्होंने पुरानी सोच में छोटी-छोटी बातें सोचीं। जैसे यह कि कांग्रेस का वोट ट्रांसफर नहीं होता है या यह कि कांग्रेस को अलग से लड़ने देना चाहिए ताकि उसका ब्राह्मण वोट भाजपा को न जाए।

निश्चित ही इन बातों में भी कुछ दम है। गोरखपुर, फूलपुर, कैराना के उपचुनाव में कांग्रेस ने उम्मीदवार खडे किए थे। उसके उम्मीदवारों को जो कुछ हजार वोट मिले वे कांग्रेस के परंपरागत पुराने वोट (शायद ब्राह्मण-फारवर्ड) थे। यदि कांग्रेस का उम्मीदवार खड़ा नहीं होता तो वे वोट भाजपा को जा सकते थे।

इस थीसिस के बावजूद मायावती का यह सोचना गलत है कि कांग्रेस सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़े तो विपक्षी एकता की फूट का फायदा भाजपा को नहीं होगा। अपना मानना है बिल्कुल होगा। पहली बात तो यह कि प्रदेश में विपक्षी माहौल बिखरा हुआ दिखेगा। योगी राज के खिलाफ ब्राह्मणों, ओबीसी जातियों का गुस्सा बंटेगा। यदि कुछ सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार ताकतवर दिखे तो मुसलमान वोट भी बंटेगा। जातियों का समीकरण लड़खड़ाएगा। फिर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जमीनी मशीनरी अनिवार्यतः यह प्रचार करवाएगी कि दलित-ओबीसी का नहीं, बल्कि यह एलायंस जाटव और यादवों का है। ब्राह्मण-बनियों-फारवर्ड में प्रचार होगा कि तब क्या मायावती को प्रधानमंत्री बनाएंगे? 

मतलब 2014 में मायावती और अखिलेश ने अपने-अपने वोट बैंक पर ग्रैंड जीत की जो उम्मीद पाली थी वहीं आधार बसपा-सपा के एलायंस का अभी भी है। फर्क इतना भर है कि दोनों का वोट बैंक एलांयस में आज जुड़ा हुआ है। यह गणित के नाते प्रभावी है लेकिन चुनाव में एक और एक दो की गणित की जगह माहौल एक और एक ग्यारह की केमिस्ट्री से बना करता है। तभी सपा-बसपा एलायंस 40-45 सीटें भले जीत ले लेकिन उसका 80 में से 70 सीटें जीतना संभव नहीं है। मतलब जैसे 2014 में भाजपा जीती थी। सत्ता विरोधी भारी गुस्से और उस पर सर्वजन की आंधी तभी संभव है जब माहौल विपक्षी एकता के तराने लिए हुए हो। 

इसकी कमी ने ही अमित शाह में मुगालता बनवाया हुआ है कि यूपी में 50 प्रतिशत से अधिक वोट ले कर हम 73 की जगह 74 सीट जीतेंगें। उनके पास वे मुद्दे हैं, वह चेहरा है, हिंदू बनाम मुस्लिम का वह भाव, राम मंदिर की वह आस्था है, जिससे ऐन वक्त सुनामी पैदा कर देंगें। हां, अमित शाह के विश्वास के आधार मामूली नहीं हैं। लेकिन मायावती नरेंद्र मोदी-अमित शाह के विश्वास को, रणनीति को हल्के में ले रही है। 

तभी नोट करके रखें कि बसपा-सपा एलायंस वह रिकार्ड नहीं बना पाएगा जो 2014 में भाजपा ने 80 में से 73 सीट जीत कर बनाया था। 

क्या मायावती को, अखिलेश को या राहुल गांधी को, जयंत चौधरी को लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए कि हम यूपी में मोदी-शाह को ऐसा हराएं कि 80 में से 75 सीटें विरोधियों को मिलें। यह नामुमकिन नहीं है। दिक्कत यह है कि मायावती को कौन समझाए? हिसाब से अखिलेश यादव को ही मायावती को ग्रैंड एलायंस के लिए रजामंद बनाना था। मायावती के यहां और किसी की एक्सेस नहीं है। वे अपनी तह पहल करके मिलती नहीं है और किसी की अपने यहां एक्सेस नहीं होने देतीं। उस नाते अखिलेश यादव पर दारोमदार है कि वे उत्तर प्रदेश में मायावती की सोच के साथ जयंत चौधरी, राहुल गांधी से केमिस्ट्री बैठा कर चुनावी बिसात बिछाएं। पर मायावती ने क्योंकि कांग्रेस से तालमेल नहीं करने की बात कही हुई है तो वे आगे बढ़ नहीं सकते। 

इसका यह अर्थ नहीं कि जयंत चौधरी और कांग्रेस से सपा-बसपा के एलायंस का परोक्ष नाता नहीं होगा। अजित सिंह-जयंत चौधरी का लोकदल एलायंस का हिस्सा बन सकता है। पश्चिम यूपी की जाट बहुल तीन सीटें बागपत, मेरठ, मुजफ्फरपुर या मथुरा लोकदल के लिए छूट रही हैं। लोकदल एक और कैराना सीट भी चाहता है। दिक्कत चारों सीटों के कतार में जुड़े होने से है। उधर कांग्रेस के लिए अमेठी और रायबरेली की सीट छोड़ी गई है। अपना मानना है कि वाराणसी की सीट पर भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक सर्वमान्य उम्मीदवार की सहमति बनेगी। एलायंस एक मऊ की सीट को राजभर की पार्टी के लिए छोड़ सकता है तो अपना दल पार्टी ने यदि बात आगे बढ़ाई तो एक लोकसभा सीट उसके लिए भी छूटेगी। 

पेंच मायावती-अखिलेश यादव का सभी 80 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने की कांग्रेस की बात को हल्के में लेने से है। यदि ऐसा होता है तो कांग्रेस छह-सात सीटों पर जोरदार टक्कर के साथ सपा-बसपा को वहां नहीं जीतने देगी तो कोई 25-30 सीटों पर भाजपा विरोधी वोटों में भी कंफ्यूजन बनेगा।  

कुछ कांग्रेसियों में भी कंफ्यूजन के चलते गलतफहमी है कि मुसलमान, ब्राह्मण, फारवर्ड में कांग्रेस का ग्राफ बढ़ा है। मतलब यूपी में कांग्रेस अपने पांवों पर खड़ी हो सकती है। यदि मायावती-अखिलेश के आगे सरेंडर किया तो कांग्रेस अपने पांवों पर खड़े होने का मौका चूकेगी। इसी थीसिस में गुलाम नबी आजाद, राज बब्बर आदि सभी 80 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने का प्रस्ताव बना बैठे हैं। यह मोदी-शाह को जितवाने वाली एप्रोच है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी और गुलाम नबी आजाद को अपने आपसे पूछना चाहिए कि फिलहाल मकसद कांग्रेस को खड़ा करने का है या मोदी-शाह को हराने का है? यदि हराने का है तो अमेठी, रायबरेली के अलावा कहीं लड़ना ही नहीं चाहिए और लड़ना भी है तो बाराबंकी, पडरौना, दरौरा, झांसी की चार-पांच सीटें बनती हैं, जहां बसपा-सपा से दोस्ताना लड़ाई के साथ पीएल पूनिया, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद उम्मीदवार हो सकते है। संभव है आखिर में मायावती, अखिलेश, जयंत चौधरी और राहुल गांधी में ऐसी रजामंदी हो भी जाए। अंततः यूपी में विपक्षी बिसात पूरे तालमेल से बिछी हुई बने। अभी कांग्रेस को इसलिए भी अलग हल्ला करने दिया जा रहा है क्योंकि ऐसा न हो तो यूपी के ही हवाले नरेंद्र मोदी का प्रचार बनेगा कि देखो सब इकठ्ठे हो गए। आज यह बात इस कंफ्यूजन के चलते नहीं है क्योंकि कांग्रेस अलग लड़ती दिख रही है तो सपा-बसपा का एलायंस अलग। अजित सिंह अलग।

पर यह सोची-विचारी रणनीति में नहीं है। जान लें कि यूपी के विपक्ष में मायावती से ही फैसला है कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं! उसी के चलते फिलहाल भाजपा का ग्राफ 20-25 सीटों का है तो सपा-बसपा का 40-45 सीटों का। 

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