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जॉर्ज फर्नांडीज

जॉर्ज फर्नांडीज करीब दस साल मृत्यु शैया पर लेटे रहे। यह कैसी ईश्वरीय इच्छा जो अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडीज और जसवंत सिंह तीनों का साझा सत्ता भोग अंत में मृत्यु शैया वाली त्रासद अवस्था में हुआ। इन तीनों नेताओं के कई अर्थ हैं। इनमें जॉर्ज फर्नांडीज सर्वाधिक विद्रोही, लड़ाकू व बिरले व्यक्तित्व वाले थे। जॉर्ज के वाजपेयी के साझेदार बनने की अवधि को छोड़ें तो वे लोहिया के लोगों में नंबर एक जूझारू योद्धा थे। उस नाते जॉर्ज फर्नांडीज की मृत्यु भारत में वैचारिक लड़ाकूपन पर पटाक्षेप है। अब भारत राष्ट्र राज्य का रंगमंच पूरी तरह सिर्फ और सिर्फ सत्ताखोरों, लठैतों, गुंड़ों, भक्तों, मूर्खों से ठसा भरा है। वह विचारमना राष्ट्र निर्माताओं व वैचारिक योद्धाओं के बिना है। तभी आज की पीढ़ी के लिए जॉर्ज फर्नांडीज का मतलब नहीं है। नाम सुन कर नौजवान यहीं पूछेगा कौन जॉर्ज फर्नांडीज!

तो जाना जाए कि आजाद भारत में 19 महीने की इमरजेंसी रूपी तानाशाही को बम विस्फोटों से थर्रा देने की हिम्मत का नाम थे जॉर्ज फर्नांडीज। उन्होंने गैर-कांग्रेसवाद के लिए दस तरह के प्रयोग किए। गरीब, सर्वहारा, मजदूरों के लिए अखिल भारतीय रेल हड़ताल कराने की संगठन क्षमता दिखाई तो अपने स्वदेशी समाजवाद की फितरत में अमेरिकी कंपनी कोका कोला, आईबीएम कंपनियों को भारत छोड़ने को मजबूर किया। ये बातें आज फोकटी, बकवास, विकास विरोधी लगेंगी लेकिन लोहिया के लोगों ने पहले पंडित नेहरू और फिर इंदिरा गांधी के खिलाफ जैसा नैरेटिव बनाया, आंदोलन किए व जातियों-समाज को जैसे हिलाया उसने देश के लोकतंत्र को न केवल जीवंत बनाया, बल्कि उसमें दस तरह के फूल भी खिले। जिसका एक फूल कमल आज अखिल भारतीय पैमाने पर खिला हुआ है। उस नाते अपनी थीसिस है कि वाजपेयी हों या नरेंद्र मोदी, इन्हें पहले डॉ. राममनोहर लोहिया और जॉर्ज फर्नांडीज को भारत रत्न या पद्म विभूषण से नवाजना था न कि धीरूभाई अंबानी को या वाजपेयी या नानाजी देशमुख को!

मगर समाजवादियों की फितरत है, जो ये लोग न पहले सरकारी सम्मानों के मोहताज थे और न आज उनके लिए कोई मांग करता है। गरीब-सर्वहारा के लिए जान को दांव पर लगाने वाले इन यौद्धाओं का मैं कभी प्रशंसक नहीं रहा। मैंने इनकी आलोचना ही की। इन पर खूब गपशप लिखी। मेरे गले कभी वामपंथियों, समाजवादियों, डॉ. लोहिया, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज के विचार व तेवर नहीं उतरे। मैं हमेशा वामपंथ का विरोधी रहा हूं। बावजूद इसके 1975 की इमरजेंसी से लेकर जनता पार्टी की सरकार तक मधु लिमये पर और वाजपेयी की सरकार में अंत तक जॉर्ज फर्नांडीज की तासीर, उनके रोल पर लगातार विचार करता रहा। इसमें मन को छूने वाला पहलू था इनका वैचारिक जिद्द में फक्कड़ी, खानाबदोशी, विद्रोही तेवरों में जीना। उस नाते चालीस साल की अपनी पत्रकारिता में राजनीतिबाजों की करीबी जानकारी से अपना यह निष्कर्ष दो टूक है कि आजाद भारत के 70 साल के लोकतंत्र में सर्वाधिक ईमानदारी (लंगोट का मामला छोड़े) से जीवन जीने वाली नेता जमात यदि थी तो वे कम्युनिस्ट और समाजवादी थे और कम्युनिस्टों में इसके अवशेष अभी भी हैं। 

हां, इन समाजवादियों में याकि लोहिया के लोगों में मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार आदि को कतई नहीं रखा जाए। खुद जॉर्ज फर्नांडीज को आखिरी सालों में मंडल आंदोलन के इन कथित समाजवादियों के दुखद अनुभव हुए थे।

पर दूसरा पहलू है कि जॉर्ज फर्नांडीज ने भाजपा के साथ, वाजपेयी के साथ सत्ता का जो साझा किया वह भी तो वैचारिक पथभ्रष्टता थी। भला लोहिया के लोगों की कमान संभाले जॉर्ज जैसे को वाजपेयी सरकार में उस वक्त भी सत्ता में क्यों रहना था जब गुजरात में दंगों की हकीकत में जॉर्ज के लिए जवाब देना भी मुश्किल हो रहा था? इस बारे में अपनी थीसिस है कि जॉर्ज फर्नांडीज ने मंडलवादी समाजवादियों के अनुभव में अंततः यह माना कि अब इस देश में गैर-कांग्रेसवाद वाजपेयी की कमान में ही ठोस शक्ल ले सकता है। शायद जीवन भर संघर्ष करके बुढाए जॉर्ज यह अंतर नहीं कर पाए कि कांग्रेसी सरकार और वाजपेयी की सरकार के मूल चरित्र में फर्क नहीं है जो वे उससे झूठे गैर-कांग्रेसवाद का रास्ता बनता देख रहे हैं। 

दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी और जॉर्ज फर्नांडीज बीसवीं सदी में भारत की उस वैचारिक यात्रा का वैसा ही आखिरी मुकाम लिए हुए थे, जिसके लिए हम सभी हिंदू शापित हैं। मेरी जनसत्ता के वक्त से 1984 से जॉर्ज साहब से वाकफियत थी। पटना के हमारे सुरेंद्र किशोर उनके इमरजेंसी में बड़ौदा डायनाइट योजना के साथी थे। सुरेंद्र के जरिए जॉर्ज के बारे में इतना जाना, सुना कि समाजवादी चेहरों का पोर-पोर समझा हुआ था। पर मेरे लिए जॉर्ज फर्नांडीज के जीवन का वह दिन अविस्मरणीय है जब संसद भवन के सेंट्रल हॉल में वीर सावरकर की तस्वीर महात्मा गांधी के ठीक सामने लगाई गई। जॉर्ज फर्नांडीज, भैरोसिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवाणी आदि के चेहरों को मैंने तब बहुत गौर से देखा। कांग्रेस और बाकी विपक्ष ने वीर सावरकर की तस्वीर लगाए जाने का घनघोर विरोध किया था। मैं उस गहमागहमी के बीच में सेंट्रल हॉल में जॉर्ज फर्नांडीज के चेहरे पर फोकस रखते हुए उनसे पूछ ही बैठा कि आपको कैसा लग रहा है? उन्होंने जवाब नहीं दिया पर मेरा भावार्थ समझ मुस्कराए। 

हां, भारत राष्ट्र-राज्य में वह दिन ऐतिहासिक था जब गांधी के सामने सावरकर की फोटो लगी और इसके वैचारिक अर्थ को समझे हुए लोहिया के अनुयायी जॉर्ज का गवाह बने हुए होना अपने लिए तब बहुत सोचने वाली व अकल्पनीय बात थी।  

जरा सोचें कि बीसवीं सदी की वैश्विक अवधारणाओं, चिंताओं के बीच भारत के राजनीतिक चिंतन में मौलिकता के साथ वैकल्पिक मॉडल के लिए किन महामनाओं ने सर्वाधिक विचार किया? जवाब मे राष्ट्र-राज्य के खाके में तीन नाम उभरते हैं। महात्मा गांधी, वीर सावरकर और तीसरा डॉ. राममनोहर लोहिया। ये वे तीन नाम हैं, जिन्होने क्रमशः धर्म, अमन-जंग, राष्ट्र-राज्य अवधारणा और समाजवाद के परिप्रेक्ष्य में देशज मौलिक चिंतन किया। यह भी जान लें कि इन तीनों का रिफरेंस हिंदू ही था। इन तीनों की मौलिकता के अनुयायी बने, राजनीतिक धाराएं निकलीं और तीनों का अंत परिणाम अपनी थीसिस में एक सा यह है कि तीनों फेल। इसलिए क्योंकि मसला हिंदू का है। इन तीनों महामनाओं ने हिंदू के डीएनए को बूझे, समझे बिना वैश्विक अवधारणाओं में अपने फार्मूले गढ़े बिना यह बूझे कि विचार की प्रयोगशाला में जिस पर प्रयोग होना है वह बकरी है, कछुआ है या शेर?

मैं भारी भटक गया हूं। फिलहाल इतना जानें कि डॉ लोहिया के मौलिक विचारों के सांचे में अनुयायियों की जो दो पीढ़ी तैयार हुई थी उसके सर्वाधिक ऊर्जावान, हिम्मती, लड़ाकू प्रयोगकर्ता जॉर्ज फर्नांडीज थे। लोहिया के अनुयायियों में यदि मधु लिमये प्रवचनकर्ता थे तो जॉर्ज फर्नांडीज आंदोलनकर्ता। दुर्भाग्य कि अब जैसे समाजवाद की स्मृतिशेष है वैसे इनकी भी है। सवा सौ करोड़ लोगों के इस देश में ऐसा कुछ होना चाहिए, जहां ईमानदारी से जाना जाता रहे कि इस राष्ट्र-राज्य के विचार में जो फितरती हुए उनसे क्या सीखा- समझा जा सकता है। डॉ. लोहिया, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज की धारा सरस्वती के रूप में भले लुप्त हो गई हो पर उसकी याद तो बनवाए रखनी चाहिए।

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