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अंबानी, अदानी से वसूलो और बांटो!

कांग्रेस, उसके कोषाध्यक्ष अहमद पटेल आदि अंबानी, अदानी से 200-300 करोड़ रुपए के चंदे की भीख मांग कर लोकसभा चुनाव लड़ेंगे या इन खरबपतियों से चुनाव के बाद 5-10 लाख करोड़ रुपए वसूली का बजटीय प्रस्ताव बना कर भारत के हर गरीब को हर महीने आय देने की घोषणा को हकीकत में बदलेंगे? फिर सवाल नरेंद्र मोदी और उनके पीयूष गोयल से है। क्या ये रिजर्व बैंक को खाली करके किसानों-गरीबों को रेवड़ियां देंगे या एक झटके में 101 खरबपतियों के खजाने पर 75 प्रतिशत का सुपर अमीर सरचार्ज लगा कर पैसा वसूलने की घोषणा करते हुए पैसा बांटने का प्रस्ताव बनाएंगें? अपना मानना है कि पीयूष गोयल के बजट में सरकार की योजनाओं में कटौती, उनमें हेरफेर व रिजर्व बैंक को खाली करा कर पैसे का जुगाड़ होगा और फिर किसानों को, गरीबों को कुछ पैसा बांटने का झुनझुना बनेगा। पीयूष गोयल यह सोच ही नहीं सकते हैं कि पिछले साल भारत के अमीरों ने, 101 खरबपतियों, अंबानियों-अदानियों ने अपने खजाने में 21 लाख करोड़ रुपए का जो इजाफा किया है उसमें से वसूली की सुपरअमीर टैक्स जैसी घोषणा करें। 

तभी मौका कांग्रेस को ही है कि वह अंबानी और अदानी को चुनावी मुद्दा बनाए और वह कमाल कर दिखाए जो दुनिया में कहीं नहीं हुआ है। पर क्या हर गरीब को हर महीने 10 से 20 हजार रुपए प्रतिमाह न्यूनतम वेतन देना संभव है? हां, बिल्कुल संभव है। मायावती और अखिलेश यादव जैसे विपक्षी नेताओं की नासमझी है जो वे इसे संभव नहीं मान रहे हैं। हिसाब से मायावती को, समाजवादी अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव को तुरंत स्टैंड लेना चाहिए कि जब अंबानी-अदानी जैसे 101 खरबपति एक साल में 21 लाख करोड़ रुपए की धनसंपदा बना रहे हैं तो इसमें से सरकार 10 से 15 लाख करोड़ रुपए क्यों न वसूल करके गरीबों को हर महीने न्यूनतम वेतन बांटे। संभव है मायावती, अखिलेश, तेजस्वी सभी लोकसभा चुनाव लड़ने की जरूरत में अंबानियों-अदानियों से कुछ सौ करोड़ रुपए चंदा लेने की जुगाड़ में हों। ये चंदे का लालच छोड़ें और सीधे कहें कि पिछले पांच सालों में मोदी सरकार ने खरबपतियों की आय को जितना बढ़वाया है उसका एक–एक पैसा खरबपतियों से वसूल कर गरीबों को स्थायी इनकम और पेंशन देने का हम वचन देते हैं। तब अपने आप हवा बदल जाएगी और अंबानियों-अदानियों से बिना चंदा लिए ही चुनाव जीत जाएंगें। 

इसलिए पहली बात यह समझें कि कोई कहे कि राहुल गांधी या विपक्ष गरीब को हर महीने आय देने के लिए पैसा कहां से लाएंगे तो दो टूक जवाब होना चाहिए कि अंबानियों-अदानियों के खजाने से लेंगें। 101 सुपर अमीर हर साल लाखों-लाख करोड़ रुपए कमा रहे हैं तो उसी से गरीब को पैसा बंटेगा।  

आप सोच सकते हैं, कह सकते हैं कि मैं कितनी अतार्किक, प्राइवेट क्षेत्र को, उद्यमशीलता को खत्म या हतोत्साहित करने की बात कह रहा हूं। समाजवादी हो गया हूं। कतई नहीं। मैं उसी खजाने से वसूलने की बात कह रहा हूं जो जनता के शोषण, सरकार की मेहरबानियों, क्रोनी पूंजीवाद की बदौलत है। राहुल गांधी ने रायपुर में गरीब के लिए न्यूनतम वेतन की घोषणा करत हुए ठीक कहा कि पिछले पांच सालों में नरेंद्र मोदी ने 15 सुपर अमीरों को अधिकाधिक इनकम गारंटी दी है जबकि कांग्रेस इस देश के हर गरीब नागरिक को न्यूनतम इनकम गारंटी देगी। जाहिर है राहुल गांधी को भी पता है कि अंबानियों-अदानियों का खजाना कैसे बढ़ा है। अपनी दलील है कि तब इन्हीं से तो आगे सरकार के पैसा वसूलने व गरीब की आय का रास्ता बनेगा। 

सो, मायावती और बाकी विपक्ष को भी समझना चाहिए कि गरीब को जरूरत की आय की गारंटी की बात महज जुमला नहीं है, बल्कि सचमुच में संभव हो सकने वाला वह काम है, जिससे सवा सौ करोड़ लोगों में अमीर-गरीब की खाई को पाटने का काम भी सध सकता है। 

इसका तरीका सिर्फ और सिर्फ अंबानियों-अदानियों से सुपरअमीर टैक्स के जरिए या जरूरी हो तो इनके उन प्रतिष्ठानों के राष्ट्रीयकरण का है, जिन्हें क्रोनी पूंजीवाद की देन माना जाता है!  कह सकते हैं कि क्या इससे दुनिया में यह मैसेज नहीं जाएगा कि विश्व जहां उदारीकरण को अपनाए बैठा है वहीं भारत राष्ट्रीयकरण के गुजरे रास्ते पर लौट रहा है? नहीं, कतई नहीं। इसलिए कि दुनिया के अर्थशास्त्री, निवेशक भी जानते हैं कि भारत के अंबानियों-अदानियों का मतलब सरकार की मेहरबानी वाला क्रोनी पूंजीवाद है। उलटे पूरी दुनिया में और भारत में भी खानदानी रईसों, ईमानदारी-मेहनत से बने उद्योगपतियों, कारोबारियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में यह सोचते हुए अच्छा माहौल बनेगा कि भारत अब सरकार और प्रणब मुखर्जी, नरेंद्र मोदी जैसों के बनवाए क्रोनी पूंजीपतियों से मुक्ति पा रहा है। देश में स्वस्थ पूंजीवाद बनेगा। ईमानदार कंपीटिशन बनेगा। बेईमान-भ्रष्ट अमीरों के लिए नसीहत बनेगी। 

अपनी दलील है कि अंबानियों- अदानियों के खजाने का सरकार को चौकीदार बनना राष्ट्र-राज्य और सवा सौ करोड़ लोगों की आबादी के संदर्भों में देशद्रोह है जबकि इनके खजाने का 75-90 प्रतिशत जनता के हित में अधिग्रहित करना देशभक्ति और गरीब की सेवा है। कुछ अर्थशास्त्री सुझा रहे हैं कि गरीब को दिए जाने वाली सब्सिडी, जनकल्याण याकि मनरेगा जैसी योजनाओं, स्वास्थ्य-शिक्षा आदि मदों में कटौती करके उससे पैसा जुटा गरीब की आय योजना बने। यह एप्रोच एक हद तक याकि 30-40 प्रतिशत तक उचित हो सकती है लेकिन सरकार को अपने को कंगला बना कर या शिक्षा-स्वास्थ्य-सार्वजनिक कर्तव्य निर्वहन की जिम्मेवारी को छोड़ना घातक होगा। ऐसा होना नहीं चाहिए। सरकार खुद घाटा खाए या नोट छाप घाटे का वित्तीय घाटा बनाए या रिजर्व बैंक के रिजर्व को तोड़े, जनता की खुद की बैंकों में जमा पूंजी को खाए, सेहत-स्वास्थ्य खर्च घटाए, उससे बेहतर क्यों नहीं 101 सुपर अमीर-खरबपतियों पर गरीब को न्यूनतम वेतन की मद का सुपर अमीर टैक्स देने को मजबूर किया जाए?  

हां, टैक्स का ढांचा बदल, सुपर अमीर के लिए नई स्लैब, इनके खजाने को हर साल खाली कराने के नए प्रावधान बनाने हों तो बनाए जाने चाहिए। भला यह क्या बात हुई कि पांच करोड़, पचास-सौ करोड़ के टर्नओवर वाले सेठ पर भी वहीं इनकम टैक्स, वैल्थ टैक्स और कॉरपोरेट टैक्स याकि 25-30 प्रतिशत की रेट से वसूली हो तो खरबपतियों, अंबानियों-अदानियों के सौ लोगों के क्लब वाले भी उसी रेट पर टैक्स दें! अपना तर्क है कि जिनका टर्नओवर 500 करोड़ रुपए से ऊपर हो, जो हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की धनसंपदा लिए हुए हों उन पर क्यों 75 प्रतिशत इनकम टैक्स, वैल्थ टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स नहीं लगाना चाहिए? सवा सौ करोड़ आबादी में हमें 500 करोड़ रुपए के टर्नओवर की क्षमता वाले उद्यमियों की संख्या कुल आबादी में दस प्रतिशत बनवाने की कोशिश करनी चाहिए न कि 101 खरबपतियों की संख्या को एक हजार बनवाने की एप्रोच में सरकार की रीति-नीति होनी चाहिए। पूंजीवाद स्वस्थ हो न कि क्रोनी।

दरअसल मायावती हों या ममता बनर्जी या अखिलेश यादव इन सबको अंबानियों-अदानियों के लाखों-लाख करोड़ रुपए के कुबेर खजाने का अंदाज नहीं है। ये पचास, सौ, दो सौ करोड़ रुपए के आंकड़ों में उलझे रहते हैं जबकि ऑक्सफोम रिपोर्ट का ताजा आंकड़ा बताता है कि एक प्रतिशत अमीरों ने 2017 में अपना खजाना 21 लाख करोड़ रुपए और बढ़ा लिया! किसे कहते हैं धनसंपदा में 21 लाख करोड़ रुपए की श्रीवृदिध? अमीरी में इस भयावह उछाल पर जब वैश्विक संस्था ऑक्सफोम ने सवा सौ करोड़ लोगों के बीच भयावह असमानता और उसके भविष्य में भयावह परिणामों की चेतावनी दी है तो मायावती, अखिलेश, ममता बनर्जी आदि को क्यों नहीं विपक्ष का यह सामूहिक वचन बनवाना चाहिए कि हम यदि सत्ता में आए तो अंबानियों-अदानियों के कुबेर खजानों को खाली कराएंगें। उससे करोड़ों-करोड़ गरीब लोगों की आय कराएंगें और उद्योगपतियों, उद्यमशीलता, कारोबार में छोटों को बड़ा बनाने, 101 नहीं, बल्कि लाखों लाख कारोबारियों को करोडपति-अरबपति बनने का मौका देंगें? जान लें कि भारत का असली विकास तब है जब करोड़पतियों की संख्या दस करोड़ बने न कि कुल सौ या पांच सौ सेठ आगे खरबपति बनने का विकास करें और इनमें से अंबानी-अदानी जैसे अव्वल देश के बाजार को, देश की सरकार को, देश के नेताओं को गुलाम बनाते जाएं।    

क्या आप यह सब नहीं मानते है? क्या आपको लगता है कि अंबानियों-अदानियों से देश बन रहा है? सवा सौ करोड़ लोगों और उनमें भी 67 प्रतिशत या कि 95 करोड़ गरीब लोगों-परिवारों को प्रतिमाह गारंटीशुदा 10 से 20 हजार रुपए मिले तो क्या उससे पूरे देश का जीना बेहतर नहीं बनेगा? इनसे भी बड़ा विचारणीय सवाल है कि अंबानियों-अदानियों जैसे खरबपति यदि साल में 20 लाख करोड़ रुपए कमा रहे हैं तो इनसे 10 या 15 लाख करोड़ रुपए सरकार द्वारा वसूलना देश हित में है या नहीं? उससे भारत का भला होगा या नुकसान? 

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