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मोदी की पालकी उठाएं ये हिंदू!

नियुक्तियां खराब और विजुअल शर्मनाक! हां, भाजपा की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक में अमित शाह ने शिवराज सिंह चौहान को टला मार कर जैसे पीछे हटाया और मोदी को पहनाई जा रही माला पर हाथ लगाए राजनाथ सिंह जैसे दिखलाई दिए वह कुल मिला कर मोदी-शाह के अहंकार की बानगी है। ऐसा भारी अहंकार जो मोदी-शाह ने एक झटके में तीन लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों को हारते ही उपाध्यक्ष पद में लाइन हाजिर किया। सोचें, श्याम जाजू, विनय सहस्त्रबुद्धे, रेणु देवी जैसे जूनियर की जमात में अब रमन सिंह, शिवराज और वसुंधरा बैठते हैं। अमित शाह अध्यक्ष और ये उनके अंडर के उपाध्यक्ष। इन पूर्व मुख्यमंत्रियों से विचार नहीं, बल्कि सूचना दी गई कि आपको उपाध्यक्ष बना दे रहे हैं। वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद आडवाणी, डॉ. जोशी, शांता कुमार से बिना पूछे उन्हें मार्गदर्शक मंडल बना उसमें फेंका गया था। दस-पंद्रह साल मुख्यमंत्री रहे नेताओं को उपाध्यक्ष बना कर शंट करना और उनकी जगह प्रदेशों में अपनी गणित, अपनी समझ में नेता प्रतिपक्ष बनाने का मोदी-शाह का फैसला भाजपा की खोखली सेहत का दो टूक प्रमाण है। 

ऐसे में भला क्यों शिवराज सिंह चौहान को नरेंद्र मोदी को राजमाला पहनाने को आतुर होना चाहिए था? क्यों राजनाथ सिंह को उस माला को हाथ लगाना चाहिए जो उनके प्रति भी अहंकार का भाव लिए हुए है। हिसाब से मोदी के लिए फूलमाला के विजुअल में एक तरफ अमित शाह और दूसरी तरफ अरूण जेटली दिखलाई देने चाहिए। लेकिन हर बार अमित शाह ध्यान रखते हैं कि दूसरी तरफ राजनाथ सिंह दिखें! राजाधिराज मोदी की पालकी को ढोते हुए अमित शाह ने हमेशा अपने साथ आगे राजनाथ सिंह को रखा। इससे अमित शाह की गणित, सियासी होशियारी समझ आती है लेकिन भला राजनाथ सिंह, डॉ. जोशी, आडवाणी, शिवराज सिंह चौहान या वसुंधरा राजे, रमन सिंह क्यों मोदी-शाह के मंच की शोभा बढ़ाते हुए पालकी ढोते हुए दिखे? 

हां, नरेंद्र मोदी का साढ़े चार साल का कथित हिंदू राज मध्य काल के दरबार को जिंदा किए हुए है। इसमें सिर्फ एक राजा है और दूसरा उसका सेनापति। अन्य सब राजा की जय के नारे, जयकारा लगाते हुए। राजा की पालकी ढोते हुए। इसकी रियलिटी या परिकल्पना, विजुअलाइजेशन अमित शाह की पानीपत युद्ध वाली बात से दो टूक अंदाज में उभरती है। एक तरफ अमित शाह का 1761 की पानीपत की लड़ाई का उदाहरण देते हुए अपने को सेनापति सदाशिव राव की तरह पेश करना तो दूसरी और महाराजाधिराज नरेंद्र मोदी की विशाल राजमाला को पकड़े भाजपा के तमाम नेता! 

क्या गजब बात है। 1761 की मराठा (हिंदू?) फौज और 2019 की गुजराती (हिंदू?) फौज। उस नाते 1761 के हिंदू और 2019 के कथित राष्ट्रवादी हिंदुओं का फर्क इतना भर है कि तब मराठा पेशवाओं ने मुसलमान तोपचियों को भी रखा हुआ था मगर 2019 के मोदी-शाह राज में न तोपची हैं, न सिपहसालार हैं, न दूत हैं और न पूजापाठी ब्राह्मण। आज सिर्फ और सिर्फ राजा नरेंद्र मोदी हैं और साथ में सेनापति अमित शाह व पंजाबी चुटकलों से मनोरंजन करने वाले अरूण जेटली हैं। ढाई लोगों की मौजूदा मोदीशाही बनाम ढाई सौ साल पहले की पेशवाशाही में लड़ाई के कथित हिंदू अखाड़े को किसी भी नजर से देखें तब भी हिंदू के नाम पर जात-पांत, सत्ता अहंकार, मूर्खताएं थीं तो मोदीशाही भी वैसे ही तत्व लिए हुए हैं। तब भी उत्तर भारत के हिंदू राजाओं (राजपूत, जाट आदि के राजे-रजवाड़े) को मराठों की दादागिरी चुभी थी और आज गुजरातियों की अहंकारी सत्ता चुभी हुई है। 

बावजूद इसके गुजरात से आए सेनापति अमित शाह भरोसे में हैं। वे 1761 की पानीपत लड़ाई की याद दिलाते हुए उत्तर भारत के हिंदुओं को मरने-खपने के लिए ललकार रहे हैं। उन्होंने चेताया है कि यदि मई 2019 में नरेंद्र मोदी की तख्तपोशी नहीं हुई तो हिंदुओं का भविष्य अंधकारमय है।

अब कोई पूछे अमित शाह से कि मंच पर अगल-बगल खड़े भाजपाई नेताओं का जिस राज में मान-सम्मान नहीं, जिनका पिछले पांच वर्षों का अनुभव जलालत झेलने का है तो उन्हें आगे भला इससे अधिक क्या अंधकारमय भविष्य का खतरा होगा? ये कितना ढोएंगें नरेंद्र मोदी की पालकी को? ये 2019 में क्यों चुनाव जीतने के लिए अपने को खपाएगें? ढाई लोगों के साथ ले दे कर धर्मेद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव, जावडेकर, संबित पात्रा जैसे हवा हवाई नेता भले चुनाव लड़ते दिखे मगर जमीनी नेता तो साढ़े चार सालों में पालकी ढोते, राजमाला पहनाते वैसे ही अधमरे पड़े है। 

2014 में पूरे देश ने, देश के हिंदुओं ने नरेंद्र मोदी को सिर पर बैठाया था। उनसे मोहन भागवत, राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे, रमन सिंह, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, नितिन गडकरी आदि ने क्या–क्या उम्मीद नहीं पाली थीं लेकिन न हिंदू की एक उम्मीद पूरी हुई और न सच्चे लोकतंत्र माफिक सहकर्मियों को मान-सम्मान वाली सत्ता मिली। क्या जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 व 35ए खत्म हुआ? क्या मदरसों में आधुनिक शिक्षा पढ़ाना अनिवार्य बना? क्या समान नागरिक संहिता लगी? क्या गौहत्या पाबंदी का अखिल भारतीय कानून बना? क्या अयोध्या में राम मंदिर बना? मतलब हिंदू एजेंड़े, अस्मिता का एक काम नहीं हुआ और उलटे हिंदुओं को देवालय नहीं शौचालय की जरूरत जैसे भाषण झाड़े गए। बावजूद इसके बेचारे मोहन भागवत, दत्तात्रेय, सुरेश सोनी से ले कर आडवाणी, जोशी, राजनाथ सिंह, गडकरी सभी पांच साल से चुपचाप मोदी की पालकी यह सोचते हुए ढोते रहे कि राजा अभी मालिक है। 

उस राजा की तरफ से अब आह्वान है कि यदि 2019 में वापिस नरेंद्र मोदी राजा नहीं बने तो हिंदू खतरे में पड़ेंगें। यह 1761 वाली पानीपत की लड़ाई है। सो, गुजरातियों को जिताने के लिए उत्तर भारत के ब्राह्मण-बनिए-राजपूत, जाट, ओबीसी जुटे। इन्हें मोदी-शाह यह कहते हुए डरा रहे हैं कि नहीं जीते तो भाजपा के पालकी ढोने वाले कहारों तुम बेरोजगार हो जाओगे। राजा के दरबार का सत्ता सुख गंवा बैठोगे। तब मोहन भागवत इतराते हुए नहीं कह पाएंगें कि उनका संगठन सत्ता की पालकी का ठेका लिए हुए है। न कृष्ण गोपाल की दुकान चलेगी और न संघ के बाकी संगठन मंत्रियों की। 

बस, सत्ता की पालकी को ढोने का ही, यही संघ, भाजपा का इकलौता सुख है। तभी हिसाब से जब निर्विवाद सबने महसूस किया है कि ढाई लोगों की सत्ता में भाजपा का हर स्वाभिमानी, स्वतंत्रचेता नेता व कार्यकर्ता घुटता रहा तो उसके लिए 2019 का चुनाव हारना तो मोदी-शाह की गुलामी से आजादी प्राप्त करना है। 1761 और 2019 की पानीपत की लड़ाई का फर्क यह है कि आगामी लड़ाई में भारत के हिंदुओं को मूर्खताओं से, पालकी ढोने से, बरबादी से, धोखे से आजादी प्राप्त होगी। कोई माने या न माने अपना मानना है कि पांच सालों में मोदी राज ने दो ही बातें प्रमाणित की हैं। एक, हिंदुओं से अपनी पालकी उठवाई। ऐसा हिंदुओं को मूर्ख, डरपोक, कायर बना कर किया। दूसरा, दुनिया में प्रमाणित किया कि हिंदुओं को राज करना नहीं आता है। सभ्यताओं की प्रतिस्पर्धा, लड़ाई में हिंदू नाम की जो कौम है उसकी कथित राष्ट्रवादी धारा न बुद्धि, विजन, समझ लिए हुए है और न अपने एजेंडे, प्रोजेक्ट की डीपीआर बनाए हुए है। 

तभी अनुभव की कसौटी पर सोचें। क्या अगले चुनाव में लाइन हाजिर वसुंधरा, रमन सिंह, शिवराज, मार्गदर्शक आडवाणी, डॉ जोशी या पालकी ढोते हुए राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, मोहन भागवत, सुरेश जोशी, दत्तात्रेय क्या सचमुच पानीपत की लड़ाई जैसे जुमले में अपने को झोंकने का संकल्प बना सकते हैं? फिर उन हिंदुओं का तो मतलब ही नहीं बनता है जिन्होंने पांच सालों में अपनी जेबें खाली की, बरबादी झेली और अपने आपको दबिश व सामाजिक बिखराव में पाया। 

सो, मोदी-शाह 2019 को पानीपत लड़ाई बनाने की कितनी ही कोशिशें करें, भाजपा में भी इसका माहौल नहीं बनना है। सब इसे ढाई लोगों की निजी सत्ता लड़ाई मानेंगे। अपना मानना है कि शाह की इस पानीपत लड़ाई में वक्त बताएगा कि पालकी उठाए नेता, पदाधिकारी भी यूपी, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश सब जगह पालकी छोड़ तमाशबीन बन खड़े दिखेंगें। 2019 के कथित पानीपत में गुजरातियों की हार 1761 के मराठों से कई गुना भारी होगी। लेकिन लड़ाई क्योंकि लोकतंत्र का सहज चुनाव है इसलिए वह सब नहीं होना है, जिसकी चिंता में अमित शाह को पानीपत की लड़ाई के दुःस्वप्न आ रहे हैं। 

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