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सवा सौ करोड़ लोगों में युद्ध!

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की बुद्धि पर तरस आता है। कथित हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं के ज्ञान, विचार, समझ पर शर्म आती है, जो उन्होंने हिंदू राजनीतिक विकास के लोकतंत्र मुकाम में चुनाव को युद्ध करार दिया! वह भी पानीपत की लड़ाई! क्या राहुल गांधी, अखिलेश, शरद पवार, ममता, मायावती, नवीन पटनायक और इनकी पार्टियों के करोड़ों-करोड़ समर्थक अफगानी हमलावर अहमद शाह अब्दाली या बाबर, अकबर, अफगान, यवन हैं, जिनसे भाजपा का युद्ध है और भाजपा हारी तो भारत गुलाम बनेगा? यदि नरेंद्र मोदी, अमित शाह तीन महीने बाद चुनाव नहीं जीते तो हम हिंदू क्या गुलाम हो जाएंगें? और किनके गुलाम? यदि आपने और मैंने मोदी-शाह को वोट नहीं दिया तो क्या हम गुलामी का खतरा लिए होंगे?  सवाल यों भी हो सकता है कि यदि मैं अप्रैल 2019 में राहुल गांधी को, कांग्रेस को वोट दूं तो मेरा वह वोट क्या भारत को गुलाम बनाने वाला होगा? तब वह कृत्य क्या कौमद्रोही होगा,  देशद्रोही होगा?

हां, नरेंद्र मोदी, अमित शाह और उनके भक्त मोदी के खिलाफ वोट देने वाले को देशद्रोही, जयचंद की औलाद कह सकते हैं! तब फिर भारत राष्ट्र-राज्य की आजादी और उसके लोकतंत्र का क्या मतलब? सवा सौ करोड़ लोगों या 90 करोड़ मतदाताओं में से यदि 60 करोड़ मतदाताओं ने मोदी-शाह-भाजपा के खिलाफ वोट दिया तो क्या 30 करोड़ मतदाताओं के वोटों से बनी मोदी सरकार विरोधी 60 करोड़ लोगों को देशद्रोही मान फांसी पर लटकाएगी? ध्यान रहे सवा सौ करोड़ लोग व 90 करोड मतदाताओं में से एक-तिहाई वोटों पर ही केंद्र की सरकार बनती है। 2014 में मोदी-भाजपा को 31 प्रतिशत वोट मिले थे बाकि 69 प्रतिशत मतदाताओं ने दूसरी पार्टियों को वोट दिए थे। वैसे ही यदि 2019 में भी भाजपा 31 प्रतिशत वोट ले कर चुनाव जीत जाए तो बाकी 69 प्रतिशत वोटों को पानीपत की लड़ाई में हारे देशद्रोही मान क्या सूली पर लटकाएंगे? 

सचमुच लोकतंत्र की सहज प्रक्रिया में, लोकसभा के रूटीन चुनाव को युद्ध कहना और वह भी ऐतिहासिक पानीपत की लड़ाई बतलाना क्या मतलब रखता है? 

जाहिर है 11 जनवरी 2019 के दिन भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने पानीपत के युद्ध की जो तस्वीर खिंची है उसका मकसद देश को, चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम, देशभक्त बनाम देशद्रोही की ऐतेहासिक लड़ाई में कनवर्ट करना है। मोदी-शाह हल्ला बनवाएंगें कि विरोधियों की जीत हिंदुओं को गुलाम बना देगी! क्या यह एप्रोच भारत को सीरिया वाले गृहयुद्ध जैसी स्थिति की और धकेलना नहीं होगा? क्या हिंदुओं के नाम पर संगठन चलाए आरएसएस और मोहन भागवत भी मानते हैं कि यदि मोदी नहीं जीते तो सवा सौ करोड़ लोगों का यह देश गुलाम बनेगा? मोदी के हारने के बाद वैसा ही अंधेरा बनेगा जैसा 1761 में मराठों के हारने के बाद दो सौ साल रहा।

अमित शाह ने राष्ट्रीय परिषद् की बैठक में दो टूक शब्दों में भाजपाइयों को ललकारा, समझाया कि युद्ध कई प्रकार के होते हैं। कुछ युद्धों का प्रभाव सदियों तक रहता है। जैसे पानीपत की तीसरी लड़ाई का रहा। वैसे ही 2019 का युद्ध सदियों तक असर डालने वाला है। सो, जैसे भी हो यह युद्ध जीतना है!

सोचें, कैसे अमित शाह ने सवा सौ करोड़ लोगों की नियति को एक व्यक्ति, आज के राजा नरेंद्र मोदी के तख्त में बांधा है। 21 वीं सदी में हिंदुओं को मूर्ख बनाने की भला इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या कोई दूसरी हो सकती है कि यदि मोदी नहीं जीते तो हम गुलाम हो जाएंगें? सदियों तक अंधेरे में डूबे रहेंगें! 

पता नहीं अमित शाह ने इतिहास कहां से पढ़ा लेकिन उनके लिए इतिहास का मतलब नहीं है। उनका और नरेंद्र मोदी का सिर्फ सत्ता से नाता है। इनके लिए सत्ता आना-जाना हिंदुओं का जनम-मरण है। पूरी कौम, पूरे धर्म व हिंदुओं के सनातनी अस्तित्व की नियति को अमित शाह ने नरेंद्र मोदी नाम के तोते में या उनके खूंटे का जैसा बंधक दिखलाया है वह अहंकार का चरम है। 

यह विनाश काले विपरीत बुद्धि है। तभी पानीपत की तीसरी लड़ाई के मराठों वाली तस्वीर मोदी-शाह की उभरती है। ध्यान रहे जनवरी 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली बनाम मराठों में थी। तब मुगलों का पतन हो चुका था और दक्षिण दिल्ली तक मराठों का कब्जा था। पानीपत में अब्दाली के हाथों मराठा हारे तो मराठा राज का विस्तार रूका। यों तब तक अंग्रेज भी आ चुके थे। फिर उन्हीं का राज बना। सो, यदि अमित शाह ने मराठों के साथ अपने गुजराती राज को तुलनीय माना है और दिल्ली के तख्त पर 25-50 साला शासन का ख्वाब पाल रहे हैं तो ख्वाब, ख्वाब ही रह जाना है। वे गुजराती राज को स्थायी बनाने के लिए उत्तर भारत के राजपूत, जाट हिंदू राजाओं से वैसे ही गुहार कर रहे हैं जैसे मराठाओं ने तब राजपूत, जाट हिंदू राजाओं से मदद चाही थी। मराठे भी तब अपने अहंकार में वैसे ही जीते थे जैसे अभी मोदी-शाह जी रहे हैं।  

तभी अपने को लगता है कि अमित शाह ने अनचाहे मई 2019 की अपनी नियति दिखला दी है। गुजराती नरेंद्र मोदी-अमित शाह आज समझ नहीं पा रहे हैं कि यूपी, बिहार में जाट, राजपूत, ब्राह्मण उनके लिए क्यों नहीं हिंदू–मुस्लिम करा दे रहे हैं। तभी कह रहे हैं कि यह युद्ध है, तलवार उठाओ और चुनाव को पानीपत की लड़ाई बनाओ। हिंदुओं को भड़काओ कि यदि नरेंद्र मोदी नहीं जीते तो मुसलमानों का राज बनेगा। 

इसी थीम पर घर-घर हल्ला होगा कि नरेंद्र मोदी का विकल्प कौन है? लड़ाई को अहमद शाह अब्दाली बनाम नरेंद्र मोदी की बना कर प्रचार होगा कि भला मोदी का कहां विकल्प है। उन्हीं को वोट देना है। सवाल है क्या भाजपाई, क्या देश के हिंदू इस थीसिस से गुमराह होंगे? जिन भाजपाइयों ने शुक्रवार को अमित शाह का भाषण सुना क्या उन्होंने भी चुनाव को पानीपत का युद्ध माना?  

अपने को ऐसा नहीं लगता है। भाजपा की राष्ट्रीय परिषद् में अमित शाह, नरेंद्र मोदी के भाषण को भाजपाइयों ने जिस सपाट अंदाज में सुना, उनकी जैसी भाव-भंगिमा दिखी उससे जाहिर है कि जैसे 1761 में मराठा सेनापति अपने मुगालतों में थे, उन्होंने अपनी सनक में जैसे राजपूत, जाट राजाओं, ओबीसी जातियों को नाराज किया था वैसी ही कारस्तानी राज में रहते मोदी-शाह की है। इनका राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे से ले कर नितिन गडकरी, डॉ. जोशी आदि सबके प्रति जैसा व्यवहार रहा है तो कौन इनके लिए मर-मिटने वाला है!  

सो, पानीपत की तीसरी लड़ाई, मराठों की जगह गुजराती और खुद भाजपा की भीतरी दशा का विचार दिवाल पर लिखा यह दिखला देने वाला है कि जैसे मराठों के हारने के बाद उन्हें छुपने की जगह नहीं मिली थी वहीं नरेंद्र मोदी, अमित शाह के साथ होना है। तब के अमित शाह याकि सेनापति सदाशिवराव और उनकी सेना इस कदर बुरी हारी कि अहंकारी मराठाओं के वंशजों का आज अता-पता तक नहीं है। तब सब लड़ाई हार जंगलों में जा छुपे थे। गुमनामी में मरे। युद्ध जीते अफगानी अब्दाली ने तब नारा दिया था- 'एक मराठा मुंडी लाओ और सोने का एक सिक्का पाओ!' 

क्या वैसा हस्र गुजराती मोदी-शाह की कमान में भाजपा का होगा? शायद अमित शाह को वैसी आंशका है तभी गुहार लगा रहे हैं कि हर हाल में चुनाव जीतना है। नहीं तो हार के बाद दिल्ली में जो सरकार बनेगी उसके हाथों गुजराती सेना का वही हस्र होगा जो मराठों का हुआ था। सब अनाम मौत मरे और मुंह छुपाए, जंगलों में नौ दो ग्यारह हुए। 

सो, पानीपत की थीसिस पर मानना हो तो मानें कि अमित शाह ने अपने और अपने नेता के लिए दीवाल पर लिखा हुआ बोल दिया है। पानीपत युद्ध जब बताया है तो हस्र भी पानीपत जैसा होना चाहिए।   

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