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मंदिर भूलो मतलब संघ की मोदी से तौबा?

क्या‍ सचमुच? अपने को भी समझ नहीं आया। लगता है आरएसएस अब नरेंद्र मोदी, अमित शाह की बातों से थक गया है। तभी विश्व हिंदू परिषद् ने चार महीने के लिए राममंदिर आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की है। मामूली ऐलान नहीं जो विहिप के अंतरराष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन ने कहा कि हम नहीं चाहते हैं कि मंदिर निर्माण चुनावी मुद्दा बने। इसलिए हम चार महीने तक राम मंदिर के आंदोलन पर विराम लगा रहे हैं। सोचें, कल तक संघ और विहिप का दबाव था कि मंदिर निर्माण नहीं होने तक आराम नहीं करेंगे। खुद संघ, विहिप और भाजपा मंदिर निर्माण को मुद्दा बनाने के लिए दिन-रात एक किए हुए थे। मोदी सरकार पर दबाव बनाए हुए थे कि कुछ तो करो मंदिर निर्माण के मामले में। मंदिर बनाने का कानून बनाओ, अध्यादेश लाओ। सुप्रीम कोर्ट से जल्द फैसला कराओ। यहीं नहीं प्रयागराज के अर्ध कुंभ में साधु-संतों को इकठ्ठा कर धर्म संसद बैठाई गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाषण दिया। उससे पहले सुरेश भैय्याजी जोशी ने दो टूक अंदाज में राम मंदिर के मुद्दे पर सार्वजनिक बयान दे कर दबाव बनाया। प्रयागराज में भाषण से पहले मोहन भागवत दिल्ली आए तब भी विचार हुआ और सोचा गया कि यदि सरकार ने कुछ नहीं किया तो हिंदू जन, साधु-संतों में कैसे जोश बनेगा? कैसे भरोसा बनाएंगे? तभी सरकार ने ताबड़तोड़ सुप्रीम कोर्ट से कहा कि मंदिर के लिए सरकार द्वारा ली हुई जमीन लौटाई जाए, उसे फ्री करें। 

सोचें, क्यों पिछले तीन महीने से राम मंदिर को लेकर हल्लेबाजी, हाइपर गतिविधियां थी? क्यों रूटीन के एक अर्द्ध कुंभ का देशव्यापी प्रचार और उसमें मंदिर को लेकर निश्चय होने का कयास बनवाया गया? इसलिए ताकि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को ले कर उत्तर-प्रदेश के जन मानस में उद्वेलन बने? यह विश्वास बनवाया जा सके कि नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ ही मंदिर बनवा सकते हैं और हिंदुओं का हित तभी है जब नरेंद्र मोदी वापिस चुनाव जीतें। संघ मशीनरी और संगठनों के लिए इस बात का जवाब बन सके कि पांच साल में हिंदुओं के लिए मोदी सरकार ने क्या कुछ किया है। 

सचमुच आम चुनाव तक देश की बहस, चर्चाओं, नैरेटिव में मंदिर को मुद्दा बनाने की दस तरह की कोशिश हुई। तभी प्रयागराज में हिंदुओं की सनातनी शंकराचार्य की सच्ची गद्दी पर बैठे स्वरूपानंद ने साधु-संतों का अपना जमावड़ा लगवाया और कहा कि वे 21 फरवरी से मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या की और कूच करेंगे। उनके कहे का असर हुआ और विहिप-संघ प्रायोजित धर्म संसद में मोहन भागवत के भाषण के वक्त हल्ला हुआ कि इधर-उधर की बातें न करें और बताएं कि मंदिर निर्माण के लिए कब चलना है! 

अपने को जो खबर है और प्रयागराज से लौट कर लोगों ने जो बताया है उस अनुसार इस बार का अर्ध कुंभ फ्ल़ॉप चल रहा है। पहले दो दिन सरकार ने झूठा प्रचार कराया कि ढाई करोड़ लोग आए। दस लाख लोग आए थे और मेला अधिकारी ने इस अनुमान को चालीस लाख का आंकड़ा दिया मगर मुख्यमंत्री दफ्तर और प्रदेश सरकार ने उसे दबवा कर आंकड़े को करोड़ों में प्रचारित करवाया। इस कुंभ में पहली बार देखने को मिला कि मुख्य मेला क्षेत्र में भीड़ की रोजमर्रा वाली रौनक भी नहीं बनी हुई है। साधु-संतों-अखाड़ों के टेंट खाली चल रहे हैं तो रेल-बस बुकिंग में भी मारामारी नहीं। हर तरह के कुंभ में हर बार जाने वाले अपने सिन्हाजी ने मौजूदा कुंभ के माहौल को इस नाते अविस्मरणीय बताया कि शहर का कायाकल्प हुआ, खूब खर्चा हुआ लेकिन इसके बावजूद हिंदू आस्थावानों का रेला बना ही नहीं। 

यदि ऐसा है और धर्म संसद में संघ प्रमुख मोहन भागवत के आगे जैसा जो हल्ला हुआ उसका सीधा अर्थ है कि जैसे मोदी-शाह को ले कर अविश्वास, धोखे, फेंकूपने का संकट बना है उसी में अब संघ और विहिप भी जूझ रहे हैं। संघ और विहिप झूठे हैं, यह बात साधु-संतों-आस्थावानों में फैल रही है। मतलब वोट के लिए मंदिर की बातें करते हैं, चुनाव से पहले भाजपा को वोट दिलाने के लिए आंदोलन करते हैं, यह बात आम हिंदू में पैठ रही है। धर्म का उपयोग वोट और राजनीति के लिए है, इस बात को समझते हुए ही आम हिंदू मानस अर्ध कुंभ में नहीं उमड़ा तो साधु–संतों ने, अखाड़ा परिषद आदि ने धर्म संसद में सवाल किया कि कब तक केवल बातें करते रहेंगें। घोषणा करो! 

सो, मंदिर निर्माण होने तक आराम नहीं की बात करते-करते अचानक चुनाव के चार महीने में आंदोलन स्थगित करने का अर्थ है कि संघ-विहिप को समझ आया है कि इसके हल्ले से कार्यकर्ताओं-समर्थकों में जोश नहीं बनेगा। उलटे नियत के सवाल उठेंगे। तय मानें कि विश्व हिंदू परिषद् का ऐलान आरएसएस के आला पदाधिकारियों में विचार के बाद ही हुआ होगा। 

सवाल है कि क्या इस बारे में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ आदि के साथ संघ पदाधिकारियों ने विचार किया होगा? मुश्किल है। अपने को लग रहा है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह अपने सर्वेक्षणों से यह राय बनाए हुए हैं कि मंदिर मुद्दा वोट नहीं दिला सकता। वोट के लिए नरेंद्र मोदी का नंबर एक विश्वास अपने चेहरे का है। नरेंद्र मोदी सौ टका इस आत्मविश्वास में हैं कि वे महानायक हैं और लोग उनके दिवाने। उनके चेहरे के चलते ही अरूणाचल प्रदेश से ले कर गुजरात, कश्मीर की डल लेक से ले कर केरल तक मोदी-मोदी की आंधी है। उनके चेहरे के आगे जब कोई दूसरा चेहरा नहीं है तो लोग उन्हीं के चेहरे पर वोट डालेंगें। तब भला रामजी के चेहरे की अभी क्या जरूरत! 

हां, चुनाव रणनीति, जनता को लुभाने की एप्रोच में नरेंद्र मोदी की सोच और संघ, उसके संगठनों की सोच में फर्क है। इसकी खाई दिनोंदिन बढ़ रही है। तभी बड़ा फैसला है जो संघ-विहिप ने मंदिर निर्माण को मुद्दा बनाने से तौबा की। आरएसएस के पदाधिकारी मानने लगे हैं कि आगामी चुनाव में जो होना है वह हो मगर यह न हो कि हम मंदिर, मंदिर का राग आलापें और उत्तर प्रदेश में ही सपा-बसपा एलायंस चुनाव जीत जाएं। तब हमेशा के लिए राम मंदिर का मुद्दा साख-धाक-विश्वास गंवा बैठेगा। सोचें, इसमें कितनी तरह के मतलब निकलते हैं?     

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