होली आने की सूचना देता होलाष्टक

अशोक “प्रवृद्ध” भारतीय पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली होली पर्व के आगमन की पूर्व सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है। यही कारण है कि होलाष्टक को होली पर्व की सूचना लेकर आने वाला एक हरकारा कहा जाता है। होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलने के साथ ही इस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरु हो जाती है। होलाष्टक दो शब्दों के योग से बना है - होला+ अष्टक अर्थात होली से पूर्व के जो आठ दिन होते हैं, वे होलाष्टक कहलाते हैं ।

उल्लेखनीय है कि होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है। धुलेण्डी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है। अर्थात होली पर्व की शुरुआत होलाष्टक से प्रारम्भ होकर धुलैण्डी तक रहती है। इसके कारण प्रकृति में खुशी और उत्सव का माहौल रहता है। मान्यता है कि जब भगवान श्री भोलेनाथ ने क्रोध में आकर कामदेव को भस्म कर दिया था, तो उस दिन से होलाष्टक की शुरुआत हुई थी । वर्ष 2019 में 14 मार्च 2019 से 20 मार्च, 2019 के मध्य की अवधि होलाष्टक पर्व की रहेगी ।

होलाष्टक अर्थात होली से पहले के आठ दिनों में शुभ मुहूर्त देखकर किये जाने वाले विवाह, ग्रह प्रवेश, नवीन व्यवसाय प्रारम्भ करने या अन्यान्य शुभ कार्य आरम्भ नहीं किये जाते। होलाष्टक से सम्बन्धित पौराणिक मान्यता के अनुसार हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र भक्त प्रहलाद को भगवद्भक्ति से हटाने और स्वयं अर्थात हिरण्यकशिपु को ही भगवान की तरह पूजन हेतु तैयार करने के लिए अनेक यातनाएं दी लेकिन जब किसी भी उपाय से प्रहलाद के द्वारा भगवद्भक्ति से मुंह न मोड़ने और अपने पिता हिरण्यकशिपु को भगवान की तरह पूजने के लिए तैयार न होने पर होली से ठीक आठ दिन पहले उसने प्रह्लाद को मारने के प्रयास आरंभ कर दिये थे, लेकिन  लगातार आठ दिनों तक भगवान अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा करते रहे ।

फाल्गुन पूर्णिमा का दिन होलिका के अंत और नरसिंह भगवान के द्वारा हिरण्यकशिपु को मार दिए जाने पर यह सिलसिला थमा। इसलिये आज भी भारतीय इन आठ दिनों को अशुभ मानते हैं। लोगों का बिश्वास  है कि इन दिनों में शुभ कार्य करने से उनमें विघ्न बाधाएं आने की संभावनाएं अधिक रहती हैं। एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने अपनी तपस्या भंग करने का प्रयास करने पर क्रोद्ध में आकर कामदेव को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि को भस्म कर दिया था, तब से ही होलाष्टक की शुरुआत हुई।

कामदेव प्रेम के देवता माने जाते हैं, इनके भस्म होने के कारण समस्त संसार में शोक की लहर फैल गई थी। जब कामदेव की पत्नी रति द्वारा भगवान शिव से क्षमा याचना की गई, तब शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन प्रदान करने का आश्वासन दिया। इसके बाद लोगों ने खुशी मनाई। होलाष्टक का अंत धुलेंडी के साथ होने के पीछे एक कारण यह माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भी होली से आठ दिन पूर्व शुभ कार्यों के करने की मनाही होती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका रहती है तथा विवाह आदि संबंध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है। होलाष्टक में शुभ कार्य न करने के पीछे  ज्योतिषीय कारण भी बताई जाती है।

ज्योतिषियों के अनुसार इन दिनों में नकारात्मक उर्जा अर्थात नेगेटिव एनर्जी काफी हावी रहती है। होलाष्टक अष्टमी तिथि से आरंभ होता है। और अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक अलग-अलग ग्रहों की नकारात्मकता अर्थात नेगेटिविटी काफी उच्च रहती है। जिस कारण इन दिनों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है। इनमें अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चुतर्दशी को मंगल तो पूर्णिमा को राहू की ऊर्जा काफी नकारात्मक रहती है।

इसी कारण यह भी कहा जाता है कि इन दिनों में जातकों के निर्णय लेने की क्षमता काफी कमजोर होती है जिससे वे कई बार गलत निर्णय भी कर लेते हैं जिससे हानि होती है। लोकमान्यतानुसार होलाष्टक के दौरान विवाह व अन्य कार्यों हेतु शुभ मुहूर्त नहीं होने के कारण इन दिनों में विवाह, गृह प्रवेश जैसा मांगलिक कार्य संपन्न नहीं करना चाहिये। भूमि पूजन भी इन दिनों में नहीं किया जाना बेहतर रहता है।

नवविवाहिताओं को इन दिनों में मायके में रहने की सलाह दी जाती है। इन दिनों भारतीय संस्कृति में प्रचलित सोलह संस्कार में से किसी भी संस्कार को संपन्न नहीं करना चाहिये। दुर्भाग्यवश इन दिनों किसी की मौत होती है तो उसके अंत्येष्टि संस्कार के लिये भी शांति पूजन करवाया जाता है। इन दिनों में सोलह संस्कारों पर रोक होने का कारण इस अवधि को शुभ नहीं माना जाता है। किसी भी प्रकार का हवन, यज्ञ कर्म भी इन दिनों में नहीं किये जाते।

शुभ कार्यों के करने की मनाही होने के बाद भी होलाष्टक में अपने आराध्य देव की पूजा अर्चना किया जा सकता है। इन दिनों व्रत उपवास करने से भी पुण्य फल प्राप्त होती है। इन दिनों में धर्म कर्म के कार्य, वस्त्र, अनाज व अपनी इच्छा व सामर्थ्य के अनुसार जरुरतमंदों को धन का दान करने से भी लाभ मिल सकता है। साथ ही कुछ शास्त्रोक्त विधि अपनाकर नकारात्मक उर्जा के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

धर्म प्रधान भूमि भारत में प्रत्येक कर्म को एक निश्चित मुहूर्त में आयोजित करने की शास्त्र सम्मत प्रक्रिया है।इसी नियम के अन्तर्गत होलाष्टक का भी चिंतन किया जाता है। शीघ्रबोध में कहा गया है- शुक्लाष्टमी समारभ्य फाल्गुनस्य दिनाष्टकम,पूर्णिमावधिकम त्याज्यम होलाष्टकमिदम शुभे। अर्थात - फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होलिका पर्यन्त 8 दिन होलाष्टक के नाम से प्रसिद्ध है।

इन दिवस के मध्यांतर विवाहादि समस्त मंगल कृत्य त्याज्य है। मुहूर्त चिंतामणि में यह भी उल्लिखित है कि होलाष्टक में शुभ कर्म कहाँ-कहाँ निषिद्ध हैं- विपाशेरावतीतीरे शुतुद्रवाश्च त्रिपुष्करे,विवाहादिशुभे नेष्टम होलिका प्राग्दिनाष्टकम। अर्थात -होलाष्टक दोष केवल पंजाब में सतलज नदी के तट पर स्थित नगरों,रावी तट पर मुल्तान,लाहौर,अमृतसर आदि तथा व्यास नदी पर स्थित गुरुदासपुर,होशियारपुर,कांगड़ा,मण्डी,कपूरथला एवं सुल्तान त्रिपुष्कर आदि में हीं विशेष मान्य एवं दुष्ट-प्रभावोंत्पादक है अन्यत्र नहीं।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि इन स्थानों के अलावा होलाष्टक का दोष कहीं नहीं लगता है,अर्थात इन स्थानों के अतिरिक्त अन्य स्थान पर समस्त मंगल कार्य अपने शुभ योगों के आधार पर सम्पन्न किये जा सकते हैं। ध्यातव्य हो कि होलिका पूजन करने के लिये होली से आठ दिन पहले अर्थात होलाष्टक शुरू होने वाले दिन होलिका दहन वाले स्थान का चुनाव कर उस स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें होलिकादहन हेतु सूखे उपले, सूखी लकडी, सूखी घास एकत्र कर  होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है।

होलाष्टक के शुरुआती दिन में ही होलिका दहन के लिए दो डंडे स्थापित किये जाते हैं। जिसमें से एक को होलिका तथा दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार जिस क्षेत्र में होलिका दहन के लिए डंडा स्थापित हो जाता है, उस क्षेत्र में होलिका दहन तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है।

होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकडियां डाली जाती है। इस प्रकार होलिका दहन के दिन तक यह लकडियों का बड़ा ढेर बन जाता है और इस दिन से होली के रंग फिजाओं में बिखरने लगते है अर्थात होली की शुरुआत हो जाती है। बच्चे और बडे इस दिन से हल्की -फुलकी होली खेलनी प्रारम्भ कर देते है।

होलाष्टक मुख्य रुप से पंजाब और उत्तरी भारत में मनाया जाता है। होलाष्टक के दिन से एक ओर जहां उपरोक्त कार्यो का प्रारम्भ होता है। वहीं कुछ कार्य ऎसे भी है जिन्हें इस दिन से नहीं किया जाता है। यह निषेध अवधि होलाष्टक के दिन से लेकर होलिका दहन के दिन तक रहती है। अपने नाम के अनुसार होलाष्टक होली के ठीक आठ दिन पूर्व शुरु हो जाते है। होलाष्टक से जुडी मान्यताओं को भारत के कुछ भागों में ही माना जाता है।

इन मान्यताओं का विचार स्रवाधिक पंजाब में देखने में आता है। होली के रंगों की तरह होली को मनाने के ढंग में विभिन्न है। होली उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडू, गुजरात, महाराष्ट्र, उडिसा, गोवा आदि में अलग ढंग से मनाने का चलन है। देश के जिन प्रदेशो में होलाष्टक से जुड़ी मान्यताओं को नहीं माना जाता है ।उन सभी प्रदेशों में होलाष्टक से होलिका दहन के मध्य अवधि में शुभ कार्य करने बन्द नहीं किये जाते है।

उल्लेखनीय है कि देश के कई हिस्सों में होलाष्टक नहीं मानते। लोक मान्यता के अनुसार कुछ तीर्थस्थान जैसे शतरुद्रा, विपाशा, इरावती एवं पुष्कर सरोवर के अलावा बाकी सब स्थानों पर होलाष्टक का अशुभ प्रभाव नहीं होता है इसलिए अन्य स्थानों में विवाह इत्यादि शुभ कार्य बिना परेशानी हो सकते हैं। फिर भी शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक की अवधि में शुभ कार्य वर्जित हैं। अत: हमें भी इनसे बचना चाहिए।

भारतीय मुहूर्त विज्ञान व ज्योतिष शास्त्र प्रत्येक कार्य के लिए शुभ मुहूर्तों का शोधन कर उसे करने की अनुमति देता है। कोई भी कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता है तो वह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। इस धर्म धुरी से भारतीय भूमि में प्रत्येक कार्य को सुसंस्कृत समय में किया जाता है, अर्थात्‌ ऐसा समय जो उस कार्य की पूर्णता के लिए उपयुक्त हो। इस प्रकार प्रत्येक कार्य की दृष्टि से उसके शुभ समय का निर्धारण किया गया है।

जैसे गर्भाधान, विवाह, पुंसवन, नामकरण, चूड़ाकरन विद्यारम्भ, गृह प्रवेश व निर्माण, गृह शान्ति, हवन यज्ञ कर्म, स्नान, तेल मर्दन आदि कार्यों का सही और उपयुक्त समय निश्चित किया गया है। इस प्रकार होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि से एक होलाष्टक दोष माना जाता है जिसमें विवाह, गर्भाधान, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि शुभ कार्य वर्जित हैं।

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