विचाराधीन कैदियों की सुनवाई जनहित याचिका में बदला

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने यहां जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों के एक पत्र को शुक्रवार को जनहित याचिका में तब्दील करते हुए उस पर सुनवाई शुरू की। विचाराधीन कैदियों ने अपने मुकदमों के शीघ्र निस्तारण की मांग की है जो वर्षों से निचली अदालतों में लंबित हैं।

मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन और न्यायमूर्ति ए जे भम्बानी की पीठ ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया और 13 अगस्त तक उससे याचिका पर जवाब मांगा। अदालत ने हत्या से लेकर मादक पदार्थों को रखने और गैरकानूनी गतिविधियां (निरोधक) कानून जैसे अपराधों में मुकदमों का सामना कर रहे सात विचाराधीन कैदियों द्वारा भेजे पांच पत्रों पर संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू की। अदालत को पत्र लिखने वाले विचाराधीन कैदियों में से एक उजैर अहमद को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने यूएपीए के तहत विभिन्न अपराधों के लिए 2013 में गिरफ्तार किया और वह पांच साल से अधिक समय से यहां रोहिणी जेल में बंद है। उसने पत्र में दावा किया कि अभी तक इस मामले में आरोप नहीं तय किए गए। उसने दावा किया कि उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया। एक अन्य विचारधीन कैदी इमरान खान जुलाई 2016 से यहां तिहाड़ जेल में बंद है जब उसे यूएपीए के तहत विभिन्न अपराधों में एनआईए ने गिरफ्तार किया था। उसने अपने पत्र में कहा कि उसके मामले में जुलाई 2016 में आरोपपत्र दायर किया गया लेकिन तब से मामले में कोई प्रगति नहीं हुई।

तिहाड़ जेल में बंद शाहजहां, मोहम्मद साजिद और सत्तार मादक पदार्थ रखने और तस्करी के मामले में 2014 से बंद है। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि मामला निचली अदालत में लंबित है जिसने अभी तक 26 में से केवल आठ गवाहों से जिरह की है। उन्होंने अपने मामलों में शीघ्र सुनवाई की भी मांग की है। साल 2015 में हत्या के मामले में आरोपी शाहबुद्दीन तिहाड़ जेल में बंद है। उसने अपने मामले में शीघ्र सुनवाई की मांग की है जिसमें निचली अदालत ने अभी तक 20 में से केवल आठ गवाहों के बयान दर्ज किए हैं। ऐसी ही एक याचिका 2014 में बलात्कार के एक मामले के आरोपी शंकर ने दायर की है। वह भी तिहाड़ जेल में बंद है। उसने दलील दी कि निचली अदालत ने मामले में अभी तक 17 में से केवल नौ गवाहों से जिरह की है।

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