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बजट से छोटे किसानों का भला होगा?

नई दिल्ली। आम बजट में खेती किसानी को प्रोत्साहन देने के लिए किये गये प्रावधानों की सराहना करते हुए कृषक संगठन ‘भारतीय कृषक समाज’ ने कहा है कि किसानों की ओर पहली बार इतना ध्यान दिया जा रहा है तथा केंद्र सरकार की ओर से पहली बार गरीब और छोटे किसानों के खाते में सुनिश्चित आय भेजी जा रही है। अंतरिम बजट 2019-20 में कृषि क्षेत्र संबंधी प्रावधानों के बारे में पेश हैं संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ कृष्णबीर चौधरी से सवाल-जवाब-

प्रश्न : प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत दो हेक्टेयर की खेती वाले किसानों को उनके बैंक खाते में प्रतिवर्ष सीधे 6,000 रुपये की आय का समर्थन देने जैसे कदम से क्या किसानों का सचमुच भला होगा?

उत्तर : इसे महज आंकड़ों में न देखकर इस ओर ध्यान देना चाहिये कि आजादी के बाद पहली बार छोटे और गरीब किसानों के खाते में नकदी का अंतरण किया जायेगा। यह वही किसान हैं जो दवाओं और खेती की छोटी मोटी जरुरतों के लिए मामूली नकदी के मोहताज होते हैं। यह योजना एक दिसंबर 2018 से लागू होगी और किसानों को तत्काल इसका लाभ मिलने वाला है। इन किसानों के लिए अभी 6,000 रुपये की राशि महज एक शुरुआत है जिसे निश्चित तौर पर आगे बढ़ाया भी जा सकता है। ऐसा पहले नहीं हुआ।

प्रश्न : बटाई पर या किराये पर खेती करने वाले किसानों को इन सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने में दिक्कत आयेगी क्योंकि इसका लाभ तो मूल खेत मालिकों के खाते में भेजा जायेगा। आपका क्या सोचना है?

उत्तर : नीति आयोग ने भूमि किराया कानून बनाकर राज्य सरकारों को भेजा है। ऐसे में उन्हें इस संबंध में कानून बनाने के लिए सामने आकर सक्रिय भूमिका निभानी चाहिये ताकि वास्वविक पात्र किसानों को योजना का लाभ मिल सके। इसके अलावा भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों को या असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करने वालों के लिए सरकार की अलग से योजना है जिसके तहत उनके हितों की देखरेख होगी।

प्रश्न : खेती के साथ पशुपालन और मत्स्यपालन को बढ़ावा देने के लिए इसके किसानों को दो प्रतिशत की ब्याज सहायता तथा समय पर रिण चुकाने वालों को तीन प्रतिशत की अतिरिक्त ब्याज सहायता के क्या मायने हैं?

उत्तर : खेती के साथ साथ किसानों की आय बढ़ाने के लिए उन्हें सहायक गतिविधियां अपनाने की खातिर प्रोत्साहित करने की मंशा के साथ सरकार पशुपालन और मत्स्यपालन करने वाले किसानों को उनके किसान क्रेडिट कार्ड पर दो प्रतिशत की सब्सिडी दे रही है। इसके लिए 750 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना एक विशेष कदम है। इसके अलावा मछली पालन को प्रोत्साहन देने के लिए अलग से एक विभाग ही गठित कर दिया गया है। दुधारु पशुओं की नस्ल सुधार और स्वदेशी नस्ल के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय गोवंश आयोग का गठन एक सराहनीय कदम है। सरकार को आगे चलकर सब्सिडी को भी सीधा किसानों के खाते में अंतरण करना चाहिये।

प्रश्न : क्या इस तरह के लोक लुभावन उपाय या मुफ्त सहायता खेती का भला कर सकती है? क्या यह कृषि संकट का स्थायी समाधान हो सकते हैं?

उत्तर : देश में लगभग 30 वर्षों से सिंचाई परियोजनायें लंबित पड़ी हैं जिसमें आज लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। क्या इसे चुनावी उपक्रम मानना चाहिये? देश के ग्रामीण हाट को राष्ट्रीय डिजिटल बाजार मंडी (ई-नाम) से जोड़ने को क्या चुनावी योजना माना जाना चाहिये? देश की 585 ई-मंडियों को जोड़ने के लिए पिछले बजट में 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। क्या यह सब चुनावी स्टंट है?

प्रश्न : कृषि क्षेत्र के लिए और क्या कुछ किया जाना चाहिये?

उत्तर : सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने की व्यवस्था को अनिवार्य करना चाहिये और इससे कम मूल्य का भुगतान करने वालों या किसान को उसकी उपज कम मूल्य पर बेचने की खातिर विवश करने वालों के लिए दंड का प्रावधान होना चाहिये। बाजार को अव्यवस्थित करने वाले आयात को नियंत्रित करने के लिए इसका नियंत्रण आयात शुल्क से करने की जरुरत है।

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