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नई लेजर तकनीक स्वच्छ ईंधन के विकास में मदद

लंदन। वैज्ञानिकों ने एक नयी लेजर प्रौद्योगिकी विकसित की है जिससे जीवाश्म ईंधन की जगह अधिक प्रभावी स्वच्छ ऊर्जा के लिये स्थायी तरीकों का पता लगाने में मदद मिल सकती है। अनुसंधानकर्ताओं ने इसके लिये वाइब्रेशन सम-फ्रीक्वेंसी जेनरेशन (वीएसएफजी) स्पेक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल किया।

ब्रिटेन के लिवरपुल विश्वविद्यालय में अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओ2) सबसे अधिक मात्रा में पैदा होने वाला अपशिष्ट पदार्थ है, जिसे कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे ऊर्जा बहुल उप-उत्पाद में बदला जा सकता है। यह अध्ययन ‘नेचर कैटालिसिस’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। हालांकि, इसके अनुसार वैश्विक, औद्योगिक स्तर पर काम के लिहाज से इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। लिवरपुल विश्वविद्यालय में अनुसंधानकर्ताओं ने चीन में बीजिंग कम्प्युटेशनल साइंस रिसर्च सेंटर के सहयोग से एक लेजर आधारित स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक का प्रदर्शन किया। इसे कार्बन डाईऑक्साइड के इलेक्ट्रोकेमिकल में कमी या मूल स्थान के अध्ययन में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे इन जटिल रासायनिक मार्गों में बहु वांछित समझ मिल सकती है।

अनुसंधानकर्ताओं ने इसके लिये वाइब्रेशन सम-फ्रीक्वेंसी जेनरेशन (वीएसएफजी) स्पेक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल किया। लिवरपुल टीम का हिस्सा रहीं गैरी नेरी ने कहा कि यह बहुत उत्साहजनक है क्योंकि यह अनुसंधानकर्ताओं को इलेक्ट्रोकेटेलिस्ट के संचालन की प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझने का अवसर देती है।

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