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रक्षक सेना की प्रेरणा से हुई थी काग्रेंस स्थापना

इटावा। आजादी पूर्व इटावा के कलेक्टर रहे ए0ओ0 ह्यूम ने क्रांतिकारियों से निपटने के लिये बनायी गयी रक्षक सेना से प्रेरणा लेकर 28 दिसंबर 1885 को बंबई(मुम्बई) में कांग्रेस की स्थापना की थी। कांग्रेस की स्थापना उत्तर प्रदेश के इटावा में 30 मई 1857 में क्रांतिकारियों से निपटने के लिये गठित की गई रक्षक सेना की सफलता से प्रेरित होकर की गई थी।

आजादी पूर्व इटावा के कलेक्टर रहे ए0ओ0 ह्यूम ने इटावा में क्रांतिकारियों से निपटने में कामयाबी पाई थी। रक्षक सेना से प्रेरणा लेकर 28 दिसंबर 1885 को बंबई(मुम्बई) में कांग्रेस की स्थापना अंग्रेज सरकार के लिए सेफ्टीवाल्व के रूप में की गई थी।

इटावा के के.के.पोस्ट ग्रेजुएट कालेज के इतिहास विभाग के हेड डा.शैलेंद्र शर्मा का कहना है कि ए.ओ.ह्यूम ने इटावा मे कलक्टर रहते हुए करीब 600 लोगों को जोड कर स्थानीय रक्षक सेना की स्थापना की, जिसके जरिये हयूम ने भारतीय आंदोलनकारियों पर कामयाबी पाई। इसी कामयाबी के नतीजे के तौर पर कांग्रेस की स्थापना की गई। इटावा में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने काफी कुछ दिया जहॉ उन्होंने लोगों की जरूरत के लिए अपने नाम के अनुरूप होमगंज की स्थापना कराई। वही बालिका शिक्षा पर ध्यान दिया इसके साथ ही चिकित्सा का भी विशेष ध्यान उन्होंने रखा।

“इटावा के हजार साल” पुस्तक के अनुसार इटावा के कलेक्टर ए0ओ0 ह्यूम ने इटावा में 30 मई 1857 को राजभक्त जमीदारों की अध्यक्षता में ठाकुरों की एक स्थानीय रक्षक सेना बनाई थी। जिसका उददेश्य इटावा में शांति स्थापित करना था। इस सेना की सफलता को देखते हुए 28 दिसंबर 1885 को मुबंई में ब्रिटिश प्रशासक ह्यूम ने कांग्रेस की नींव रखी। एम के ह्यूम के दिमाग में कांग्रेस के गठन की भूमिका अंग्रेज सरकार के लिए एक सेफ्टीवाल्व की तरह थी। ह्यूम का मानना था कि वफादार भारतीयों की एक राजनीतिक संस्था के रूप में कांग्रेस के गठन से भारत में 1857 जैसे भीषण जन विस्फोट के दोहराव से बचा जा सकता था।

वर्ष 1856 में ह्यूम इटावा के कलेक्टर थे। डलहौजी की संधि के कारण देशी राज्यों में अपने अधिकार हनन को लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरद्ध आक्रोश था। चर्बी लगे कारतूसों के कारण छह मई 1857 में मेरठ से सैनिक विद्रोह भड़का था। उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली से लगे क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी ने संवेदनशील घोषित कर दिए। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीयों की संख्या भी अच्छी-खासी थी। ह्यूम ने इटावा की सुरक्षा व्यवस्था को घ्यान में रख कर शहर की सडकों पर गश्त तेज कर दी थी। 16 मई 1857 की आधी रात को सात हथियारबंद सिपाही इटावा के सडक पर शहर कोतवाल ने पकड़ लिए। ये सभी मेरठ के पठान विद्रोही थे और अपने गांव फतेहपुर जा रहे थे। उन्होंने कमाडिंग अफसर कार्नफील्ड पर गोली चला दी लेकिन वह बच गया। उसने बदले में गोलियां दागना शुरू कर दिया। जिसमें चार मारे गए एवं तीन भाग गए।

पुस्तक में उल्लेख है कि डिप्टी कलेक्टर लक्ष्मण सिंह, कुंअर जोर सिंह तथा अन्य वफादारों ने अंग्रेज परिवारों को बढपुरा से आगरा पहुंचा दिया। इटावा के सैनिकों ने ह्यूम और उसके परिवार को मार डालने की योजना बनाई, जिसकी भनक लगते ही 17 जून 1857 को ह्यूम वेश बदलकर इटावा से निकल कर बढपुरा पहुंच गए और सात दिन तक वे बढपुरा में छिपे रहे। 25 जून 1857 को ग्वालियर से अंग्रेजों की रेंजीमेंट इटावा आई तथा यहां पर पुन अंग्रेजों का अधिकार हो गया। इटावा में अपने कलेक्टर कार्यकाल के दौरान ह्यूम ने अपने नाम के अंग्रेजी शब्द के एचयूएमई के रूप में चार इमारतों का निर्माण कराया। चार फरवरी 1856 को इटावा के कलक्टर के रूप मे ए.ओ.हयूम की तैनाती अग्रेज सरकार की ओर से की गई। हयूम की एक अग्रेज अफसर के तौर पर कलक्टर के रूप में पहली तैनाती है।

ए.ओ.ह्यूम इटावा में अपने कार्यकाल के दौरान 1867 तक तैनात रहे। 16 जून 1856 को हयूम ने इटावा के लोगो की जनस्वास्थ्य सुविधाओ को मददेनजर रखते हुये मुख्यालय पर एक सरकारी अस्पताल का निर्माण कराया तथा स्थानीय लोगो की मदद से ह्यूम ने खुद के अंश से 32 स्कूलों का निर्माण कराया जिसमें 5683 बालक बालिका अध्यनरत रहे। खास बात यह है कि उस वक्त बालिका शिक्षा का जोर ना के बराबर रहा होगा। सिर्फ दो ही बालिका अध्ययन के लिये सामने आई।

ह्यूम ने इटावा को एक बडा व्यापारिक केंद्र बनाने का निर्णय लेते हुये अपने ही नाम के उपनाम से हयूमगंज की स्थापना करके हाट बाजार खुलवाया जो आज बदलते समय मे होमगंज के रूप मे बडा व्यापारिक केंद्र बन गया है।

हयूम ने इटावा शहर मे मैट्रिक शिक्षा के उत्थान की दिशा में काम करना शुरू किया। 17500 की रकम के जरिये 22 जनवरी 1861 को तैयार हुए स्कूल को हयूम एजूकेशन स्कूल नाम दिया गया। इस स्कूल के निर्माण की सबसे खास बात यह रही कि हयूम के प्रथमाअक्षर एच शब्द के आकार का रूप दिया गया। आज इस स्कूल का संचालन इटावा की हिंदू एजूकेशलन सोसाइटी सनातन धर्म इंटर कालेज के रूप मे कर रही है।

पर्यावरणीय संस्था सोसायटी फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर के सचिव संजीव चौहान कहना है कि ए.ओ.हयूम को पक्षियो से खासा प्रेम काफी रहा है। इटावा में अपनी तैनाती के दौरान अपने आवास पर हयूम ने 165 से अधिक चिडियों का संकलन करके रखा था। एक आवास की छत ढहने से सभी की मौत हो गई थी। कलक्टर आवास मे ही बरगद का पेड पर 35 प्रजाति की चिडिया हमेशा बनी रहती थी। साइबेरियन क्रेन को भी हयूम ने सबसे पहले इटावा के उत्तर सीमा पर बसे सोंज बैंडलैंड मे देखे गये सारस क्रेन से भी लोगो को रूबर कराया था।

इटावा जिला काग्रेंस के अध्यक्ष उदयभान सिंह यादव का कहना है कि ए.ओ.हयूम और इटावा का गहरा नाता रहा है और हमेशा रहेगा। हयूम के बारे में हर कोई जानता है कि उन्होंने इटावा में ही काग्रेस की स्थापना का खाका खींच लिया था। हयूम ही वो शख्स थे जो इटावा को वजूद में लाये हयूम से पहले इटावा सिर्फ कागजो मे ही इटावा था धरातल पर इटावा बनाने का काम हयूम ने किया।

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