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जहां आज भी बंधती हैं रेलगाडियां

इटावा। भले ही देश में शनिवार को 70 वां गणतंत्र मनाने जा रहा हो लेकिन आज भी अग्रेंजो के बनाये रेलवे नियमो को अगर कही पालन होता हुआ देखना है तो फिर उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के भर्थना रेलवे स्टेशन आईये। यहॉ पर आपको देखने को मिलेगा कि ट्रेनों को सुरक्षित रखने के लिए बोगी मे बाकायदा ताले लगाकर जंजीर से बांध कर रखा जाता है। इसके लिए रेल विभाग के एक कर्मचारी की डयूटी भी लगाई जाती है।

भर्थना रेलवे स्टेशन अधीक्षक एम.पी.सिंह कहते हैं कि पूर्व से चली आ रही व्यवस्था को वह अपनी मर्जी से खत्म नहीं कर सकते हैं। जब तक बोर्ड से आदेश नहीं मिलेगा तब तक नियम का पालन होता रहेगा। उन्होंने बताया कि अंग्रेजी राज में ट्रेन में पांच से छह बोगियां ही होती थीं। ऐसे में आंधी तूफान अथवा भूकंप आने पर उसके लुढ़कने का खतरा बना रहता था। इस वजह से ट्रेन के एक पहिए को बांधने का नियम बना। समय के साथ दूसरे स्टेशनों पर इस नियम की अनदेखी होने लगी लेकिन भर्थना स्टेशन पर अभी भी इस नियम का पालन किया जाता है। हालांकि सच्चाई है कि यदि 120 बोगियों की भारी भरकम मालगाड़ी लुढ़कने लगे तो जंजीर उसे रोक नहीं पाएगी और टूट जाएगी।

दरअसल अंग्रेजों के शासनकाल में नियम बनाया गया कि अगर कोई ट्रेन एक दिन के लिए भी स्टेशन पर रुकती है तो उसके किसी एक पहिए को जंजीर से बांधकर उसमें ताला लगाकर सुरक्षित किया जाए। अन्य स्टेशनों पर समय के साथ यह नियम भले ही बदल गया हो, लेकिन इटावा के भर्थना स्टेशन पर आज भी इस नियम का कड़ाई से पालन किया जाता है।

इटावा के भर्थना स्टेशन पर रुकने वाली सवारी गाड़ी हो या फिर 120 बोगियों की लगभग आधा किलोमीटर लंबी मालगाड़ी। सभी में स्टेशन अधीक्षक या स्टेशन मास्टर की निगरानी में पोर्टर किसी एक पहिए को जंजीर से पटरियों से बांधकर ताला लगाता है। यही नहीं उस पहिए के दोनों ओर दो लकड़ी की गिट्टक भी लगाते हैं। इस काम की बाकायादा रेलवे के दस्तावेजो मे इंद्राज भी किया जाता है और स्टेशन मास्टर कक्ष में रखे स्टेबल रजिस्टर में इसे दर्ज किया जाता है।

जब ट्रेन रवाना होने को होती है तो लोको पायलट व गार्ड को ट्रेन ताला खोलकर सौंप दी जाती है। सरायभूपत रेलवे के स्टेशन पर इसके लिए पोर्टर रवि कुमा एवं अशोक कुमार की ड्यूटी लगती है। पोर्टरों का कहना है कि उन्हें स्टेशन अधीक्षक का आदेश मिला है। वर्षों से पहिए को एक जंजीर से बांधकर ताला लगाते आ रहे हैं। जाने के समय नियम से लिखत पढ़त पूरी कर ताला खोलकर ट्रेन को रवाना करते हैं।

जब देश के लिए रेल नई नई बात थी तभी से स्टेशन पर लम्बे समय के लिए ठहरने वाली ट्रेनों को जंजीर से बांधने का नियम बना हुआ है। रेल अधिकारियों के अनुसार शुरूआती दिनों में ट्रेन मात्र चार से छह बोगियों की होती थी। ऐसे आंधी-तूफान या भूकम्प की स्थिति में ट्रेन के अपने आप लुढकने का खतरा बना रहता था। जो स्टेशन ढलान पर थे वहां ट्रेन के लुढकने का सबसे ज्यादा खतरा था जिसपर इस नियम का कड़ाई से पालन कराया जाता था और ट्रेन के पहियों में दोनों और लकड़ी की गिट्टी लगाकर जंजीर से बांध कर ताला जड़ दिया जाता था।

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