अदालती ड्रामे से भारी नुकसान

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में राफेल की फाइल चोरी होने वाले ड्रामे के जरिए भी सरकार ने सेना की साख को मिट्टी को मिला देने वाला काम किया है। देश के सबसे बड़े कानूनी अधिकारी अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि राफेल लड़ाकू विमान खरीद के सौदे से जुड़े कुछ दस्तावेज रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं। सोचें, देश की सबसे सुरक्षित इमारत से सेना को गोपनीय दस्तावेज चोरी होने की बात देश का सबसे बड़ा कानूनी अधिकारी, देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने कह रहा है! आम लोगों के बीच और सेना के मनोबल पर इसका कैसा असर हुआ होगा यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। 

अटॉर्नी जनरल के बयान के बाद देश भर में हंगामा मचा। सोशल मीडिया में सरकार की ऐसी किरकिरी हुई, जैसी पहले कभी नहीं हुई। एक आवाज में पूछा जाने लगा कि जब रक्षा मंत्रालय के दस्तावेज सुरक्षित नहीं हैं तो यह कैसे माना जाए कि देश सुरक्षित है? देश के सुरक्षित हाथों में होने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावे की धज्जी उड़ गई। पूरी सरकार और भारतीय जनता पार्टी और उनके समर्थक गुरुवार दोपहर से 24 घंटे तक सदमे में रहे। जब लगा कि यह बहुत नुकसान पहुंचाने वाली बात है तो वहीं अटॉर्नी जनरल सुप्रीम कोर्ट में मुकर गए। उन्होंने कहा कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए हैं उनकी फोटोकॉपी चुराई गई है। क्या रक्षा मंत्रालय के दस्तावेज चोरी होने और उसकी फोटोकॉपी करा कर वहां से निकालने में बहुत ज्यादा फर्क है? दूसरा सवाल है कि अब कौन अटॉर्नी जनरल की बात पर यकीन करेगा कि उनकी कौन सी बात सही है? 

असल देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गोपनीय दस्तावेज चोरी होने की बात सुप्रीम कोर्ट में बताने का दूसरा मकसद था। उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाना था। उसके जरिए राफेल पर याचिका दायर करने वाले अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण को डराना था। चोरी के दस्तावेज के आधार पर खबर छापने के लिए सरकारी गोपनीयता कानून के तहत कार्रवाई का भय दिखा कर द हिंदू अखबार के संपादक एन राम का मुंह बंद करना था। सोचें, विरोधियों को चुप कराने, डराने के लिए कैसा दावा किया गया? भरी अदालत में देश के सबसे बड़े कानूनी अधिकारी ने कहा कि याचिकाकर्ता चोरी के दस्तावेज लगा रहे हैं, जिसे अदालत को नहीं स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने साफ इशारा करके कहा कि चोरी के दस्तावेज का इस्तेमाल करने के लिए एफआईआर होगी, जिसमें अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण का नाम होगा। वहीं पर प्रशांत भूषण ने कहा भी कि अटॉर्नी जनरल उनको डराने का प्रयास कर रहे हैं। 

कोर्ट के बाहर एन राम ने दो टूक अंदाज में कहा कि उन्हें कोई डर नहीं है और कोई भी उनसे उनके सूत्र के बारे में जानकारी नहीं ले सकता है। जब शौरी, सिन्हा, भूषण और राम ने तेवर दिखाए और सोशल मीडिया में छीछालेदर शुरू हुई तो शुक्रवार को सरकार ने यू टर्न ले लिया। केके वेणुगोपाल ने कह दिया कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए हैं, उनकी फोटोकॉपी का इस्तेमाल किया गया है। ध्यान रहे द हिंदू अखबार में सरकारी दस्तावेजों के आधार पर राफेल की एक स्टोरी आठ फरवरी को भी छपी थी। तब से लेकर सात मार्च तक यानी एक महीने में सरकार को पता नहीं था कि दस्तावेज चोरी हुए हैं या उनका फोटोकॉपी कराई गई है? सोचें अपने विरोधियों को डराने और चुनाव से पहले उनका मुंह बंद करने, प्रेस का गला घोंटने, सिविल सोसायटी को धमकाने और यहां तक की राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अदालती कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए सरकार ने कैसे पूरी सेना और रक्षा प्रतिष्ठान की साख पर दांव पर लगा दी! जो काम अब तक दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के साथ किया जा रहा था वहीं काम सेना के साथ भी कर दिया गया। 

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