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याद करें 2013 की भाजपा को!

सन् 2013 में भाजपा का हर नेता अति सक्रिय था। सुषमा स्वराज, अरूण जेतली मंहगे पेट्रोल-डीजल, भ्रष्टाचार को ले कर लोकसभा, राज्यसभा में दहाडते थे। भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह ने प्रदेशों में,संगठन मे, दफ्तरों में, घरों में कार्यकर्तओं का रैला बनवाया हुआ था। तब मीडिया के आगे भाजपा के चेहरे विश्वास पाए हुए थे। तब संबित पात्रा, कोहली, तनेजा, टूटेजा जैसों का मतलब नहीं था। सब स्थापित चेहरे और जनता की फील माफिक जनता से बोलते हुए। भाजपा में कोई एक बॉस नहीं था। सब बॉस थे। तब प्रतिस्पर्धा थी, राजनीति थी। विचारों की, आईडिया की भरमार थी। खुद नरेंद्र मोदी दसियों लोगों को गांधीनगर बुला-बुला कर मंत्रणा करते थे कि कैसे करना है, क्या करना है और रीति-नीति में ऐसा हो वैसा हो। 

और आज?  सत्ता है लेकिन विचार गायब है। भाषण है मगर जादू खत्म है। प्रदेशों में सरकारे है लेकिन मुख्यमंत्री निराकार और बिना असर के तो मंत्री भी निराकार! आज पार्टी की बडी-बड़ी बिल्डिगें है लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं को वहा जाना पसंद नहीं है। सब तरफ अंहकार, घमंड में दमदमाते चेहरे। महाबली अमित शाह आज अध्यक्ष है लेकिन उनकी कोठी में सन्नाटा पसरा मिलेगा। 

जरा याद करें, नितिन गडकरी, राजनाथसिंह की अध्यक्षता के वक्त उनकी कोठी की भीड़ और नेताओं की भागमभाग को और उस वक्त अपने आप जनसभाओं में जमा होती भीड को। ठिक विपरित आज मोदी-शाह के  अंदाज पर गौर करे। अब सिर्फ मोदी-शाह के भाषण है। हवाई दौरे है। जनसभाए है लेकिन बेइंतहा खर्चे से कार्यकर्ताओं-समर्थकों की भीड जुटवा कर। 

मैं यह सब आज इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि गुजरे सप्ताह दशकों पुराने भारी और अपने पैसे से एक्टिविस्ट चले आ रहे तीन भाजपाईयों से मुलाकात हुई। तीनों ने भाजपा के दिल्ली मुख्यालय के मनहूस माहौल, पदाधिकारियों- मंत्रियों और प्रदेश संगठन के अध्यक्षों के जो अनुभव बताए उसने सचमुच सोचने को मजबूर किया कि यों वाजपेयी के राज में भी भाजपा सत्तामुखी हुई थी लेकिन तब भी पार्टीजनों में ऐसा मोहभंग तो नहीं बना था।    

एक नेता तेलंगाना की हडबड़ी में इस उम्मीद से दिल्ली आया कि शायद मोदी- शाह वहा चुनाव को ले कर चिंता में हो। वक्त मिलेगा, बात होगी। मगर वह यह जान धक्के में था कि मोदी-शाह ने चंद्रशेखर राव पर कैसे भरोसा कर लिया। कम से कम एक दफा तेलंगाना के प्रदेश नेताओं को बुला कर बात तो की होती। प्रदेश को ले कर कोई विचार नहीं हुआ। मुख्यमंत्री आ कर बहका गया और उसने उल्लू बना छूटते ही अपने 105 उम्मीदवार घोषित कर भाजपा को औकात बता दी कि पांच-सात सीटे लेनी हो तो लो जबकि भाजपा के पांच विधायक पहले से ही है। 

हां, नोट करके रखे, आंध्र, तेलंगाना में भाजपा के लिए अगले लोकसभा चुनाव में जीरो सीट है। न वाईएसआर पार्टी से भाजपा का समझौता बनेगा और न टीआरएस और टीडीपी से। मोदी-शाह इतराते है कि 12 करोड सदस्य है। उसमें कोई 40 लाख का आंकडा तेलंगाना का बताया जाता है। असलियत जाने कि चालीस हजार कार्यकर्ता भी तेलंगाना में सक्रिय नहीं है। पांच विधायक है और पांचों अलग-अलग दिशा में। और मोदी-शाह जिन चंद्रशेखर राव पर आगे की गणित बनाए हुए है वे उनसे नहीं बल्कि औवेसी की पार्टी से एलायंस रखेगें और भाजपा को तेलंगाना की एकलौती लोकसभा सीट भी नहीं जीतने देगें। 

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