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राम मंदिर का सनातन नुस्खा

भारतीय जनता पार्टी के पास कुछ नहीं होता है तो राम मंदिर होता है। आखिर राम मंदिर ने ही भाजपा को शून्य से संपूर्ण बहुमत तक पहुंचाया है। 1980 में बनी भाजपा ने जब पहला चुनाव 1984 में लड़ा तो उसके सिर्फ दो सांसद जीते थे। पर उसके तीन साल बाद राम मंदिर का आंदोलन शुरू हुआ, शिला पूजन शुरू हुआ, रथ यात्राएं निकालने की तैयारी हुई और 1989 के चुनाव में भाजपा दो से 85 सीटों पर पहुंच गई। उसके बाद की कहानी इतिहास है। तब से लेकर अब तक शायद ही कोई चुनाव हुआ है, जिसमें भाजपा ने राम मंदिर का मुद्दा नहीं उठाया है। लगभग हर बार पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में इसका जिक्र होता है। पर 1996 के बाद से किसी चुनाव में भाजपा को इसका कोई खास फायदा नहीं हुआ। न लोकसभा में और न विधानसभा चुनाव में। 

भाजपा को पता है कि राम मंदिर के मुद्दे का चुनावी फायदा तभी होगा, जब मंदिर बनना शुरू हो। या कम से कम उसके गंभीर प्रयास दिखें। ऐसा लग रहा है कि अब कुछ भाजपा और उसका सहयोग करने वाले हिंदुवादी संगठनों के प्रयास से और कुछ अपने आप कानूनी गतिविधियों से राम मंदिर का मामला निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में विवादित जमीन के मालिकाना हक के मामले की निर्णायक सुनवाई 29 अक्टूबर से शुरू होने वाली है। अगर जमीन का फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट की तरह भी आया तब भी निर्मोही अखाड़े और राम लला को दो तिहाई जमीन मिल जाएगी, जिस पर तत्काल निर्माण कार्य शुरू हो सकता है। 

इस बीच विश्व हिंदू परिषद से साधुओं की एक उच्चाधिकार प्राप्ता संस्था की बैठक कराई है, जिसने सरकार को मंदिर निर्माण के लिए संसद से कानून बनाने के लिए चार महीने का समय दिया है। यह चार महीने का समय बड़ा रणनीतिक है। चार महीने का समय जब पूरा होगा तब प्रयाग में कुंभ का मेला चल रहा होगा। उस समय सारे अखाड़े, धर्म गुरू, साधु-संत एक जगह इकट्ठा होते हैं। तब वहां से कोई बड़ा हुंकारा मारा जा सकता है। चार महीने का समय इसलिए भी अहम है क्योंकि उस समय तक सब कुछ ठीक रहा तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका होगा, जिसके बाद कानून बनाने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। चार महीने जब पूरे होंगे तब तक चुनाव की घोषणा का समय आ चुका होगा। 

यह सब कुछ अपने आप नहीं हो रहा है। यह संयोग हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस्लाम में नमाज के लिए मस्जिद की अनिवार्यता के मुद्दे को बड़ी बेंच में नहीं भेजा, जिससे जमीन के मालिकाना हक के मामले की सुनवाई शुरू करने का रास्ता साफ हो गया। अगर वह मामला बड़ी बेंच को जाता तो जमीन विवाद पर सुनवाई अटकी रहती और वह लोकसभा चुनाव से पहले किसी हाल में नहीं हो पाती। अब वह रास्ता साफ है। तभी उसके बाद योजना के तहत विहिप ने साधु संतों की बैठक की और चार महीने की समय सीमा तय की। 

इसके पीछे सुविचारित योजना होने के कई संकेत हैं। पिछले दिनों संघ प्रमुख ने एक हफ्ते में दो बार राम मंदिर का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि मंदिर जरूर बनेगा और दूसरे यह भी कहा कि कोई विपक्षी पार्टी इसका विरोध नहीं कर पाएगी क्योंकि भगवान राम उनके भी इष्टदेव हैं। उनके इस बयान के बीच तपस्वी छावनी के महंत परमहंस दास राम मंदिर निर्माण के लिए भूख हड़ताल पर बैठ गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी लोगों को धीरज रखने की सलाह देते हुए कहा कि मंदिर अपने समय पर बनेगा। यानी कुल मिला कर भाजपा हो या संघ से जुड़े संगठन हो सब मंदिर निर्माण को लेकर सक्रिय हो गए हैं। इससे ऐसा लग रहा है कि इस बार राम मंदिर का मसला पहले की तरह एक सामान्य मुद्दा नहीं रहने वाला है। 

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