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राहुल अब लगते झूठे या मोदी?

अपनी पुरानी थीसिस है कि भारत मतलब भगवान भरोसे। सचमुच वक्त और भाग्य ही भारत की गति, भारत के निर्णय है! भाग्य और वक्त ने ही भारत में प्रधानमंत्री बनाए। नेता बनाए और देश गंगा की धारा माफिक प्रवाहित रहा। इस गंगा का मार्ग तय, किनारे तय और वक्त के विकास, गंदगी, सफाई सब एक नियति में बंधे हुए। वक्त ने, भाग्य ने नरेंद्र मोदी को नेता बनाया। मनमोहन सरकार का वक्त खराब हुआ तो नरेंद्र मोदी का वक्त बना। हर कोई तब नरेंद्र मोदी को ईमानदार, सच्चा, छप्पन इंची छाती वाला, अच्छे दिन लिवाने वाला महानायक मान बैठा। कांग्रेस आईसीयू में गई तो राहुल गांधी को जनता ने पप्पू माना। उन्हे न कोई देश में सुनने वाला था और न विदेश में! मोदी सच्चे थे और राहुल गांधी झूठे!

और वक्त का फेर देखिए आज दुनिया में किसे सुना जा रहा है? राहुल गांधी को! हां, जर्मनी, ब्रिटेन में भी बिना प्रायोजित ढंग से राहुल गांधी ने वहा के थिंक टैंक के आगे. विश्वविद्यालय के छात्रों के आगे सवालों का जिसी बेधड़की से सामना किया क्या वैसा नरेंद्र मोदी ने कभी जीवन में सामना किया? 1984 की सिक्ख हिंसा पर भी राहुल गांधी को जो समझ आया वह बोला? मगर क्या आज कल्पना भी संभव है कि गुजरात के दंगों या हिंसा की बात पर विदेशी विश्वविधालयों के खुले मंच पर नरेंद्र मोदी बेबाक सवालों का सामना करें या बतौर प्रधानमंत्री अपने नोटबंदी, जीएसटी, राफेल पर प्रेस कांफ्रेस हो जाए?  

2014 से पहले मनमोहन सरकार, कांग्रेस या तो मुंह चुराते थे या कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी के अंहकारी चेहरों की प्रेस कांफ्रेस से देश बूझता था कि ये कैसे झूठ बोल रहे हंै! किस निर्लज्जता से जीरो नुकसान की थीसिस दे रहे हैं। आज ठीक उलटा है। नोटबंदी पर रिर्जव बैंक की रिपोर्ट के बावजूद नरेंद्र मोदी, अरूण जेतली मुंह चुराएं हुए हंै। रॉफेल के सौदे की कीमत के सीधे सवाल पर मौन है और जेतली, संबित पात्रा, कोहली के वैसे ही अंहकारी चेहरे टीवी स्क्रीन पर झलक रहे हंै जैसे 2014 से पहले जनता सिब्बल- तिवारी के चेहरे देखती थी। तब नरेंद्र मोदी का सत्ता का हमला था और आज राहुल गांधी का मोदी सत्ता पर हमला है। इस हमले पर  वक्त अपने आप जनता को अहसास करा दे रहा है कि राहुल गांधी पूछ रहे है और सत्ता मुंह चुरा रही है। 

सो वक्त बदला है और बदले वक्त की निशानी है कि नरेंद्र मोदी, अरूण जेतली और उनकी सत्ता संबित पात्रा व पालतू मीडिया की आड़ में अपने को छुपाए हुए है। 2014 से पहले जिन चारों बातों पर अच्छे दिनों की डुगडुगी के साथ नरेंद्र मोदी ने जनता का, हिंदूओं का दिल जीता था उन सबमें वे झूठे प्रमाणित हुए है। आर्थिकी जनता के लिए सस्ती नहीं हुई। मतलब पेट्रौल-डीजल की कीमते 40 रू लीटर नहीं पहुंची। आम आदमी के खाते में काले धन का 15 लाख रू नहीं पहुंचा। आंतकवाद व पाकिस्तान, चीन को ठोकने की छप्पन इंची छाती पिचकी पड़ी है तो कश्मीर में धारा 377, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, कॉमन सिविल लॉ, मदरसों या अखिल भारतीय गौहत्या कानून जैसा कोई हिंदूवादी काम भी एक नहीं हुआ!  

इनसे भी बड़ा पहली भ्रष्टाचार का है। 2014 से पहले नरेंद्र मोदी चौकीदारी की बात लिए हुए थे। वह बात आज नीरव मोदी, मेहुल भाई व अंबानी-अदानी छाप गुजराती खरबपतियों की चर्चाओं, वाकियों से ये बादल बनवा दे रही है कि आजाद भारत के सत्तर साल का सबसे बड़ा घोटाला यदि कोई है तो वह रॉफेल सौदा और नोटबंदी व उसके साथ, उससे फोलोअप में वसूली का, छापों का वह दुष्चक्र है जिसका रोना हर शहर में व्यापारी, उद्योगपति तंग किए जाने, बरबाद किए जाने के हवाले किस्से सुनाते मिलता है। 

तभी वक्त का कमाल देखिए कि राहुल गांधी अकेले ही देश का नैरेटिव हो गए है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी कथित चाणक्य बुद्वी में हिसाब लगाया था कि राहुल की चर्चा कराओं, इससे लोगों के जहन में मोदी बनाम राहुल की तुलना बनेगी और नरेंद्र मोदी अपनी भाषण कला से जीत जाएगें। एक मायने में मोदी-शाह ने ठिक सोचा। लेकिन वक्त किसी का सगा नही होता। लोगों के अनुभव से बनती वक्त की चाल को इन्होने नहीं बूझा। मोदी-शाह ने अपने अंहकार में नहीं सोचा कि पांच साल का लोगो का जो अनुभव होगा वह सोच को, वक्त को बनाए हुए होगा और फिर वक्त की हवा से अपने आप राहुल गांधी लोगों को सच्चे लगेगें और नरेंद्र मोदी झूठे!

मैं अपने कॉलम में 2015 में लिख चुका हूं कि राहुल गांधी घर बैठे रहें, कुछ न करें तब भी वक्त अपने आप उन्हे जंगल में खोये राजकुमार की तरह जनता के बीच हीरो बना डालंेगें। मगर उस वक्त मतलब नोटबंदी से पहले अपने को भी ख्याल नहीं था कि 2018 में इतनी जल्दी ही ऐसी स्थिति बन जाएगी। नरेंद्र मोदी नोटबंदी करेगे और अपने पांवों पर एक के बाद एक कुल्हाड़ी मारेंगे। 

नरेंद्र मोदी की कुल्हाड़ी का मतलब अपने को जनता की निगाहों में झूठा बनाना और जनता के अनुभव के साथ खिलवाड़ करना है। 2014 से पहले के प्रधानमंत्रियों और उसके बाद की सत्ता का फर्क यह है कि पहले सरकार, प्रधानमंत्री की झूठ सामूहिक रूप लिए हुए हुआ करती थी। आज अकेले नरेंद्र मोदी झूठ के, धोखे के, असफलता व अविश्वास की पहचान बनते जा रहे हैं। 

इसलिए राहुल गांधी दिनोंदिन खिलते जाएंगे। राहुल गांधी को सिर्फ सवाल करने है। मतलब क्या अच्छे दिन आए? क्या खातों में 15 लाख रू याकि काला धन आया? क्या रूपया सस्ता हुआ? क्या भारत मनमोहन सरकार के मुकाबले मोदी राज में ज्यादा रफ्तार से आगे बढ़ा? नौजवानों को ज्यादा रोजगार मिला? किसान ज्यादा खुशहाल हुए? क्या बैंक और आर्थिकी बरबाद नहीं हुई? क्या डीजल-पेट्रोल सस्ता हुआ? रॉफेल को सवा पांच सौ करोड़ रू में खरीदना ईमानदारी थी या 1600 करोड रू में खरीदना ईमानदारी है? नीरव मोदी का बैकों से सीधे पैसे ले कर भागना लूट और भ्रष्टाचार है या नहीं? नोटबंदी और जीएसटी से बरबादी हुई या नहीं? कश्मीर में हालात सुधरें या बिगड़े? पाकिस्तान और चीन का सरेंडर कराया या हम सरेंडर हुए? 

ये तमाम सवाल वक्त ने बनाए है। नरेंद्र मोदी के राजकाज, उनके अंहकार ने बनवाए है? सत्य बनाम झूठ के सवाल वाले तराजू को वक्त जनता के आगे पेश कर दे रहा है। झूठ के पलड़े को प्रोपेगेंडा, नरेंद्र मोदी के एकालाप वाले भाषण, पालतू मीडिया से कितना ही भारी बनाने की सत्ता कोशिश करे वह इसलिए फेल होना है क्योंकि सत्य के पलड़े में पांच साल के सुख-दुख, धोखे-विश्वास का जनता का खुद का अनुभव बैठा होता है। इस बात को नोट करके रखे कि अब राहुल गांधी का चेहरा, उनका बोलना, उनकी प्रेस कांफ्रेस देखने वालों, सुनने वालों, चर्चा करने वालों के बीच यह धारणा लिए होती है कि राहुल गलत क्या कह रहे है!

आप इसे नहीं मानते! कोई बात नहीं आठ महीने इंतजार कीजिए!

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