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छप्पन इंची राहुल की या मोदी की?

यों इस पहलू पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्कराते हुए (जैसे बनारस में एक बार मुस्कराते हुए व्यंग किया था) यह सोचते हुए बात खारिज करेगें कि पिद्दी न पिद्दी का शोरबा! लेकिन वह उनका अंहकार। हकीकत में अब राहुल गांधी की हिम्मत की वाह बनने लगी है। किसी ने सपने में नहीं (मोदी-शाह-जेतली ने भी नहीं) सोचा कि राहुल गांधी उन उद्योगपतियों, उन अंबानी-अदानी के खिलाफ दो टूक स्टेंड लेगें जिनकी नरेंद्र मोदी के राज में पौ-बारह हुई। कांग्रेस पार्टी पर दस तरह के दबावों, कानूनी नोटिसों और चंदे के संकट के बावजूद राफेल पर, क्रोनी पूंजीवाद पर राहुल गांधी लगातार बोलते रहेगे! 

राहुल गांधी ने रत्ती भर चिंता नहीं की पप्पू कहे जाने की। जो समझ आया वह बोला। अपने को एक्टीग, मार्केटिंग, इवेंट मेनेजमेंट के खांचे में नहीं बांधा। सहज हंसते, मुस्कराते, आंख मारते, हंसते हुए विदेश में प्रेस कांफ्रेस की, भाषण किए तो पार्टी मुख्यालय पर राफेल के साथ नोटबंदी को भी स्कैम बताने की छप्पन इंची छाती दिखलाई। अमित शाह के सहकारिता वाले बैंक के लेन देन का जिक्र कर डाला!

तय माने कि वोट की चिंता में संभल कर याकि राजनैतिक तौर पर करेक्ट रहने की सलाह निश्चित ही राहुल गांधी को मिलती होगी। मतलब 1984 की सिक्ख हिंसा पर क्यों बोलने की जरूरत थी या शहरी माओवादी हल्ले के पचड़े में टिप्पणी क्या जरूरी थी या नरेंद्र मोदी के गले लगना क्यों जरूरी था या मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ हिंदू ब्रदरहुड का मतलब क्या? 

मगर राहुल गांधी तमाम चिंताओं से बेफिक्र है। पार्टी को एलायंस राजनीति के मोड में पूरी तरह डाल दिया है। जीत-हार, पीएम पद सबकी चिंता छोड दी। प्रधानमंत्री पद की महत्वकांक्षा से अपने को ऐसा दूर किया है कि शरद पवार भी कह रहे है कि विपक्ष सत्ता के लिए पीछे नहीं भाग रहा है। वह सब चुनाव के बाद सोचा, देखा जाएगा। 

ठिक विपरित हालात मोदी-शाह के बने है। दोनों छप्पन इंची छाती पिचका कर इन दिनों उद्दव ठाकरे, नीतिश कुमार सबसे विनती कर रहे है कि हमसे एलायंस नहीं तोडना। हम आपको सीटे अधिक देंगे लेकिन साथ रहे। अमरसिंह की चमचागिरी कर शिवपाल यादव से पार्टी बनवा रहे है। राफेल पर बोलती बंद है तो जम्मू-कश्मीर में 35ए हटवाने की हिम्मत तक खत्म हो गई। नोटबंदी की रिजर्व बैंक की रिपोर्ट पर कोई मंत्री नहीं बोला। भाजपा के मुख्यमंत्रियों को बुला कर उन्हे आजादी दी कि विधानसभाओं के चुनावों के लिए अब आप ही पर हम निर्भर। डीएमके के जलसे में नितिन गडकरी को भेजा गया तो मोदी-शाह दोनों मुख्यमंत्रियों की बैठक में राजनाथसिंह-गडकरी को महत्व देते दिखे। 

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