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राहुल के एजेंडे पर अंतरिम बजट!

जान ले कि केंद्र सरकार ने चुनावी साल का जो अंतरिम बजट पेश किया है उसका एजेंडा राहुल गांधी का तय किया हुआ है। कहा जा सकता है कि चुनावी साल है इसलिए कोई भी सरकार ऐसा ही बजट पेश करती। पर असल में यह चुनावी साल में अब तक पेश किए सारे बजटों से अलग है। तभी एक आर्थिक जानकार ने इसे मदर ऑफ ऑल इलेक्क्शन बजट का नाम दिया। इससे पहले किसी और वित्त मंत्री ने ऐसा अंतरिम बजट पेश नहीं किया और पीयूष गोयल तो वित्त मंत्री भी अंतरिम ही हैं! 

राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि यह सरकार सूट बूट वालों की है और प्रधानमंत्री सारे काम अपने 15 कारोबारी दोस्तों को ध्यान में रख कर करते हैं। अंतरिम बजट के जरिए इस धारणा को तोड़ने का प्रयास किया गया। हर प्रावधान की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री हिंदी में कहते थे कि इससे कितने लोगों को फायदा होगा। जैसे उन्होंने दो हेक्टेयर तक जमनीन वाले किसानों को छह हजार रुपए हर साल देने का ऐलान किया तो कहा कि इसका फायदा साढ़े 12 करोड़ लोगों को मिलेगा। इसी तरह उन्होंने आय कर छूट की सीमा पांच लाख रुपए करने का ऐलान किया तो बताया कि इसका फायदा तीन करोड़ मध्यवर्गीय लोगों को मिलेगा। 

बजट भाषण में थोड़ी देर पहले ही वित्त मंत्री ने बताया था कि सरकार ने कितना प्रयास करके टैक्स आधार बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि सरकार के प्रयासों से तीन करोड़ नए करदाता जुड़े हैं। इसके तुरंत बाद उन्होंने नई छूट का ऐलान किया और कहा कि तीन करोड़ लोग इससे कर के दायरे से बाहर हो जाएंगे। यानी चार साल प्रयास करके सरकार ने जितने लोगों को कर के दायरे में लाने में सफलता हासिल की उतने लोगों को एक झटके में कर के दायरे से बाहर कर दिया। हालांकि इसके फायदे को लेकर अब भी बहुत सस्पेंस है और बजट के बाद हुई पारंपरिक प्रेस कांफ्रेंस में भी वित्त मंत्री ने इसे स्पष्ट नहीं किया।

राहुल गांधी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अपने सफल आंदोलन की शुरुआत किसान आंदोलन से की थी। भूमि अधिग्रहण कानून के विरोध में उन्होंने आंदोलन शुरू किया था, जिसमें उनको सफलता मिली थी। उसके बाद वे लगातार किसानों के मुद्दों पर सक्रिय रहे। दिल्ली से सटे भट्ठा परसौल से लेकर मंदसौर तक हर जगह किसान आंदोलन में राहुल गांधी मौजूद रहे। कुछ सरकार की नीतियों से और कुछ राहुल गांधी व दूसरे किसान संगठनों के आंदोलन से किसानों का मुद्दा लगातार राजनीतिक चर्चा का विषय रहा। तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी राहुल गांधी ने इसे ही सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। उन्होंने सरकार बनने पर दस दिन में किसानों की कर्ज माफी का वादा किया। भाजपा मान रही है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीनों जगह उसकी हार का कारण किसान रहे। इसको थोड़ा और पीछे ले जाएं तो गुजरात और कर्नाटक के चुनाव में भी किसान ही मुद्दा था। राहुल ने किसान को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया था। तभी केंद्र सरकार ने किसानों को केंद्र में रख कर इस बार का बजट पेश किया।

वित्त मंत्री ने पांच एकड़ जमीन वाले किसानों को छह हजार रुपए हर साल देने का वादा किया। इसके लिए 75 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। चुनाव से पहले सरकार दो हजार रुपए की पहली किश्त देने वाली है। किसानों के कर्ज पर दो फीसदी की छूट का भी सरकार ने वादा किया और मछली पालन को भी खेती का दर्जा देने का ऐलान किया। ध्यान रहे मछुआरों का मुद्दा भी राहुल गांधी का उठाया हुआ है। गुजरात चुनाव से वे यह मुद्दा उठा रहे हैं। उन्होंने मछुआरों के लिए कांग्रेस का संगठन भी बनाया है। 

कांग्रेस अध्यक्ष ने मध्य वर्ग और छोटे कारोबारियों की परेशानी का मुद्दा नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद से उठाना शुरू किया था। पर उसके बाद के बजट में सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। 2018 के पूर्ण बजट में सरकार ने मध्य वर्ग और छोटे कारोबारियों की समस्या को दूर करने का प्रयास नहीं किया। उसके लिए कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं किया गया। पर जब तीन राज्यों में भाजपा चुनाव हारी तो उसकी समीक्षा में पार्टी को लगा कि किसानों के साथ साथ छोटे कारोबारी और शहरी मध्य वर्ग का उसका वोट बैंक भी छोड़ कर जा रहा है। तभी इस बजट में इन दोनों वर्गों का खास ख्याल रखा गया है। आय कर छूट की सीमा ढाई से बढ़ा कर पांच लाख करने के फैसले पर सरकार ने खास जोर दिया। वित्त मंत्री ने इसका ऐलान किया और चुप होकर खड़े रह गए। उसके बाद लोकसभा में भाजपा के सांसद मोदी, मोदी के नारे लगाने लगे। इतना हल्ला किसानों को छह हजार रुपए देने के ऐलान पर भी नहीं हुआ। सरकार ने टीडीएस के नियमों में बदलाव किया और दूसरी कई किस्म की छूट मध्य वर्ग को दी। छोटे कारोबारियों के लिए जीएसटी के नियमों में बड़ी ढील दी गई है।

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