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तब मोदी को सुनते थे अब चैनल चेंज!

वक्त का जवाब नहीं। याद करें जनवरी 2014 के वक्त को। तब लोग नरेंद्र मोदी को सुनने को लालायित होते थे। लोगों में उत्सुकता होती थी कि आज मोदी का भाषण कहां-कब? लोग टीवी पर भाषण आता देख रूक जाते थे। चैनलों पर भाषण को शुरू से आखिर तक सुनते थे। और आज? 2019 की जनवरी में? आप खुद सोचे मोदी को देखने, सुनने में आपका कौतुक कितना बचा है? क्या मोदी को सुनने का चाव बचा है? 

निसंदेह 2014 बनाम 2019 की हकीकत एकदम विपरित है। बावजूद इसके हैरानी की बात है जो नरेंद्र मोदी का संकल्प है कि वे अपने भाषणों के बूते अगले तीन महीनों में हवा, सुनामी बना डालेंगे। इसी संकल्प में नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार शुरू हो गया है। एक जनवरी को टीवी इंटरव्यू के प्रायोजन के साथ नरेंद्र मोदी को प्रचार में कूदा माना जाना चाहिए। वे आचार संहिता लागू होने से पहले सरकारी खर्चे पर कोई सौ जनसभाएं कर दे तो आश्चर्य नहीं होगा। इसके बाद फिर वे चुनाव के चालीस दिनों में रोजाना 4-5 सभाओं के औसत में डेढ़ सौ सभाओं का रिकार्ड बना सकते हैं।  

सवाल है इतना बोलना, इतने भाषणों से लोगों में ऊब, जुगुप्सा क्या पैदा नहीं होगी? पर दूसरा कोई तरीका भी नहीं है। नरेंद्र मोदी का जनसभाओं का आत्मविश्वास गुजरात के पैटर्न पर है। वे 2019 के लोकसभा चुनाव को उसी तरह जीतने के ख्याल में है जैसे पहले गुजरात में जीता करते थे। पूरी तरह अपने चेहरे, अपनी क्षमता, अपनी लोकप्रियता, अपनी मेहनत की आत्ममुग्धता में जैसे गुजरात में धुआंधार प्रचार करते थे वैसे अगले अगले तीन महीनों में पूरे देश में करेंगे।  

जनसभाओं का पेटर्न हालिया मध्यप्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ की तरह होगा। मतलब पार्टी, संगठन और पैसे के बूते समर्थक मतदाताओं, कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा करना और जुमलों पर चुनावी नैरेटिव, हल्ला बनाना। ऐसा 2014 में भी हुआ था। लेकिन तब और अब का फर्क है। तब जादूगर के चेहरे, मुंह से निकले वाक्य लोगों को मंत्रमुग्ध करते थे और अब नवंबर की विधानसभा चुनाव की जनसभाओं की तरह नक्कारखाने में तूती वाला मामला है। 2014 में मोदी का चेहरा उम्मीदों का चुंबक था। उनकी बातों में, अंदाज में ताजगी थी। मौनी डॉ. मनमोहनसिंह के आगे उनका बहुत बोलना सुपरहिट था। कंट्रास्ट था। लोग सुनने के, देखने के चाव में अपने आप जनसभाओं में पहुंचते थे। तब पूरा शो जनता के उत्साह से था। जनता उनकी दिवानी थी, उनके लिए पागल हुई पड़ी थी। नरेंद्र मोदी सुपरहिट जादूगर याकि सुपरहिट सलमान खान थे। 

मगर अब फ्लॉप महानायक है। इस सप्ताह मथुरा से रपट थी कि स्थानीय नेताओं ने मन की बात को सुनाने के लिए वहां लोगों को चाय-नाश्ते पर न्योता। मोदी की मन की बात के लिए आयोजन हुआ लेकिन जनता नहीं पहुंची। भाजपा के जाने-बूझे कार्यकर्ता बैठ कर मन की बात सुनते हुए टाइमपास कर रहे थे। जनता नदारत थी।  जाहिर है न अब चाव है और न आकर्षण। नरेंद्र मोदी को सुनने, चाय पर चर्चा, मन की बात, टीवी इंटरव्यू, जनसभा के भाषणों से लोग इतने ऊब चुके हैं कि लोगों का इकठ्ठा होना मतलब सबकुछ पार्टी कार्यकर्ताओं, समर्थकों में सिमटा है।  

तब  जनसभा और भाषणों पर इतना जोर क्यों?  इसलिए क्योंकि नरेंद्र मोदी का मतलब आत्ममुग्धता है। हर आत्ममुग्ध व्यक्ति अपने से ही दुनिया मानता है। मुझे इस पूरे सिलसिले में अमरसिंह की एप्रोच याद हो आती है। अमरसिंह ने अपने आपको दिल्ली में, राजनीति में स्थापित करने के लिए अपनी तासीर के अनुसार एक जुमला बनाया था। वह जुमला था चर्चा, परचा, खर्चा। मतलब चर्चा में रहेगें तो दुकान चलती रहेगी। चर्चा के लिए परचा याकि अखबार और उसके लिए खर्चे का बंदोबस्त रहे तो दुनिया को मजे से पागल बना कर अपनी दुकान चलाई जा सकती है।

लगभग उसी एप्रोच में मोदी-शाह-जेटली 2019 के लोकसभा चुनाव को जीत लेने के आत्मविश्वास में है। हर दिन भाषण, हर वक्त चर्चा ही नरेंद्र मोदी का जादुई नुस्खा है। इसके लिए मीडिया पूरी तरह कब्जे में है ही और खर्चा कुबरे का खजाना लिए हुए। 

पर लोगों के चैनल बदलने, सभाओं में न पहुंचने याकि लोगों के दिल-दिमाग में उतरे हुए ग्लैमर का क्या होगा?  इसका कोई जवाब नहीं है। ले दे कर इतना भर सोचा जा सकता है कि आचार संहिता पूर्व के बचे पचास दिनों में खजाना खुले और उससे जादू 
लौट आए! 

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