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हसमुख अधिया हुए रिटायर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दरबार की गुजराती लॉबी के हसमुख अधिया बतौर वित्त सचिव रिटायर हुए। पांच साल के मोदी कार्यकाल में अधिया का मतलब गहरा है। वे मोदी के सर्वाधिक भरोसेमंद और नोटबंदी व जीएसटी के फैसलों में अंहम भूमिका लिए हुए थे। नरेंद्र मोदी के लिए अधिया इतने समर्पित थे कि हिसाब से उन्हे केबिनेट सचिव बनाया जाना चाहिए था। लेकिन आखिरी साल में नीरव मोदी-चौकसी के मामले के बाद कुछ ऐसी गडबड हुई कि मोदी ने अधिया को छोडा। अमित शाह ने ठानी कि अधिया का एक्सटेंशन नहीं होगा। केबिनेट सचिव पीके सिंहा को एक साल का कार्यविस्तार मिला। तीन महिने बाद कामचलाऊ बजट  की जरूरत के बावजूद नरेंद्र मोदी ने हसमुख अधिया को तीन-चार महिने का एक्सटेंशन देना मंजूर नहीं किया।

जाहिर है हसमुख अधिया का पिछला एक साल बहुत खराब गुजरा। मोदी-चौकसी और दीपावली के गिफ्ट के विवाद को भाई लोगों ने तुल दिया तो ईडी के राजेश्वरसिंह ने जो पत्र लिखा वह पूरी गुजराती लॉबी को तिलमिला देने वाला था। हसमुख अधिया ने अरूण जेतली की तरफ पाला बदल कर राजेश्वरसिंह को फिक्स करने के जितने जुगत किए उन सबके फेल होने की दास्ता ऐसी गजब है कि जवाब न गुजराती लॉबी के पास है और न जेतली लॉबी के पास है कि सभी तरह की तैयारियों के बावजूद आखिर सब उलटा कैसे हुआ? 

जान ले प्रधानमंत्री के निजी सचिव राजीव टोपने, प्रधानमंत्री कार्यालय के पीके मिश्रा, भरत लाल, राकेश अस्थाना और हसमुख अधिया की गोलबंदी में ईडी और सीबीआई में पंगेबाजी हुई। जून से लेकर नंवबर तक जो कुछ हुआ उसमें अरूण जेतली और हसमुख अधिया की केमेस्ट्री अपनी जगह थी और उससे उनका एक्सटेंशन होता हुआ लग रहा था लेकिन नहीं हुआ तो वजह निश्चित ही मोदी-शाह का कोई दो टूक अलग आकलन होगा। तभी सवाल है कि अफसरों की गुजराती लॉबी क्या अब अप्रभावी है। अजित डोभाल, नृपेंद्र मिश्रा की गैर-गुजराती लॉबी क्या निर्णायक है? 

अपना मानना है कि विधानसभा चुनावों ने मोदी-शाह को लोगों की आर्थिक तकलीफों का यर्थाथ समझाया है। डा सुब्रहमण्यम स्वामी, अरविंद सुब्रहमण्यम  ने हालातों और नोटबंदी को ले कर हाल में जैसी बातें कहीं है उससे भी नरेंद्र मोदी चेहरों में परिवर्तन की जरूरत समझ रहे होंगे। तब क्या विधानसभा चुनावों के बाद केबिनेट फेरबदल संभव है? कह नहीं सकते। इसलिए भी कि चुनाव नतीजों बाद किंकर्त्वयमूढ़ता बढ़नी है।

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